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बदलते दृश्य

बदलते जमाने के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। समय का चक्र इंसान को बदलने में अहम भूमिका निभाता है, जिसका अहसास समय के साथ-साथ होता रहता है। वक्त के मुताबिक इंसान जिंदगी में अपने रहन-सहन के साथ ही अपने पहनावे और मनोरंजन के साधनों में भी बदलाव देखता आया है। पिछली सदी के साठ या सत्तर के दशक में जिस तरह के मनोरंजन के साधन होते थे, वे आज के मनोरंजन के साधनों से बिल्कुल ही अलग होते जा रहे हैं।

Author December 28, 2018 4:07 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

जयदेव राठी

बदलते जमाने के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। समय का चक्र इंसान को बदलने में अहम भूमिका निभाता है, जिसका अहसास समय के साथ-साथ होता रहता है। वक्त के मुताबिक इंसान जिंदगी में अपने रहन-सहन के साथ ही अपने पहनावे और मनोरंजन के साधनों में भी बदलाव देखता आया है। पिछली सदी के साठ या सत्तर के दशक में जिस तरह के मनोरंजन के साधन होते थे, वे आज के मनोरंजन के साधनों से बिल्कुल ही अलग होते जा रहे हैं। उस समय के फिल्मों के साथ ही उनमें जो गाने होते थे, उनमें गीतों के बोल और संगीत अलग ही सुखद अनुभूति महसूस कराते थे। उस दौर के संगीत के साथ बने गीतों के सामने आज के गाने कहीं नहीं टिक पाते हैं। तब हिंदी फिल्मों के संगीत में भारतीय संस्कृति के साथ देशभक्ति झलकती थी। लेकिन इससे अलग भी ज्यादातर गीतों और संगीत की मधुरता जेहन में ठहर जाती थी।

एक अहम पहलू यह था कि उन गीतों को जिन दृश्यों के साथ फिल्मांकन किया जाता था, वे मन और आत्मा को शांति के साथ ही मनोहर अनुभूति दे जाते थे। उस दौर के जो भी गाने सुनने वाले होते थे, उनके बोल ओर संगीत की झनकार को सुनना एक खास तरह का सुख था। आज भी उसकी याद भुलाई नहीं जाती। गीत सुनते हुए लोग नायक या नायिका की कलाकारी के साथ-साथ हसीन वादियों और पहाड़ों के बीच फिल्माए गए प्रकृति के मनोरम दृश्यों के बीच डूबते-उतराते थे। तब सुखद क्षणों के ज्यादातर गीत ऐसे ही दृश्यों के बीच संगीत के साथ गूंजते थे। इसमें छायादार वृक्ष और मुस्कराती हुई कलियां, आम, नारियल और ताड़ के पेड़ों के साथ पक्षी, पपीहा और मोर आदि भी शामिल होते थे।

स्वाभाविक रूप से लोग केवल शब्द और धुन के सागर में नहीं डूबते थे, बल्कि सुनहरे दृश्यों के आकाश में भी विचरण करते थे। आज भी अगर उस दौर के उन फिल्मों के गीत सुने जाएं तो मन के तार झंकृत हो उठते हैं। बल्कि पुराने गीतों में इस प्रकार के दृश्य और संगीत होते थे जो कई बार एक बीमार व्यक्ति के लिए दवा का काम भी करते थे। गीतों की तासीर ऐसी होती थी कि बीमार व्यक्ति भी कम से कम मन से स्वस्थ महसूस करने लगते थे। यों भी, बीमारी की स्थिति में व्यक्ति को अच्छा संगीत सुनने की सलाह दी जाती है। हिंदी फिल्मों के मधुर गीतों का वह असर आज भी महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर, आज के ज्यादातर गीत जुबान पर ज्यादा देर तक नहीं टिकते और मन में कोई असर करना तो शायद सपना ही हो गया है। शायद ही कोई गीत ऐसा होता है जो अपने भीतर उमड़ते-घुमड़ते भावों को संबोधित कर पाता है। गीतों के शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें सुन कर ऐसा लगता है कि मानो वे सिर्फ धुन को भरने के लिए लिख दिए गए हों। हो सकता है कि आज की तेज दुनिया में कुछ लोग उनमें भी भाव और भावनाओं की मौजदूगी देख पाते हों।

लेकिन संवेदनाएं उस तेजरफ्तार जिंदगी में अपने लिए जगह नहीं खोज पातीं, जिसमें गीत के बोल और संगीत उन्हें ठहर कर छूते नहीं हैं। गीतों के फिल्मांकन को देख कर और भी निराशा होती है। किसी भी दृश्य में भावनाओं को खोज पाना शायद ही कभी संभव हो पाता है। तेज गति और रोशनी की नाटकीय चकाचौंध गीतों की बची-खुची संवेदनाओं को लील जाती है। कई बार तो दृश्य सेकेंडों के हिसाब से इतनी तेजी से गुजरते हैं कि किसी भी एक दृश्य को याद रखना मुमकिन नहीं हो पाता। ऐसे में किसी गीत को याद रख पाना या उनका किसी मन के तारों को छू पाना लगभग असंभव हो जाता है। गीत से लेकर संवादों तक में अश्लीलता फिल्म को बेचने का जरिया मान लिया गया है।

आधुनिकता को दर्शाने के दावों वाले दृश्यों में इस कदर विरोधाभास भरे रहते हैं कि कई बार मन मनोरंजन भूल कर उनके औचित्य पर विचार करने लगता है। कहानियों के फिल्मांकन में असंगति अब कोई अजूबी बात नहीं है। सबसे ज्यादा अखरने वाली बात मुझे यह लगती है कि अब फिल्में देखते हुए अभिनेताओं के अभिनय और घटनाओं के उतार-चढ़ाव को महसूस करना मुमकिन नहीं रह गया है। तकनीकी का इस्तेमाल इस कदर हावी हो गया है कि अभिनेताओं के अभिनय के लिए जगह सिमटती जा रही है। ऐसा लगता है कि बहुत सारे दृश्य कंप्यूटर पर ही ग्राफिक डिजाइन के माध्यम से तैयार कर लिया जाता है। कुदरती और स्वाभाविक अभिनय से तैयार दृश्यों में कल्पनाशीलता के प्रयोग लगभग खत्म हो चले हैं। हालांकि बीच-बीच में एकाध फिल्में कहानियों और गीत-संगीत के असर के साथ चली आती हैं, जो पुरानी फिल्मों की याद दिला जाती हैं। लेकिन बदलते जमाने में जिंदगी के रफ्तार के साथ मनोरंजन की गति में भी तेज बदलाव आया है और इसी के मुताबिक फिल्मों की प्रस्तुतियां भी बदल रही हैं। लेकिन एक संवेदनशील मन पर इसका असर अब उतनी ही तेजी से घटता जा रहा है।

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