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आभासी पाठ की सीमाएं

आनलाइन शिक्षा को बड़ी पूंजी वाली कंपनियों ने एक नए क्षेत्र की तरह देखा है। वे भारी निवेश न सिर्फ सामग्री तैयार करने में कर रहे हैं, बल्कि विद्यार्थियों द्वारा घर बैठे पका-पकाया ‘ज्ञान’ हासिल करने की प्रवृत्ति में बढ़ाने में भी ध्यान लगा रही हैं।

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। सोर्स- Pixabay

आलोक रंजन

उस दोपहर हम कुछ सहयोगियों के बीच आनलाइन कक्षाओं में विद्यार्थियों की क्रमश: बढ़ती जा रही अनुपस्थिति पर बातें हो रही थी। सबकी चिंता में यह बात थी कि इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्रियों ने पढ़ने वालों में आनलाइन कक्षाओं के लिए अरुचि जगाई है। अब विद्यार्थी ‘बाद में पढ़ लेंगे’ वाले भाव में चले गए हैं। जब शुरू में इस तरह की दूरस्थ पढ़ाई आरंभ हुई थी तो पढ़ाने वाले सीख रहे थे और पढ़ने वालों में सहज उत्सुकता थी। अब जबकि अध्यापक-अध्यापिकाओं ने बहुत कुछ सीख लिया है, तब विद्यार्थियों की रुचि खत्म हो रही है।

इसके तमाम मनो-सामाजिक कारण हैं, जिन पर निश्चित रूप से कहीं न कहीं अध्ययन चल रहा होगा, लेकिन विद्यालयी या महाविद्यालयी व्यवस्था उन शोधों के सार्वजनिक होने का इंतजार नहीं कर सकती। हालांकि ये शोध भी अपनी सीमाओं से लैस होते हैं। शिक्षण संस्थाओं में समस्याओं की तात्कालिकता के कारण परिणाम और सुधार की प्रक्रिया इंतजार नहीं हो पाता। ऐसी बातचीत में कठघरे में अक्सर अध्यापक होते हैं कि आपकी जिम्मेदारी है कक्षा को ऐसा बनाना, ताकि पढ़ने वाले आपकी कक्षा के लिए लालायित रहें।

कक्षा को रोचक और प्रभावी बनाना शिक्षणकर्मी का काम है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ये सब भी काम नहीं आ रहे हैं। रोचक से रोचक कक्षाओं में उपस्थिति कम हो रही है। नेट पर उपलब्ध सामग्रियां विद्यार्थियों की सहायक बन रही हैं। एक अध्याय का सारांश उन्हें कक्षा के चौथाई से भी कम समय में मिल जा रहा है। और ‘स्क्रीनशाट’ जैसी चीज ने लिखने तक की जहमत उठाने से बचा दिया है तो सारा खेल ‘डेटा पैक’ का रह गया है। जिस हिसाब से परीक्षाएं आनलाइन हो रही हैं उसमें वे ‘स्क्रीनशाट’ और ‘गूगल’ मदद कर रहे हैं। आमतौर पर कक्षा में मुंह न खोलने वाले विद्यार्थियों के अंक खूब सारे आ रहे हैं और एक सामान्य अध्यापकीय चिंता यह हो रही है कि परीक्षाएं करवाई ही क्यों जाएं!

आनलाइन शिक्षा को बड़ी पूंजी वाली कंपनियों ने एक नए क्षेत्र की तरह देखा है। वे भारी निवेश न सिर्फ सामग्री तैयार करने में कर रहे हैं, बल्कि विद्यार्थियों द्वारा घर बैठे पका-पकाया ‘ज्ञान’ हासिल करने की प्रवृत्ति में बढ़ाने में भी ध्यान लगा रही हैं। विद्यार्थी अलग-अलग स्रोतों से अपने माफिक तरीकों से सीखें, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इसके साथ यह भी एक बड़ा सच है कि कक्षा में सीखने का कोई विकल्प नहीं है। इंटरनेट पर शिक्षण सामग्री की व्याप्ति से पढ़ने वालों में एक तरह की निश्चिंतता आ जाती है कि किसी भी समय पढ़ लिया जाएगा।

इसमें भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन सामग्रियों की गुणवत्ता, उसके माध्यम से दिए जा रहे सामाजिक मूल्य आदि के बारे में मुतमइन नहीं हुआ जा सकता। पाठ सामग्री प्रदान करने वाले साधारण यूट्यूबर से लेकर बड़ी-बड़ी शिक्षा कंपनी की सामग्रियों में संकल्पना सीखने, सारांश और प्रश्न आदि हल करने पर ही जोर है। विषय से आम जीवन का जुड़ाव वहां नहीं है, समाज के वर्तमान और तात्कालिक प्रश्न, व्यक्तिनिष्ठता आदि के कोई सूत्र वहां नहीं मिलते।

इस प्रकार की पढ़ाई के बारे में यह कहा जा सकता है कि गणित, विज्ञान आदि विषय में यही काम आता है। वहां वस्तुनिष्ठ होकर रहने से ही ‘अंक मिलते’ हैं। लेकिन सीखने-सिखाने की यह प्रक्रिया समस्याग्रस्त है। यह हाल तब है, जब विज्ञान और गणित जैसे विषयों में भी परिस्थिति आधारित प्रश्न पूछे जाने लगे हैं, जहां विद्यार्थियों की कड़ी से कड़ी जोड़ने की समझ को परखा जा रहा है, नियमों, सिद्धांतों की सामाजिक उपादेयता की समझ को देखा जा रहा है।

फिर भाषा, समाज विज्ञान, वाणिज्य, कला आदि विषयों की बात ही क्या! उपलब्ध सामग्रियां ऐसी नहीं हैं कि इतिहास को भूगोल से जोड़ सके और उसकी राजनीति को समझ सके। पढ़ने वाले विज्ञान के नियम तो सीख रहे हैं, लेकिन उनसे आम आदमी का कितना भला हो सकता है, इस पर ये सामग्रियां मौन हैं।

हाल में बेबी हालदार का लिखा हुआ ‘आलो-अंधारि’ का एक हिस्सा ग्यारहवीं में पढ़ा रहा था। उसके लिए सहायक अध्ययन सामग्री खोजते हुए यह देखा गया कि हर जगह पाठ का सार बताने पर जोर है। पढ़ने वाले बेबी के जीवन की घटनाएं तो जान जाते हैं, लेकिन स्त्री की निरंतर संघर्षशील स्थिति का जिक्र किसी सामग्री में नहीं होने की वजह से उन तक नहीं पहुंचता है। ऐसी सामग्री के भरोसे भाषा-साहित्य के माध्यम से पहुंचने वाले लोकतांत्रिक, सामाजिक मूल्य आते ही नहीं।

अव्वल तो संसाधनों के अभाव में देश में आनलाइन प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी बहुत कम हैं, जो हैं उनके लिए जो अध्ययन सामग्रियां हैं, वे भरोसे के लायक नहीं हैं। इंटरनेट कक्षा आधारित पाठ का सहायक हो सकता है, लेकिन अब तक वह इस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि अध्यापक को अप्रभावी कर दे।

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