बैलों का संगीत

प्रेम सदानंद शाही बात पिछले साल गरमी की है। मैं छुट््िटयों में अपने गांव गया हुआ था। कुशीनगर जनपद के रामकोला कस्बे में हम लोगों ने स्त्री शिक्षा के लिए एक महाविद्यालय खोला है। दो-तीन साल पहले कवि केदारनाथ सिंह ने वटवृक्ष लगा कर इस महाविद्यालय की स्थापना की थी। कुशीनगर जनपद मेरी जन्मभूमि है, […]

प्रेम सदानंद शाही

बात पिछले साल गरमी की है। मैं छुट््िटयों में अपने गांव गया हुआ था। कुशीनगर जनपद के रामकोला कस्बे में हम लोगों ने स्त्री शिक्षा के लिए एक महाविद्यालय खोला है। दो-तीन साल पहले कवि केदारनाथ सिंह ने वटवृक्ष लगा कर इस महाविद्यालय की स्थापना की थी। कुशीनगर जनपद मेरी जन्मभूमि है, तो यह लंबे समय तक केदारनाथ सिंह की कर्मभूमि रहा है। वे जब-तब इस इलाके में आते रहते हैं। इधर आने पर वे अपने लगाए वटवृक्ष और महाविद्यालय का हाल लेने जरूर आ जाते हैं। वे आए हुए थे। हम लोग परिसर में घूम रहे थे। अचानक हमारी नजर एक बछड़े पर गई, जो इधर-उधर कुलांचे भर रहा था। हम लोग यही मान रहे थे कि कहीं से घूमता-फिरता आ गया होगा। लाल रंग के बछड़े का कुलांचे भरना मन ही मन अच्छा भी लग रहा था।

केदारजी और दूसरे अतिथियों के जाने के बाद मैंने अपने छोटे भाई राधेगोविंद शाही से बछड़े के बारे में पूछा। राधेगोविंद बहुत दुखी और परेशान थे। हमारी एक गाय किसी किसान के यहां पल रही है। इसे हमारी तरफ बटाई पर देना कहते हैं। वही किसान बछड़े को चुपके से महविद्यालय परिसर में छोड़ गया था। खेती-किसानी का काम पीछे छूटता जा रहा है। ऐसे में बैलों की भूमिका खत्म हो रही है। इसलिए बछड़ों की कोई कीमत नहीं रह गई है। एक जमाना था जब बछड़े वाली गाय ज्यादा दाम में बिकती थी। बछड़ा बड़ा होकर बैल बनता था। खेती के काम आता था। बैलगाड़ियां चलती थीं। बैल ऊंचे दाम पर बिकते थे। सोनपुर मेले तक से खरीद कर लाए जाते थे। मुझे याद है, गांव में कुछ लोग फेरहाई का काम करते थे। उन्हें फेरहा कहा जाता था। वे बैल खरीदवाने-बेचवाने का काम करते थे। अब खेती-किसानी में बैलों की भूमिका खत्म हो चली है। इसलिए बछड़ों की भी उपयोगिता खत्म हो गई है। बछड़े एक समस्या हो गए हैं। उन्हें रखना और खिलाना एक मुसीबत है। चारागाह रहे नहीं। बाजार से बछड़े के लिए चारा खरीदें कि घर वालों के लिए दाना-पानी जुटाएं! बछड़ों को बेचना दूसरी मुसीबत है क्योंकि वे सिर्फ कसाई के हाथ बिक सकते हैं। और बछड़े को कसाई के हाथ बेचने की कल्पना ही यातनादायी है।

बैलों ने जमाने से आदमियों का साथ दिया है। अब अचानक उन्हें कसाई के हाथ कैसे सौंप दें! किसान मन की इस पीड़ा को वे लोग भली-भांति समझेंगे, जिनमें किसानी की स्मृति बची हुई है। प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ हमें बताती है कि बैल किस तरह आदमी से जुड़े हुए हैं। एक जमाने में आदमी की हैसियत इस पर निर्भर थी कि वह कितने बैलों की खेती करता है। आज स्थिति एकदम उलट है। ऐसे में लोगबाग चुपचाप बछड़ों को उनकी नियति पर छोड़ दे रहे हैं, जैसे कि वह किसान बछड़े को महाविद्यालय में छोड़ गया था। मेरा भाई जो मन और कर्म से किसान ही है- बछड़े की नियति से दुखी है। दुखी मैं भी हूं। अपने सदियों पुराने साथी को कू्रर नियति से न बचा पाने की अक्षमता से। केदारजी के नए संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ में एक कविता है- बैलों का संगीत प्रेम। बैल और आदमी के बीच आ खड़ी हुई इस क्रूर नियति को पहचानती हुई कविता है: ‘शहर की ओर जाते हुए/ अपनी बीहड़ आजादी में/ ठिठक गए थे बैल/ बगल के खेत में ट्रैक्टर के चलने का/ संगीत सुनते हुए/ कितना त्रासद था/ कितना मुग्धकारी/ बैलों का वह संगीत प्रेम/ यह मेरे समय का संगीत है-/ मैंने स्वयं से कहा।’

और केदारजी के साथ मैं भी ठिठका हुआ हूं। आज जब पर्यावरण की इतनी चिंता की जा रही है, जैविक खेती और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की बात हो रही है, ऐसे में क्या ऊर्जा के परंपरागत स्रोत रहे बैलों की हमारे जीवन में कोई भूमिका हो सकती है!

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