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गायिका शुभा मुद्गल को जब ऊंचे स्वर में गाते सुनती हूं कि ‘बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे लोहार के घर दे दीजो, जो मेरी जंजीरें पिघलाए...’, तो स्त्री मुक्ति का यह गीत अंतर्मन में ठहर-सा जाता है।

Author January 9, 2019 4:09 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

वर्षा सिंह

गायिका शुभा मुद्गल को जब ऊंचे स्वर में गाते सुनती हूं कि ‘बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे लोहार के घर दे दीजो, जो मेरी जंजीरें पिघलाए…’, तो स्त्री मुक्ति का यह गीत अंतर्मन में ठहर-सा जाता है। गीत-संगीत, कहानियां, फिल्में वे ठिकाने हैं, जिनके सिराहने हम कुछ देर के लिए सुस्ताते हैं, जिनमें हम अपनी छवि देखते हैं, अपने दिल के ताप पर कुछ देर के लिए रूई के गीले फाहे-सा मरहम रखते हैं। गीत-संगीत फिल्म के बोलों और किरदारों पर हमारी भावनाएं मचलती हैं। इनमें हम अपने लिए आदर्श चुनते हैं। अपने इन आदर्शों को असल जिंदगी में भी वैसा ही देखना चाहते हैं, जैसे वे अपनी कृतियों में दिखाई देते हैं। प्रगति के दावों के बीच भारत में स्त्री समानता की लड़ाई अभी लंबी है। लैंगिक भेदभाव को पाटने में विपरीत परिस्थितियों में भी स्कूल जाने वाली बच्ची अहम भूमिका निभा रही है।

शीर्ष पदों पर जिम्मेदारी संभाल रही महिलाओं की इसमें बड़ी भूमिका है। साथ ही रुपहले पर्दे की नायिकाओं की भी जिम्मेदारी बनती है। मसलन कोई नायिका रुपहले पर्दे पर यह बताती है कि मेरे माथे पर लगी बिंदी, मेरी अंगुलियों में अंगूठी, मेरे नाम के आगे पति का नाम जोड़ना मेरा फैसला है, मेरी मर्जी है कि मैं ऐसा करूं या न करूं, तो हमें भी तर्क का एक औजार मिल जाता है। लेकिन जब हमारी यही नायिका असल जिंदगी में उन्हीं घिसे-पिटे मानदंडों को अपनी मुस्कान में सहेजे आगे बढ़ती है, उस समय वह हमें कुछ कमजोर-सा कर देती है। इंटरनेट, सिनेमाघर, टेलीविजन की दुनिया में हम अपनी चिंताओं से मुक्ति की राह ढूंढ़ते हैं। साथ ही जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा लेते हैं। एवरेस्ट की चढ़ाई कर रही पर्वतारोही बताती हैं कि पहाड़-सी मुश्किलों के सामने हार नहीं माननी है। घर के कामकाज निपटा कर रेडियो पर देर रात शो करने वाली नायिका मध्यवर्गीय महिलाओं की चेतना को हौले-से छू जाती है। ‘पीकू’ फिल्म में अपने पिता की समस्याओं से जूझती नायिका दर्शकों को गुदगुदाते हुए बेटियों को अपने पिता की जिम्मेदारी संभालने का सबक देती है। पुराने रीति-रिवाजों, बंधनों को तोड़ने और अपने नियम-कानून खुद बनाने वाली नायिकाएं नई लड़कियों की प्रेरणा बन जाती हैं।

फिल्मों में हमारे नायक-नायिकाओं के बोले गए संवाद जब दर्शकों के बीच पहुंचते हैं तो जनता उन पर अपनी एक राय बनाती है। इन संवादों के जरिए तालियां बटोरने वाले अभिनेता या अभिनेत्रियों के हिस्से में जनता की वाहवाही आती है। उन्हें पुरस्कार मिलते हैं। वे युवाओं की प्रेरणा बन जाते हैं। फिर उन संवादों के प्रति उनकी जिम्मेदारी भी बन जाती है। वे सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं रह जाते, क्योंकि देशभर के युवा और अन्य लोग उन्हें अपनी असल जिंदगी में भी उतारने की कोशिश करने लगते हैं। ऐसी कई फिल्में आपको मिल जाएंगी, जिन पर जनता के बीच खूब बहस हुई। ऐसे मानदंड बनाने वाले नायक-नायिकाओं के हिस्से में कुछ जिम्मेदारी खुद आ जाती है कि असल जिंदगी में उनका किरदार रुपहले पर्दे पर निभाए गए किरदार से ठीक उलट न हो। जैसे कोई अभिनेत्री स्त्री अधिकारों के लिए फिल्मी पर्दे पर आवाज उठाए, असल जिंदगी में भी उसकी सोच या कृत्य ऐसे न हों, जिससे स्त्री समानता के लिए किए जा रहे संघर्ष को ठेस पहुंचे।

आज देश के हर कोने में स्त्री मुक्ति की लहर है। दिल्ली-पंजाब में हॉस्टल की लड़कियां ‘पिंजरा तोड़’ मुहिम चला रही हैं, तो छोटे शहरों, कस्बों की लड़कियां भी आंखों में ढेरों सपने लिए अपनी मंजिलों की ओर बढ़ रही हैं। वे गणित के मुश्किल सवालों को हल करने में जुटी हैं, प्रयोगशालाओं में परीक्षण कर रही हैं, ताकि जिंदगी कुछ बेहतर हो सके। रुपहले पर्दे की नायिकाएं जब इस बात को आगे बढ़ाती हैं तो असल जिंदगी की नायिकाओं को कुछ बल मिल जाता है। देश के लिए मुक्केबाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाली मैरीकॉम पर फिल्म बनती है तो हम उनकी जिंदगी के संघर्षों को जानने-समझने की कोशिश करते हैं और फिर उससे अपने लिए कुछ नोट्स बनाते हैं। सानिया मिर्जा और साइना नेहवाल को देख कर कितनी ही लड़कियों ने अपने हाथों में बैडमिंटन या टेनिस के रैकेट पकड़ लिए। पूरा देश जब उनसे पदक जीतने की उम्मीद करता है, उस समय उनका कद बहुत ऊंचा हो जाता है कि वे पूरे देश की हसरत हैं। उनकी कही बातों का जनता पर सीधा असर होता है।

इसी तरह किसी काल्पनिक कहानी की किरदार भी जब कोई दमदार भूमिका निभाती है तो युवा पीढ़ी उनसे अपने नोट्स लेती है। इसलिए नायक-नायिका फिल्मों में सिर्फ अभिनय नहीं करते, वे जिस चरित्र को जीते हैं, उसकी कुछ जिम्मेदारी भी उनके हिस्से में आ जाती है। अपनी फिल्मों, अपने कार्य के जरिए वे देश के तमाम युवाओं से सीधा संवाद कर रहे होते हैं। युवा पीढ़ी उनकी बातों को बहुत ध्यान से सुनती है। उनके पहने गए लिबास को बहुत ध्यान से देखती है। उनकी शैली और स्टाइल को अपनाने की कोशिश करती है। इसलिए बहुत जरूरी हो जाता है कि हमारे रोल मॉडल प्रगतिशील सोच के हों। असल जिंदगी में भी वे मजबूत किरदार निभाएं।

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