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निगरानी बनाम निजता

महेंद्र राजा जैन जब किसी भीड़ वाली जगह से गुजरता हूं तो सुरक्षा का सवाल मन के किसी कोने में मौजूद रहता है। बेशक यह पिछले कुछ सालों में आतंक की बड़ी घटनाओं से उपजे हालात के कारण है। इससे निपटने के उपायों में बाकी जो किए गए, मैं उन सब पर तो बात नहीं […]

Author June 9, 2015 5:51 PM

महेंद्र राजा जैन

जब किसी भीड़ वाली जगह से गुजरता हूं तो सुरक्षा का सवाल मन के किसी कोने में मौजूद रहता है। बेशक यह पिछले कुछ सालों में आतंक की बड़ी घटनाओं से उपजे हालात के कारण है। इससे निपटने के उपायों में बाकी जो किए गए, मैं उन सब पर तो बात नहीं करूंगा, लेकिन जिस सीसीटीवी यानी गुप्त कैमरे का चलन हाल के सालों में देश भर में फैला है, वह अब केवल सुरक्षा पर केंद्रित नहीं है। आजकल सभी बड़े शहरों में मॉल, छोटे-बड़े व्यावसायिक परिसरों, रेस्तरां, होटल आदि में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। सवाल है कि हर समय उनमें जो कुछ रिकार्ड होता रहता है, उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है? कुछ खास जगहों पर गोपनीयता की अनिवार्यता को कैसे बनाए रखा जाता है?

स्टोर मालिकों की यह बात सही है कि इन कैमरों से चोरी करने वालों का पता आसानी से लगाया जा सकता है। जन-साधारण की जान-माल की सुरक्षा और अपराधियों या कानून न मानने वालों को पकड़ने में भी ये कैमरे सहायक होते हैं। इसी कारण मेट्रो या रेलवे स्टेशन, दफ्तरों, बड़ी इमारतों, लिफ्ट, ट्रैफिक सिग्नल, हवाई अड्डे, ट्रेन, बसें और सार्वजनिक स्थानों पर भी आमतौर पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। कुछ संपन्न लोगों ने अपने घरों में भी सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं, जिससे उनके यहां आने वाले लोगों की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। लेकिन इस बात पर शायद ही किसी का ध्यान जाता है या कोई यह सोचता भी नहीं कि इन कैमरों में जो कुछ रिकार्ड होता है, क्या वह वास्तव में ‘सुरक्षित’ है?

सभी जानते हैं कि दिल्ली में मेट्रो जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड कई वीडियो संबंधित लोगों की जानकारी या स्वीकृति के बिना समय-समय पर इंटरनेट पर डाले जाते रहे हैं। निगरानी करने के लिए लगाए गए कैमरे के पीछे की आंख किसी कामुक व्यक्ति की भी हो सकती है। कैमरे की जद में आने वाले लोगों, खासतौर पर महिलाओं का इससे कोई बचाव नहीं है। इसके अलावा, आजकल ज्यादातर लोग ऐसे मोबाइल फोन रखने लगे हैं, जिनमें कैमरे और रिकार्डिंग की सुविधा भी होती है। भले ही इसकी अलग उपयोगिता हो, पर इसके गंभीर नकारात्मक परिणाम भी सामने आते रहते हैं। हालांकि महाराष्ट्र और खासतौर पर मुंबई में महिलाओं को इस प्रकार के फोन का उपयोग करना सिखाया जा रहा है, जिससे वे महिलाओं पर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा की घटना रिकार्ड कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में देहाती इलाके में कुछ महिला रिपोर्टर ऐसी घटनाओं को रिकार्ड करने लगी हैं। इनकी रिपोर्ट उनके अपने अखबार ‘खबर लहरिया’ में छपती भी हैं।

शहरों में भी युवतियां मोबाइल फोन का उपयोग एक प्रकार के ‘सुरक्षा यंत्र’ के रूप में करने लगी हैं। सफर के दौरान वे टैक्सी ड्राइवरों की तस्वीरें भी लेने लगी हैं और फोन पर बात कर अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत भी दे देती हैं कि वे बराबर किसी के संपर्क में हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मोबाइल फोन ने सुरक्षा की दृष्टि से स्त्रियों के जीवन में बहुत परिवर्तन ला दिया है। लेकिन इसका एक नकारात्मक पक्ष भी है। किसी पुरुष के हाथ में मोबाइल फोन स्त्रियों को परेशान करने का एक साधन भी साबित हो रहा है। अनचाहे और अप्रिय संदेश से लेकर निजी क्षणों की तस्वीरें लेकर या वीडियो बना कर महिलाओं को ब्लैकमेल किए जाने की घटनाओं से हम अनजान नहीं हैं। महिलाएं कई बार भयवश या किसी अन्य कारण से ऐसे पुरुषों के खिलाफ कुछ नहीं बोलतीं या बोल नहीं पातीं। हमारे देश में दरअसल निजता नाम की शायद कोई चीज नहीं रह गई है और अगर है भी तो केवल संपन्न धनी परिवारों के लिए। मध्यवर्गीय और गरीब परिवार के लोग, खासकर स्त्रियों को तो पता भी नहीं होता कि उनकी निजता का हनन कहां-कहां और कैसे किया जाता है।

शायद यही वजह है कि सीसीटीवी कैमरों के जरिए निजता के हनन के पहलू पर जैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए, विरोध की जैसी आवाज सुनाई पड़नी चाहिए थी, वह नहीं दिखती। यह समझना चाहिए कि तकनीक अपने उपयोगकर्ता की नीयत के हिसाब से हमेशा ही पक्षपातरहित नहीं होती। इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि सुरक्षा और निगरानी का यह हथियार अगर लोगों, खासतौर पर स्त्रियों की निजता को भंग करने या उसके बेजा इस्तेमाल में काम आता है तो उसका समाधान क्या होगा!

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