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जान की कीमत

अनायास ही उस खबर पर नजर पड़ी। किसी की जरा-सी लापरवाही से किसी व्यक्ति की मौत पर अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए दो लोगों को उनकी लापरवाही की सजा की यह खबर हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। दरअसल, यह किस्सा ब्रिटेन के एक भारतीय रेस्तरां का है, जहां भोजन आॅर्डर करते समय स्पष्ट रूप से बताया गया था कि उपभोक्ता को किस सामग्री से एलर्जी है और जो खाने में अनिवार्यत: नहीं होनी चाहिए। लेकिन न रेस्तरां मालिक और न ही खाना पहुंचाने वाले ने इस पर गौर किया। जो खाना पहुंचाया गया, उसे खाते ही पंद्रह वर्षीय मीगन ली को अस्थमा का दौरा पड़ा। कुछ दिन अस्पताल में संघर्ष के बाद वह आखिरकार दुनिया से चल बसी।

Author January 4, 2019 4:48 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

चंद्रकुमार

अनायास ही उस खबर पर नजर पड़ी। किसी की जरा-सी लापरवाही से किसी व्यक्ति की मौत पर अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए दो लोगों को उनकी लापरवाही की सजा की यह खबर हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। दरअसल, यह किस्सा ब्रिटेन के एक भारतीय रेस्तरां का है, जहां भोजन आॅर्डर करते समय स्पष्ट रूप से बताया गया था कि उपभोक्ता को किस सामग्री से एलर्जी है और जो खाने में अनिवार्यत: नहीं होनी चाहिए। लेकिन न रेस्तरां मालिक और न ही खाना पहुंचाने वाले ने इस पर गौर किया। जो खाना पहुंचाया गया, उसे खाते ही पंद्रह वर्षीय मीगन ली को अस्थमा का दौरा पड़ा। कुछ दिन अस्पताल में संघर्ष के बाद वह आखिरकार दुनिया से चल बसी। न केवल उपभोक्ता के निर्देशों की अवहेलना की गई, बल्कि पहुंचाए गए भोजन में कहीं पर भी खाने में सम्मिलित सामग्री की सही सूचना नहीं दी गई थी। स्थानीय अदालत ने इसे घोर लापरवाही मानते हुए रेस्तरां मालिक और खाना पहुंचाने वाले, दोनों को हत्या का दोषी करार दिया।

वहां खाद्य सामग्री पर इस तरह की जानकारी कानूनन जरूरी है, लेकिन लापरवाही के चलते उपभोक्ता को यह जानकारी नहीं मिली जिसके अभाव में मीगन ली की जान चली गई। यूरोप और अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देशों में उपभोक्ता को सभी सूचनाएं देने का कानूनी प्रावधान है और उसके अभाव में कड़ी सजा दी जाती है। इस मामले को स्थानीय प्रशासन ने संजीदगी से लेते हुए सभी रेस्तरां मालिकों और खाद्य-पदार्थ निर्माताओं को चेतावनी दी है, ताकि वे यूरोपीय संघ के खाद्य-सुरक्षा मानदंडों का कड़ाई से पालन करें या उसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। अब जरा हमारे देश की घटनाओं पर गौर करें। विषाक्त भोजन और प्रसाद, सड़ी हुई खाद्य सामग्री, दूषित पानी, कच्ची-जहरीली शराब सहित कई दूषित पदार्थों के सेवन से हमारे यहां हर साल सैकड़ों मौतें होती हैं, जिनकी खबरें आती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में खाद्य-सुरक्षा और उपभोक्ता सुरक्षा के कानून नहीं हैं। लेकिन मामला तक दर्ज न किया जाए तो कानून होकर भी वह कैसे प्रभावी होगा! अव्वल तो दोषियों तक पहुंचा ही नहीं जाता और अगर पहुंच भी जाएं तो सुस्त व्यवस्था और लचर तंत्र के कारण अमूमन सारे आरोपी बिना किसी जवाबदेही के छूट जाते हैं।

कुछ और क्षेत्रों की तरफ ध्यान दें तो जान कर दुख होगा। इससे भी बदतर हालात निर्माण कार्यों को लेकर है। निर्माण स्थल पर कामगारों की सुरक्षा की अनदेखी और लापरवाही न जाने कितनी जिंदगियां लीलती है। लेकिन कभी दैवीय प्रकोप तो कभी हादसा मान कर ऐसी बची जा सकने वाली दुर्घटनाओं पर सरकारें भी चुप्पी साध लेती हैं। इसी वजह से इस तरह की लापरवाहियों से जान-माल का नुकसान कभी थमता नहीं है।
हाल के समय में नगर निगमों के अधीन कार्य करने वाले सफाईकर्मियों की सिलसिलेवार मौतों के बावजूद दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों तक में सुरक्षा के संसाधनों का अभाव है तो फिर छोटे शहरों-कस्बों की दुर्दशा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। सालाना उपभोक्ता संरक्षण के हफ्ते-पखवाड़े के अभियान चला कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चली सरकारों को आखिरकार इससे आगे बढ़ना होगा। जागरूक उपभोक्ता न केवल खुद की संरक्षा कर पाएंगे, बल्कि लचर हो चुके तंत्र की आंखें बन कर कानून की भी सहायता करेंगे। जरूरत न केवल उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के लिए शिक्षित करने की है, बल्कि कानून के पालन के लिए जिम्मेदार लोगों को बाध्य करने की भी है। चाहे कुछ भी हो, जीवन की कीमत पर किसी को जरा भी ढील नहीं दी जानी चाहिए।

बहरहाल, व्यापक समाज के हित में बने कानून भले ही किन्हीं कारणों से असरदार न बन पाए हों, लेकिन कभी-कभार कुछ मामलों में अदालतें संज्ञान लेकर नजीर पेश करती हैं। कानून चूंकि गवाहों और साक्ष्यों के बूते अपनी कार्रवाई करता है, इसलिए जरूरी यह है कि वैज्ञानिक तरीकों से साक्ष्य जुटाए जाएं जो अदालतों में टिक सके और उनके बूते गुनहगारों को सजा मिले। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि ऐसे मामलों में हर स्तर पर सख्ती बरती जाए और एक स्पष्ट संदेश दिया जाए कि हमारी जान की कीमत पर किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं होगी। तभी उपभोक्ता संरक्षण के बेमानी हो चुके कानूनों का कुछ अस्तित्व बचेगा। सरकारी हो या निजी क्षेत्र- हमारे यहां जिम्मेदारी न खुद से सूझती है और न ही कायदे से किसी की जवाबदेही तय की जाती है।

दरअसल, हम जान की परवाह ही नहीं करते, जिसके लिए समूचा संसार अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। इक्कीसवीं सदी के सपने और डिजिटल क्रांति का परचम लिए हम चाहे कितने ही आगे बढ़ जाएं, लेकिन जब तक जीवन का मोल नहीं समझ पाएंगे, तब तक हमारी हर तरक्की आधी-अधूरी ही रहेगी। हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता मानव जीवन की संरक्षा ही होनी चाहिए। अगर उसी की चिंता नहीं तो फिर बाकी सब बेमानी लगता है। इसके साथ ही अधकचरी जीवन-शैलियों के आदी हो चुके भारतीय जनमानस को आगे बढ़ कर अपने जीवन के अधिकार के हनन के खिलाफ खड़ा होना होगा। तभी उन्हें जीवन के मोल का अहसास होगा जो अभी बेपरवाह हुए हमारी जिंदगी के साथ रोज खिलवाड़ करते हैं।

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