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बचपन के रंग

विष्णु नागर जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड का नामोनिशान नहीं है। बड़ा पोता सवा पांच साल का और छोटा सात महीने का है। खैर, बड़ा पोता शुरू से खाने-पीने के मामले में काफी तंग करने वाला रहा है […]

विष्णु नागर

जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड का नामोनिशान नहीं है। बड़ा पोता सवा पांच साल का और छोटा सात महीने का है। खैर, बड़ा पोता शुरू से खाने-पीने के मामले में काफी तंग करने वाला रहा है और छोटा पहले दिन से दूध पीने से लेकर अब खिचड़ी और उबाल कर घोल के रूप में केला मजे से खाता है। बड़ा इस उम्र तक जैसा उसका पिता हुआ करता था खाने-पीने के मामले में, लगभग उसी पर गया है। बहुत सीमित चीजें खाता है। यों बाद में उसके पिता ने भी ठीक से खाना-पीना सीखा था, शायद यह भी सीख जाए। खैर, आजकल इन बड़े पोते को खाने के मामले में अपनी मां से और मां न हो तो दादाजी से होड़ लगाने का चस्का चढ़ा हुआ है। जाहिर है कि हमें उनसे हारना ही पड़ता है। अपने बच्चों से हारना किसे अच्छा नहीं लगता! और हारें नहीं तो इस तरह की होड़ का उद्देश्य ही समाप्त हो जाए कि उनसे हार कर उसे खाने के लिए प्रेरित करना है! लेकिन कई मामलों में हमारे ये बड़े पोते साहब जल्दी समझ जाते हैं कि हम उसे बेवकूफ बना रहे हैं।

हम उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए बहुत धीरे-धीरे चिड़िया की तरह दाना चुगते हैं, मगर जल्दी-जल्दी खाने का ढोंग करते हैं। जिस पीढ़ी के वे हैं, हारना उन्हें स्वीकार नहीं है। उनकी इस कमजोर नस का अभी तक फायदा उठाया जा रहा है। यह भी लगता है कि जल्दी-जल्दी खाने के चक्कर में कहीं वे बिना चबाए न खाने लगें! तो हमें चबा-चबा कर खाकर उन्हें दिखाना होता है। कभी हम खा चुके होते हैं तो भी थोड़ा कुछ कटोरी में लेकर उनसे खाने की रेस लगाते हैं। इसमें क्यों बार-बार हम हार जाते हैं, वे यह भी हमें बताते हैं और उपदेश देते हैं कि हम खाने के साथ बोलते हैं, खाने पर पूरा ध्यान नहीं लगाते। जबकि असल बात यह है कि बोलने के मामले में वे हमारे चचा हैं। जहां तक दूसरे उपायों का सवाल है, उनमें हम फेल हैं। एक उपाय हम यह करते हैं कि चम्मच को उनके पास कभी हवाई जहाज की तरह शोर मचाते हुए उनके मुंह तक लाते हैं, कभी ट्रेन की तरह, कभी मेट्रो के रूप में, कभी बस के रूप में तो कभी क्रेन के रूप में, और इसके साथ दूसरी चम्मच जल्दी लाना, ताकि वे उस खाने को मुंह में न रखे रहें। हालांकि ऐसा करने में वे माहिर हैं।

दूसरे उपायों में यह है कि उनकी पसंद के कार्टून धारावाहिक उन्हें दिखाते जाना और खाना मुंह में ठूंसते जाना। हालांकि यह काम आसान नहीं है। वे कार्टून देखने में इतना गाफिल हो जाते हैं कि खाना भूल जाते हैं। हमारी कुछ ऐसी छवि बन गई है कि हम डांटें तो भी उन्हें लगता है कि दादाजी मजाक कर रहे हैं और वे हंसने लगते हैं। हम अपनी इस लोकप्रियता को अपने पोते के बीच कायम रखने के लिए यह कठिन काम उनकी मां को सौंप देते हैं जो साम-दाम-दंड से उनसे निबटती हैं!

छोटे पोते की हमने तारीफ की है और हमारे साथ-साथ उनके मां-बाप भी उनसे बहुत खुश हैं। वे मुख्य रूप से मां का दूध पीते हैं, मगर उनकी कामकाजी मां नौकरी पर जाते हुए छोटे बच्चे के लिए दूध निकाल कर छोड़ जाती हैं। उस दूध को पिलाना एक चुनौती है। वे जब रोने लगते हैं, तो उन्हें चम्मच से पिलाना पड़ता है और यह काम पहले से आसान है। कोई एक व्यक्ति उन्हें चम्मच से दूध पिलाता है और एक या दो लोग उनके मनोरंजन का प्रबंध करते हैं। खिलौने से उन्हें तरह-तरह का संगीत सुनाते हैं। तब जाकर कभी काम चल जाता है और कभी उससे भी नहीं चलता। कभी उनके बड़े भाई उनके सामने नाच-गाकर दिखाते हैं, कभी घर में होने पर उनके पिताजी। तब जाकर नैया पार लगती है! इस बीच कभी वे मुंह से फुर्र-फुर्र की आवाज निकालते हैं, कभी ऊपर चल रहे पंखे को देख कर हंसते-मुस्कराते हैं, कभी गुड़-गुड़ करना शुरू कर देते हैं, कभी मुंह में जो दिया है, उसे बाहर निकाल देते हैं, कभी ताली बजाने लग जाते हैं या रोना शुरू कर देते हैं और कभी रोते-रोते भी ताली बजाने लगते हैं। यों खिचड़ी और केले को उबाल कर उसका पेस्ट बना कर खिलाना उन्हें आसान है। अब वे नए-नए खेल खेलने लगे हैं तो हमें भी नए-नए करतब करने होंगे।

 

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