ताज़ा खबर
 

बालहठ के नए तराने

उसे देख कर मुझे गुरु रवींद्रनाथ की कहानी ‘होमकमिंग’ की पंक्ति याद आई, जो चौदह वर्षीय बच्चे के विषय में कही गई है। वह अपनी मां से उतना ही परेशान था, जितनी उसकी मां उससे। मां का कहना था..

Author नई दिल्ली | August 31, 2015 3:07 PM

उसे देख कर मुझे गुरु रवींद्रनाथ की कहानी ‘होमकमिंग’ की पंक्ति याद आई, जो चौदह वर्षीय बच्चे के विषय में कही गई है। वह अपनी मां से उतना ही परेशान था, जितनी उसकी मां उससे। मां का कहना था कि न जाने क्या हुआ है कि जो बच्चा कल तक मां-मां करता था, आज उससे बिल्कुल उलट हो गया है। मां को तंग करना, उसे खिझाना और बार-बार एक ही बात कहने के लिए मजबूर करना उसे अच्छा लगता है। बेटे का कहना था कि मां उसे नहीं समझती, बल्कि किसी हद तक उसके दोस्तों के सामने उसकी खिल्ली उड़वा देती है। मां उसे वह सब छूट नहीं देती, जो उसकी उम्र के उसके सब साथियों को मिली हुई है।

यह सवाल सिर्फ मांग और पूर्ति का नहीं था। यह पूछने पर कि कौन-सी बात मां नहीं मानती और बेटे की इच्छाएं क्या हैं, आजकल के बदलते परिवेश और बाजारवाद का एक और चेहरा सामने आया। चौदह वर्षीय उस किशोर का कहना था कि मां उसे उसके मित्रों के साथ मॉल नहीं घूमने जाने देती, वहां जाकर ‘हुक्का’ नहीं पीने देती। बल्कि हर बात पर कहती है कि मुझे बताओ, मैं तुम्हारे साथ चलती हूं। मेरे सारे दोस्त मेरा मजाक उड़ाते हैं। अनगिनत दुखों में से एक दुख का कारण यह भी था कि उसके दोस्तों के पास महंगे मोबाइल हैं, जबकि उसकी ‘मॉम’ कहती है कि तुम केवल दस हजार का ही मोबाइल ले सकते हो।

मध्यवर्गीय कामनाओं का एक और रूप मेरे सामने था, जहां मॉल में जाकर घूमना ब्रांडेड कपड़े-जूते पहनना और नामी-गिरामी मार्के का भोजन या यों कहिए जंक फूड खाना एक स्टेटस सिंबल बन गया है। मेरी आत्मीय सखी का कहना था कि इसके मॉल जाने का मतलब है रुपए की बर्बादी। बच्चे का मन रखने के लिए मैं ले भी जाती हूं, पर उसे एक बार ले जाने का मतलब है लगभग हजार रुपया यों ही स्वाहा करना। इतने में पंद्रह दिन की सब्जी आ सकती है।’

मैं सोचने लगी कि यह कौन-सा दौर है जिसमें संतानें सिर्फ अपने तक ही सीमित हो रही हैं। माता-पिता उनके लिए साधन जुटाने का जरिया भर रह गए हैं। किशोरावस्था में पहुंचे हुए बच्चे स्वतंत्रता तो विदेशी बच्चों जितनी चाहते हैं, पर उनकी तरह बालिग होते ही खुद कमा कर नहीं खाना चाहते। उनके लिए साधन जुटाने का रास्ता माता-पिता ही हैं। ये बच्चे उस मध्यवर्ग के हैं जिसमें एक या दो संतानें हैं। माता-पिता उन्हें महंगे पब्लिक स्कूलों में पढ़ा कर सोचते हैं कि वे उनका बेहतर भविष्य बना रहे हैं। स्कूली शिक्षा का प्रभाव ऐसा है जहां बच्चों को दिखावे का एक कृत्रिम वातावरण दिया जा रहा है।

हाल ही में एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में मैंने देखा कि लगभग सभी कार्यक्रमों में भारी-भरकम साउंड सिस्टम में बच्चे रिकार्डेड आवाज पर केवल होठ हिला रहे थे। रिकार्डिंग पहले ही कर ली गई थी, समूह गान की भी। यानी ये बच्चे एक कृत्रिम वातावरण में जीना सीख रहे हैं। यहां तक कि स्कूल में खेल दिवस पर भी सब कुछ प्रायोजित होता है, बच्चों की दौड़ भी पहले से ही तय रहती है कि फलां-फलां प्रतियोगिता में कौन-कौन से विद्यार्थी भाग लेंगे। कोई भी ऐसी खुली प्रतियोगिता नहीं, जहां बच्चा अपनी मर्जी से तत्काल निर्णय लेकर भाग ले सके। हां, यह बात जरूर कही जाती है कि शत-प्रतिशत बच्चे भाग ले रहे हैं। लगभग सभी बच्चों को कहीं न कहीं प्रतिभागी बना दिया जाता है, वह चाहे मंच पर समूह बना कर किनारे खड़े रहना हो या दूर से हाथ हिलाना हो। माता-पिता इस सब पर अति उत्साहित होकर अपने कैमरे या मोबाइल फोन से फोटो लेने में मगन रहते हैं।

1931 में लिखे अपने उपन्यास ‘कर्मभूमि’ में जिस शिक्षा-व्यवस्था पर प्रेमचंद ने व्यंग्य किया है, सच पूछिए तो आज आजादी के अड़सठ साल बीत जाने पर भी उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। सारी सुविधाएं मुफ्त देने वाले सरकारी स्कूलों के बजाय क्यों आम लोग पैसा देकर शिक्षा बटोरना चाहते हैं, यह हम सबसे छिपा नहीं है। शिक्षा में सुधार और बदलाव के नाम पर जिन परिवर्तनों को बार-बार का अभ्यास बना लिया गया है, वह विद्यार्थियों को किस ओर ले जा रहा है! केवल स्कूल ही नहीं, उच्च शिक्षा में भी अराजकता का माहौल है। हर एक साल बाद बदलते पैमाने शिक्षा को राजनीति की बिसात का मोहरा बना रहे हैं। बदलाव जरूरी है, पर सवाल सार्थकता का है। यह सार्थकता हमें किस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था देगी, इस पर विचार अभी बाकी है।

(निशा नाग)

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App