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विकास की परिधि

अजय के. झा सतत विकास लक्ष्यों के लिए वित्त पर बात करने के लिए तेरह से सोलह जुलाई तक इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में दुनिया भर से नेता इकट्ठा हुए थे। सतत विकास लक्ष्य 2015 के बाद संयुक्त राष्ट्र के विकास एजेंडे में उच्च प्राथमिकता में शुमार है। इस वर्ष सितंबर में सतत विकास […]

Author July 23, 2015 1:52 PM

अजय के. झा

सतत विकास लक्ष्यों के लिए वित्त पर बात करने के लिए तेरह से सोलह जुलाई तक इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में दुनिया भर से नेता इकट्ठा हुए थे। सतत विकास लक्ष्य 2015 के बाद संयुक्त राष्ट्र के विकास एजेंडे में उच्च प्राथमिकता में शुमार है। इस वर्ष सितंबर में सतत विकास पर संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन होना है। इसमें कुल सोलह लक्ष्य हैं, जिन्हें सतत विकास पर रियो+20 सम्मेलन के बाद से लगातार जारी अंतरसरकारी प्रक्रियाओं के बाद बनाया गया है। इस सम्मेलन की शुरुआत विकसित देशों के विफल वादों की चर्चा से हुई। 2002 में मैक्सिको के शहर मॉण्टेरी में यह फैसला हुआ था कि विकसित देश अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की भावना से विकासशील देशों को अपनी सकल राष्ट्रीय आय का 0.7 प्रतिशत देंगे। इसे विदेशी विकास सहायता और ओडीए के नाम से जाना जाता है।

2008 में दोहा में हुई एफएफडी की दूसरी बैठक में भी ओडीए पर काफी जोर दिया गया। इसके बावजूद 2014 तक विकसित देश गरीब और विकासशील देशों को अपनी सकल राष्ट्रीय आय का केवल 0.29 प्रतिशत (135 बिलियन अमेरिकी डॉलर) देने में सफल हो पाए हैं। अल्प विकसित देशों के लिए लक्षित ओडीए 0.15 से 0.20 प्रतिशत था, जो घट कर पच्चीस अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है। विकसित देशों में से केवल पांच देश- डेनमार्क, लक्जमबर्ग, नार्वे, स्वीडन और ब्रिटेन अपने ओडीए लक्ष्य को पूरा कर पाए हैं। करीब सत्तर उच्च आय वाले देशों में से कुछ ही देश ओडीए में सहायता देते हैं। कुछ अन्य विकसित देश भी ओडीए में सहयोग प्रदान करते हैं, लेकिन इनके द्वारा दिए गए विकास सहायता पर प्रामाणिक आंकड़ा मिलना मुश्किल है। अधिकतर देशों ने मानवीय सहायता और ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ को भी विकास सहायता में ही शामिल कर लिया है। जबकि इसे प्रतिबद्धता के अनुसार गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित होना था।

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इस सम्मेलन को गरीब और विकासशील देश, अमीर देशों से स्थिर और न्यूनतम इस्तेमाल वाले विकास में आर्थिक, तकनीकी और क्षमता बढ़ाने के क्षेत्र में सहयोग जुटाने के अवसर के रूप में देख रहे थे। मगर विकसित देशों ने इस मौके को अपने वादों से मुकर जाने के अवसर में बदल डाला। संयुक्त राष्ट्र के ‘सतत विकास लक्ष्य और 2015 के बाद विकास’ पर यह बहस पूरी तरह विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेदों के रूप में उभरी है।

विकसित देश इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विकास के लिए आर्थिक आधार जुटाना प्रमुख रूप से संबंधित देशों की जिम्मेदारी है और इसके लिए उन्हें अपने सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात बढ़ाना, विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग को मजबूत बनाना और निजी निवेश को आकर्षित करना चाहिए।

वे इस पर भी जोर दे रहे हैं कि ओडीए को सतत विकास की दिशा में निजी निवेश का लाभ उठाने के तौर पर निर्देशित किया जाए। हालांकि विकासशील देशों ने विकसित देशों द्वारा पहले व्यक्त की गई ओडीए प्रतिबद्धताओं को पूरा करने, कराधान और विकासशील देशों से अवैधानिक आर्थिक प्रवाह की कमियों को दुरुस्त करने, तकनीकी और क्षमता बढ़ाने में सहयोग और जलवायु मुद्राकोष की अपनी मांगें जोरदार तरीके से रखीं। लेकिन आखिरकार सम्मेलन के भविष्य के काम का एजेंडा विकसित देशों के पक्ष में रहा।

विकसित देश अपने प्रस्ताव को सामने रखते हुए यह स्वीकार करना भूल रहे हैं कि यह विकासशील और गरीब देशों से अमीर और विकसित देशों की ओर हो रहे अवैधानिक पूंजी प्रवाह और कराधान की व्यवस्था में मौजूद कमियों को दूर किए बिना संभव नहीं है। भारत ने ऐसी अंतरसरकारी कर निकाय का समर्थन किया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कराधान नियम आइसीडी (आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन) या अन्य विकसित देशों के प्रभुत्व के बजाय सदस्य देशों द्वारा बनाए जाएं।

यानी विकसित देशों की ओर से ओडीए पर अपने वादों और कमियों को पूरा करने की प्रतिबद्धताओं के अभाव में इस बार का सम्मेलन भी पिछले सम्मेलनों की तरह महत्त्वहीन रहा। जी 77 के प्रस्तावों को नकारते हुए आदिस अबाबा एक्शन एजेंडे को बिना किसी बदलाव के अपना लिया गया है। इस दस्तावेज में न तो अंतरसरकारी कर निकाय बनाया गया और न वित्तीय संसाधनों पर कोई नया वादा हुआ। इसलिए भारत के वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा सहित तमाम विकासशील देशों और नागरिक समाज ने भी सम्मेलन में अंतरसरकारी कर निकाय पर बात न होने पर गहरी निराशा जताई।

दरअसल, आदिस अबाबा एक्शन एजेंडे ने मौजूदा वैश्विक आर्थिक प्रणाली में संरचनात्मक अन्याय से निपटने का अवसर गंवा दिया है। इससे न तो दुनिया की मौजूदा चुनौतियों का सामना किया जा सकेगा और न ही आवश्यक नेतृत्व मिल सकेगा। यह एजेंडा 2015 के बाद क्रियान्वयन माध्यम को सहयोग करने में भी अपर्याप्त है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्त में कमी और अनुचित वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संरचना में बिना कोई बदलाव किए, विश्व के गरीबों का स्थिर जीवन जीने का सपना पूरा होता नहीं दिख रहा है।

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