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पहचान खोते शहर

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी पहले हर शहर की अपनी संस्कृति थी, पहचान थी; रिवाज था। हर चीज के मिलने का स्थान तय था। कपड़े, अनाज, गहने, फल-सब्जी, श्रृंगार की वस्तुएं, खान-पान की चीजें सभी तयशुदा जगहों पर मिलती थीं। लेकिन तरक्की की तेजी ने सारा दृश्य ही बदल दिया। मॉल कल्चर के इस दौर में सभी चीजें […]

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

पहले हर शहर की अपनी संस्कृति थी, पहचान थी; रिवाज था। हर चीज के मिलने का स्थान तय था। कपड़े, अनाज, गहने, फल-सब्जी, श्रृंगार की वस्तुएं, खान-पान की चीजें सभी तयशुदा जगहों पर मिलती थीं। लेकिन तरक्की की तेजी ने सारा दृश्य ही बदल दिया। मॉल कल्चर के इस दौर में सभी चीजें मॉल में ही मिल जाती हैं। इससे स्थानीय व्यापारियों का धंधा तो बिगड़ा ही, शहरों की संस्कृति भी बदल गई। खान-पान, रहन-सहन ही नहीं, रीति-रिवाज भी बदल गए।

दिल्ली को ही लें। कहा जाता है कि दिल्ली में रहने वाला कोई भी व्यक्ति खालिस दिल्ली का नहीं है। कोई उत्तर प्रदेश से आया है तो कोई बिहार से, कोई पंजाब से तो कोई हरियाणा या राजस्थान से, कोई मध्यप्रदेश से तो कोई गुजरात या महाराष्ट्र से, कोई बंगाल, असम, झारखंड से तो कोई कर्नाटक, केरल या तमिलनाडु या गोवा से। दिल्ली में मूल दिल्ली के निवासी धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। पराठे वाली गली, घंटेवाला हलवाई, ज्ञानी दी हट्टी, चावड़ी बाजार की चाट-पकौड़ी की रौनक अब पहले जैसी नहीं रही।

इंदौर भी कभी एक लाख की आबादी का शहर था। कपड़ा मिलें थीं। सर्राफा बाजार था जहां दिन में सोना-चांदी और रात को खाने-पीने के शौकीनों की भीड़ जुटती थी। कपड़ा बाजार था। मिलें बंद हो गर्इं। अब इंदौर पच्चीस लाख की आबादी का शहर है। मॉल भी बन गए जहां सबकुछ आसानी से मिल जाता है। बाहरी लोग इंदौर में आ बसे और यहां के कुछ लोग बाहर चले गए। लिहाजा यहां का भी मूल चरित्र बदल गया। यहां तक कि यहां का खुशनुमा मौसम शबे मालवा भी बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतों की मार से काफूर हो गया। लोग ही नहीं बदले, रिवाज, तहजीब, स्थानीय संस्कार, पहनावे, जीवन शैली सभी में बदलाव आ गया।

यही बात लखनऊ के लोग कहते हैं। अमीनाबाद, हजरतगंज और नवाबी नजाकत और नफासत में पहले जैसा आकर्षण कहां रहा? गिलौटी, चार और दशहरी आम के साथ-साथ लखनवी नखरे, बात करने के अंदाज में अवधी लहजा और जरूरत से ज्यादा तकल्लुफ लखनऊ का मिजाज हुआ करता था। सब जगह रौनक अब भी है, पर पहले जैसी संजीदगी नदारद है। पहले लोगों के पास फुरसत ही फुरसत थी। अब इत्मीनान से बात करने का किसी के पास समय ही नहीं है।

भोपाल के लोग भी यही महसूस करते हैं कि उनका भोपाल पहले जैसा नहीं रहा। नया भोपाल यानी टीटी नगर, एमपी नगर, अरेरा कॉलोनी आदि नए भोपाल की शान हैं। पर इतवारिया, सोमवारिया, मंगलवारिया, लिली टॉकीज कभी पुराने भोपाल की रौनक हुआ करते थे। जिस शान और अंदाज में भोपाली आंखों में सूरमा लगा कर, शेरवानी पहन कर, चूड़ीदार पायजामा और काली बालदार टोपी पहन कर चांदी की मूठ की छड़ी घुमाते चहलकदमी करते हुए नजर आते थे, क्या वह आज मुमकिन है? पुणे के लोग भी कहते हैं कि पुणे कभी सुकून और इत्मीनान से जीने का शहर था। पर आज करीब चालीस लाख की आबादी वाला भीड़-भरा और आइटी कंपनियों का शोरयाफ्ता शहर है। सभी शहरों का यही दर्द है कि उनकी पुरानी शान गायब हो गई है।

जिंदगी की रफ्तार तेज करने, बायपास बना कर कम समय में आवागमन सुविधाजनक करने के उद्देश्य से भी बहुत-से शहर प्रभावित हुए। आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर बायपास के कारण बहुत-से बीच में आने वाले शहरों में गए बगैर सीधे पहुंच सकते हैं। मसलन, आगरा-मुंबई मार्ग पर आप आगरा से सीधे बायपास लेकर पहले से बहुत कम समय में मुंबई पहुंच सकते हैं। पहले ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, देवास, इंदौर, धूलिया और नाशिक होते हुए जाना पड़ता था। अब इन शहरों में जाने की जरूरत ही नहीं है जब तक कि आपको वहां भी न जाना हो। इसी तरह भोपाल से इंदौर बिना सीहोर, आष्टा, सोनकच्छ, देवास गए आ सकते हैं। इस कारण पांच घंटे की यात्रा अब तीन या साढे तीन घंटे में मुमकिन हो गई है। पर इसी के साथ यह भी सच है कि चूंकि ये सभी शहर मुख्य मार्ग से कट गए हैं, इनकी रौनक भी कम हो गई है। व्यवसाय भी प्रभावित हुआ है।

मॉल संस्कृति ने हर शहर के युवाओं को लस्सी, ठंडाई, नींबू-पानी के बजाय कोक, पेप्सी और स्प्राइट की ओर आकर्षित कर दिया है। वे पोहे, कचौरी, बड़ा के बजाय नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, पास्ता और मैगी खाना पसंद करते हैं। चलन के मामले में सभी जगह युवाओं का एक सा हाल है। हर जगह युवा बेहतर अवसर की तलाश में अपने शहर से दूसरे शहर जा रहे हैं। अब विभिन्न शहरों के पहनावे में ज्यादा फर्क नहीं रह गया है। जबकि पहले हर प्रदेश की अपनी वेश-भूषा थी। त्रासदी यह है कि जो हैं वे शहर को अपना शहर नहीं मानते और जिस शहर को वे अपना मानते थे वह बदल गया है।

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