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भाड़े की खुशी

पम्मी सिंह विवाह समारोह के शोर-शराबे और हंसी-ठिठोली के बीच एक आवाज मुझे चौंका गई। एक पुरुष स्त्री जैसी आवाज में विवाह की रस्मों से जुड़े गीत गा रहा था। बेहद साधारण वेशभूषा का वह शख्स रिश्तेदारों या परिचितों में से नहीं था, जो वहां विवाह में भागीदार बनने के लिए इकट्ठे हुए थे। हैरानी […]

Author April 14, 2015 10:14 AM

पम्मी सिंह

विवाह समारोह के शोर-शराबे और हंसी-ठिठोली के बीच एक आवाज मुझे चौंका गई। एक पुरुष स्त्री जैसी आवाज में विवाह की रस्मों से जुड़े गीत गा रहा था। बेहद साधारण वेशभूषा का वह शख्स रिश्तेदारों या परिचितों में से नहीं था, जो वहां विवाह में भागीदार बनने के लिए इकट्ठे हुए थे। हैरानी हुई तो मैंने उसके बारे में जानकारी पाने की कोशिश की। शादी रांची (झारखंड) के एक मंदिर में हो रही थी। कुछ लोगों ने बताया कि शादियों के मौसम में यह व्यक्ति हर रोज इस मंदिर के आसपास देखा जाता है। किसी का विवाह हो, वह बिना बुलाए आकर स्त्री की आवाज में शादी के गीत गाने लगता है। मौका खुशी का होता है, तो लोग उसे पैसे और कई बार कपड़े भी दे देते हैं। यही उसका पेशा है। मगर उसे देख कर यह नहीं लगा कि जितना वह कमाता है, उससे आराम से उसका जीवन-यापन होता होगा।

रांची की उस शादी में शामिल होने के कुछ हफ्तों के बाद जयपुर में एक विवाह समारोह में जाने का मौका मिला। वह शादी एक बड़े होटल में हो रही थी। वहां एक महिला थी, जो लाल-पीली चमकीली राजस्थानी वेश-भूषा में थी और ढोलक जैसा वाद्य यंत्र बजा रही थी और राजस्थान की लोकभाषा में शादी के गीत गा रही थी। उसके बारे में मालूम हुआ कि जब उस होटल में विवाह की रस्में होती हैं, तो मेजबान के कहने पर होटल के लोग उसे बुला देते हैं। तो झारखंड से राजस्थान तक एक जैसे पात्रों से मेरी मुलाकात हुई। उस महिला ने बताया कि वह घरों में जाकर भी शादी की रस्मों के गीत गाती है। चूंकि वह बड़े होटल में भी गाती है, तो शायद उसे ज्यादा पैसे या तोहफे मिल जाते होंगे। मुमकिन है कि उसका गुजर-बसर रांची वाले पुरुष की तुलना में बेहतर ढंग से होता होगा।

मगर दोनों में एक बात समान है। दोनों दूसरों की खुशी को अपने चेहरे और आवाज से व्यक्त करते हैं। एवज में पैसा मिलता है। मैंने सोचा कि अपना काम निपटा कर जैसे ये मुक्त होते होंगे, उनकी आवाज की खनक, सजावट या खुशी का क्या होता होगा, जिनकी वजह से अनगिनत अपरिचित लोगों को वे उपयोगी लगते हैं। पहले शादियों में परिवार की महिलाएं ही विवाह गीत गाती थीं। शहरी जीवन में लोक गीतों या लोक भाषा के गीतों की गुंजाइश नहीं बची। बहुत-सी महिलाएं उन गीतों से परिचित भी नहीं हैं। कुछ हैं तो वे यह सोच कर नहीं गातीं कि कहीं उन्हें गंवार न समझ लिया जाए। अन्य लोक गीतों की तरह विवाह के गीत भी अक्सर मधुर लगते हैं। यह मुद्दा है कि उनमें कई गीत स्त्री विरोधी या पुरुष वर्चस्व की सामाजिक मानसिकता की पुष्टि करते हैं।

मगर अब विवाह समारोह ‘इवेंट’ बन गए हैं और एक ‘थीम’ को लेकर उनका आयोजन किया जाता है। समारोह स्थल की सजावट से लेकर दूल्हा-दुल्हन के कपड़े तक उसी ‘थीम’ के मुताबिक होते हैं। जो ‘संगीत’ और जो ‘डांस’ होता है, उसके लिए कोरियोग्राफर या प्रशिक्षक बुलाए जाते हैं। इस महंगे धंधे को आज समृद्ध वर्गों का बड़ा बाजार मिला हुआ है। लेकिन मैं बात कर रही थी ऐसे लोगों की जो किसी संगठित कारोबार का हिस्सा नहीं हैं, न ही उत्सवों से उनका कोई सीधा संबंध रहता है। उत्सवों में वे उल्लास दिखाते हैं तो इसलिए कि उससे उनकी एक-दो वक्त की रोजी-रोटी का इंतजाम हो जाता है।

बात को बड़े पैमाने पर ले जाएं तो उनकी तुलना आइपीएल टी-20 मैचों या कुछ दूसरे खेल आयोजनों में चहकती-दमकती नजर आने वाली ‘चीयरगर्ल्स’ से की जा सकती है। उन महिलाओं को भी किसी टीम या उसकी हार-जीत से मतलब नहीं होता। वे वहां सिर्फ खुशी दिखाने की ड्यूटी निभाने के लिए होती हैं, जिसके बदले उन्हें पैसा मिलता है। कल्पना लाजमी की फिल्म ‘रुदाली’ याद आती है। फिल्म ऐसी महिलाओं पर थी, जिन्हें राजस्थान के गांवों में किसी की मृत्यु पर रोने के लिए बुलाया जाता था। मुमकिन है कि कहीं ये प्रथा आज भी जारी हो। रुदाली की पात्र काजल लगा कर आंख में आंसू लाती थी। लेकिन एक रोज एक बनावटी रुदाली के मौके पर उसे अपनी मां के मरने की खबर मिली तो वह सचमुच रो पड़ी। यह दिल को छू लेने वाला भावनात्मक चित्रण था।

खुश और दुखी होना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। यह तब होता है, जब उसे उनसे जुड़े भाव महसूस हों। फिल्म या नाटक में जब कोई कलाकार कृत्रिम स्थितियों में ऐसे भावों को चेहरे के हाव-भाव से व्यक्त करता है तो हम उसके ‘अभिनय’ के कायल हो जाते हैं। कलाकारों का मूल्यांकन इसी क्षमता से किया जाता है। लेकिन ‘चीयरगर्ल्स’ से लेकर शादी के गीत-गायकों का मूल्यांकन करने की किसे फिक्र है! वे कुछ घंटों के साथी होते हैं। बदले में ‘कुछ’ मिल जाता है। उनकी यह अनंत यात्रा है, रोटी के चंद टुकड़ों के लिए!

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