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बेटियों की जगह

महेंद्र राजा जैन महिलाओं को सक्षम और सशक्त बनाने के लिए लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक अंदोलन चल रहे हैं। खुद सरकार भी विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए इस मुद्दे पर सक्रिय दिखती है। अब यह बदलाव पटल पर भी दिखने लगा है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्त्री शक्ति के प्रदर्शन ने बहुत […]
Author May 2, 2015 08:03 am

महेंद्र राजा जैन

महिलाओं को सक्षम और सशक्त बनाने के लिए लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक अंदोलन चल रहे हैं। खुद सरकार भी विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए इस मुद्दे पर सक्रिय दिखती है। अब यह बदलाव पटल पर भी दिखने लगा है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्त्री शक्ति के प्रदर्शन ने बहुत लोगों के साथ-साथ मेरा ध्यान भी खींचा। हालांकि इसके लगभग सत्तर वर्ष पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने ‘रानी झांसी रेजीमेंट’ का गठन कर स्त्रियों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का आह्वान किया था। इसलिए गणतंत्र दिवस के अवसर पर निकाली गई परेड में और विशेषकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत के तीन दिवसीय दौरे पर स्त्री शक्ति के प्रदर्शन पर हम भारतीयों को गर्व होना चाहिए।

इसकी शुरुआत गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले, यानी पच्चीस जनवरी को राष्ट्रपति ओबामा के सम्मान में विंग कमांडर पूजा ठाकुर के नेतृत्व में दिए गए ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ से हुई। यह पहला अवसर था, जब किसी विदेशी राष्ट्रीय मेहमान को किसी महिला अफसर ने ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया। इसके बाद दूसरे दिन जब राष्ट्रपति ने राष्ट्रध्वज फहराया तो सेना की एक महिला अफसर उनके बगल में खड़ी थी। फिर गणतंत्र दिवस की परेड में तीनों सेनाओं की सैकड़ों महिलाओं ने भाग लिया। इससे निश्चय ही देश की बहुत सारी महिलाओं को सेना में भर्ती होने की प्रेरणा मिली होगी कि उन्हें भी अपनी प्रच्छन्न शक्ति का प्रदर्शन करने का अवसर मिल सकता है।

लेकिन इस हकीकत को भी नकारा नहीं जा सकता कि देश में अभी भी सामाजिक दृष्टि से पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का दरजा दोयम स्तर का ही माना जाता है। यह पक्षपात दरअसल जन्म के पहले से ही शुरू हो जाता है, जब परिवार में लड़के की चाहत कन्या भ्रूणहत्या का कारण बनती है। देश के कई भागों में इसका एक परिणाम यह हुआ है कि कहीं-कहीं पूरे गांव में एक भी लड़की नहीं है और इन गांवों के लड़कों के विवाह के लिए देश के दूसरे भागों से गरीब लड़कियां लाई जाती हैं। इसके लिए आमतौर पर अच्छी-खासी रकम भी चुकानी पड़ती है। कोई आश्चर्य नहीं कि इसी कारण आज देश में प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले नौ सौ उन्नीस लड़कियां ही हैं। जबकि अमेरिका में यही अनुपात एक हजार उनतीस और यूरोप में एक हजार छिहत्तर लड़कियों का है।

हमारे देश में अगर कन्या भ्रूण किन्हीं स्थितियों में बचा भी रह जाता है तो जन्म लेने के बाद लड़की को जीवन भर तरह-तरह के पक्षपात से जूझना पड़ता है। समाज की यह तस्वीर किसी से छिपी नहीं है कि लड़कों की अपेक्षा कम लड़कियों को स्कूलों में भेजा जाता है। यही नहीं, जो लड़कियां स्कूलों में प्रवेश पाती भी हैं तो आगे माध्यमिक कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते लड़कों की अपेक्षा अधिक संख्या में स्कूल छोड़ चुकी होती हैं, भले ही स्कूल में उनका शैक्षणिक रिकार्ड लड़कों की अपेक्षा बेहतर रहा हो। इस मसले पर समय-समय पर होने वाले अध्ययनों में इस हकीकत की पुष्टि हुई है।

आज ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा और उसके लिए सरकार की ओर से बनाई गई योजनाओं की तारीफ की जा सकती है। मगर इसके साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध पहले के मुकाबले काफी बढ़ गए हैं। सामाजिक रवैए की हालत यह है कि मुख्य रूप से दहेज या फिर किसी न किसी वजह से उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, कई बार मार डाला जाता है या फिर आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया जाता है। अगर किसी तरह वे बच जाती हैं तो घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं और उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया का अस्तित्व स्त्रियों के अस्तित्व पर निर्भर है। सरकार अगर ‘बेटी बचाओ’ का नारा दे रही है, तो उसे समाज को यह शक्ल भी देनी चाहिए कि बेटियों का न केवल जीवन सुरक्षित हो, बल्कि उनकी अस्मिता और गरिमा भी बहाल हो। पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों ने आज हालत यह कर दी है कि समाज का पूरा नजरिया ही स्त्री विरोधी लगता है। इस तरह की अमानवीय दृष्टि के रहते अगर सरकार या हमारे देश का राजनीतिक वर्ग सोच रहा है कि वह बेटियों को बचा लेंगे तो यह महज सपना है। एक व्यक्ति के रूप में स्त्री अगर अपना जीवन जिएगी तो उसे अलग से बचाने की किसी योजना की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए बेटियों को बचाने के साथ सामाजिक दृष्टि को पितृसत्ता और पुरुषवाद से आजाद करना होगा। इसके बिना ‘बेटी बचाओ’ का कोई भी नारा खोखला होगा।

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