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अच्छी मां

इन दिनों बहुत-सी कविताएं ‘मां’ पर पढ़ने को मिलीं। इनमें से अधिकतर कविताएं पुरुषों की थीं। सभी में मां का अपनी-अपनी तरह से निरूपण था, लेकिन उसका सार एक ही था- मां घास की तरह बिछती है... भाव विह्वल है... मां का दिन-रात अपना कुछ नहीं होता... वह फूल-सी कोमल और पृथ्वी-सी सहनशील होती है... मां को मैंने कभी सोते नहीं देखा... मां चक्की पीसती है... मां चक्की-सी पिसती है।

Author January 3, 2019 3:53 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

इन दिनों बहुत-सी कविताएं ‘मां’ पर पढ़ने को मिलीं। इनमें से अधिकतर कविताएं पुरुषों की थीं। सभी में मां का अपनी-अपनी तरह से निरूपण था, लेकिन उसका सार एक ही था- मां घास की तरह बिछती है… भाव विह्वल है… मां का दिन-रात अपना कुछ नहीं होता… वह फूल-सी कोमल और पृथ्वी-सी सहनशील होती है… मां को मैंने कभी सोते नहीं देखा… मां चक्की पीसती है… मां चक्की-सी पिसती है। आपसी बातचीत में भी मैंने देखा है कि हर वर्ग के पुरुष मां को अपनी तरह से याद करते हैं। पुलिस महकमे के एक उच्च अधिकारी कह रहे थे कि जब मैं सुबह ड्यूटी पर जाता था, तो मां मेरे कमरे में शेव का पानी और चाय-नाश्ता लेकर आती थी। रात को जब ड्यूटी से देर से लौटता तो वह जागती रहती। अपने हाथ से खाना खिलाती। एक व्यक्ति बता रहे थे कि कैसे उनकी मां उनके कपड़े रखने से लेकर कमरे को ठीक-ठाक करने के सारे काम करती थी। वे गर्व से बता रहे थे उनकी मां बहुत अच्छी थी। वह पूरे घर की देखभाल करती, सबकी जरूरतों का ध्यान रखती, पर कभी अपनी जरूरतों के बारे में नहीं कहती। बीमार होती तो भी काम करती रहती। मां सबको खिलाने के बाद कब और क्या खाती, हमें कुछ नहीं पता चलता। सबके सोने के बाद कब सोती थी, पता नहीं। सुबह उठो तो मां सामने होती।

मेरा मानना है कि जो मां अपने बच्चों को समझाती है कि अपने काम खुद करो, अपनी चीजें खुद संभाल कर रखो, घर में जो भी बन पड़े, योगदान दो, घर के सदस्य होने के नाते जो भी बन पड़े हम सब मिल कर करें, घर की जिम्मेवारी सबकी होती है, वह भी अच्छी मां है। जो मां अहसास कराए कि उसे भी भूख लगती है, वह थकती भी है, बीमार है, उसे देखभाल की जरूरत है, वह भी अच्छी मां है। थोड़ा-सा समय उसे भी अपने लिए मिले तो अपने ‘व्यक्ति’ को वह जीवित रख सकेगी। घरों में प्रतिभासंपन्न औरतें शादी होने के बाद घर-गृहस्थी में अपनी प्रतिभा खो देती हैं। चित्रकार, संगीतकार, नाटककार और यहां तक कि कामकाजी औरतें भी यह सब छोड़ कर घर गृहस्थी में डूब जाती हैं। कामकाजी और उच्च शिक्षा प्राप्त लड़कियों से शादी के समय नौकरी छोड़ने की शर्त भी रखी जाती है, जिसे करीब सत्रह फीसद लड़कियां मान लेती हैं। शादी के बाद बच्चों की परवरिश के लिए बाईस प्रतिशत लड़कियां नौकरी छोड़ देती हैं। नौकरी किसी तरह बच गई तो उससे घर में भी सब काम करने की अपेक्षा रखते हैं। घर में आर्थिक योगदान के बाद भी उसे कोई रियायत नहीं दी जाती। सुबह खाना बना कर जाए, आए तो खाना बनाए। सबकी देखभाल करे।

सबसे पहले उठे, बाद में सोए। अच्छी मां होने का उनके पास कोई और विकल्प नहीं होता। इन्हें ही अच्छी औरतें, अच्छी पत्नियां और अच्छी माएं माना जाता है। यह अवधारणा एकांगी है और पुरुष वर्चस्ववादी समाज के स्वार्थ से प्रेरित है। अच्छी मां के लड़के, अच्छी पत्नी को भी उसी तरह देखते हैं और उससे उनकी वही अपेक्षाएं होती हैं। पर अब समय को बदलना है। औरतों को घर की जिम्मेवारी में घर के सदस्यों की भागीदारी को समझना है। अपने कामों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रह कर खुद करना है। साथ ही बहन, पत्नी, मां को कुछ समय उनके अपने लिए भी देना है। ताकि उनके भीतर की प्रतिभा, उनकी विशेषता, उनका ‘व्यक्तित्व’ न मरे। पारिवारिक स्तर पर सोच बदली जाए इसके लिए जरूरी है कि सामाजिक, आर्थिक स्तर पर भी सोच बदले।
पिछले चार-पांच दशकों में मध्यवर्ग की शिक्षित और कामकाजी लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है। हर जगह योग्यता के अनुसार वे कार्यरत हैं। पर जिस तरह दूसरे देशों में कामकाजी मांओं के बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था है, वह हमारे यहां नहीं है। कई देशों में दिन के स्कूल और देखभाल केंद्र हैं, जहां काम पर जाते समय माएं अपने बच्चों को छोड़ जाती हैं और वापसी में ले लेती हैं।

अधिकतर संस्थाओं, विश्वविद्यालयों में काम की जगहों में बच्चों के लिए देखभाल केंद्र की व्यवस्था अनिवार्य होती है। हमारे यहां सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर इसके बारे में सोचा ही नहीं गया। दूसरे देशों की तरह हमारे यहां भी काम करने के खुले घंटे होने चाहिए। सुबह नौ या दस बजे से शाम पांच या छह बजे तक की अपेक्षा दिन में किसी भी समय आकर काम करने की सुविधा हो। इससे घर और बाहर को सुचारु रूप से संभालने में सुविधा होगी। पति-पत्नी अलग-अलग समय में आकर काम कर सकेंगे। एक घर पर रहेगा, दूसरा काम पर आएगा। घर और बाहर बच्चों की देखभाल में संतुलन होगा। यह भी जरूरी है कि अच्छी बेटी, बहन, पत्नी और मां की परिभाषा को बदला जाए। चुप रहती, सब करती, सब सहती, विचारहीन, दिशाहीन स्त्री, दासता को स्वामित्व मानती अच्छी स्त्री की अपेक्षा एक विचारवान और समझदार स्त्री का आदर किया जाए, ताकि अच्छी मां, पत्नी और अच्छी औरत की परिभाषा को बदला जा सके।

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