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आभासी सौंदर्यबोध

चिंतक लोर्का ने एक स्थान पर लिखा है कि ‘जीवन और कुछ भी नहीं है, बल्कि घटनाओं से भरा हुआ एक संघर्ष है।’ इसके अर्थ अब शायद बदल गए हैं।

dunia mere aage, aesthetic of lifeगांव की सुंदरता और जीवन का प्राकृतिक सार को प्रकट करता है यह दृश्य। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव)

कृष्ण कुमार रत्तू

इन दिनों पूरा विश्व आभासी दौर से गुजर रहा है। अमूमन हर काम या फिर समारोह आभासी स्वरूप यानी ‘वर्चुअल मोड’ पर होने लगे हैं। साधारण शब्दों में कहें तो इंटरनेट के जरिए ही ये काम संपन्न हो रहे हैं। महामारी के दौर की यह तकनीकी दुनिया का शायद कमाल ही है, जिसने दुनिया और भी छोटी कर दी। यों इससे पहले ही हमारी निर्भरता इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बढ़ती जा रही थी, लेकिन पिछले करीब साल भर के दौरान इस आभासी दुनिया में हम कहीं ज्यादा गुम होने लगे हैं और इस तरह जिंदगी का रस कहीं गंवाने लगे हैं। जीवन का अस्त्तिव तत्त्व यानी जीवन का सौंदर्यबोध लुप्त होने लगा है, जिसकी खुशबू से इस जिंदगी और समाज के सारे रिश्ते महकते रहते थे। अब इसका नया चलन आभासी सौंदर्यबोध हो गया है और यह जीवन का सत्य भी होने लगा है।

सच कहें तो जिंदगी का सौंदर्यबोध ही जिंदगी का स्थायी सत्य है। मगर हमारी विडंबना यह है कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम अपने जीवन के तमाम सौंदर्यबोध को देख नहीं पा रहे हैं, या यों कहें कि जीवन के सत्य से आंखें चुरा रहे हैं, खुद को ओझल कर रहे है। यह भी सच है कि आज की बदलती हुई जीवनशैली और चकाचौंध से भरी जिंदगी में हमारा बेहद अहम समय सोशल मीडिया या डिजिटल तकनीक की चमक ने छीन लिया है।

आज खाली हो रहे गांव और नए बसते हुए शहर हमारी जीवन की नई शैली के चमत्कार हैं। मगर बस्तियों में जो जिंदगी होती थी, क्या वह अब भी हम महसूस कर पा रहे हैं। सच यह है कि जीवन का अनंत सौंदर्यबोध लुप्त हो रहा है। आज खाली हो रहे गांव और सूने आंगन, उदास मुंडेरे जिंदगी की उदासीनता का दृश्य दिखाते हैं। दरअसल, कालचक्र जिंदगी को करोड़ों वर्षों से हर क्षण बदलता चला आ रहा है। जीवन का यथार्थ और सौंदर्यबोध असल में बदलाव में ही निहित है। हालांकि इस बदलाव की प्रक्रिया में हमने बहुत कुछ खोया है।

जिंदगी का रस जब सूखने लगता है, तब वह मुरझाने लगता है। आज का महानगरीय जीवन चकाचौंध से भरा हुआ है। हम सबका सब कुछ बदलाव की प्रक्रिया से ऐसी तेज रफ्तार से गुजरता हुआ कुछ नया खोजता है कि हमको पता ही नहीं चलता। लेकिन इस टूटन और उदासीनता से भरी यथार्थ की दुनिया में बहुत कुछ गंवाने के बावजूद कुछ शेष भी बच जाता है। वह है मनुष्य का जीवन, जो आज अधूरा हो गया है। काम और रोजमर्रा के जद्दोजहद के बीच बढ़ते हुए तनाव ने जिंदगी की रस और जरूरी क्षमताओं को खत्म कर दिया है। मानवीय मूल्यों का सौंदर्यबोध आमतौर पर लुप्त हो गया है। इसके बिना संसार कैसा होगा? आज के मानवीय जीवन की यह सबसे बड़ी त्रासदी है।

चिंतक लोर्का ने एक स्थान पर लिखा है कि ‘जीवन और कुछ भी नहीं है, बल्कि घटनाओं से भरा हुआ एक संघर्ष है।’ इसके अर्थ अब शायद बदल गए हैं। अब संघर्ष आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। जीवन में आगे बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अगर हमारे आगे बढ़ने से बहुत कुछ बेहद जरूरी पीछे छूट जाता है, तो यह शायद सोचना का मसला है। इस प्रतियोगिता के युग में संघर्ष में ही जिंदगी के नए सोपान तय होते हैं और समाज आगे बढ़ता है। रिश्तों में नई खुशबू महकती है। नई ऋतुएं अंगड़ाई लेती है। जीवन उमंग और उत्साह से भरा रंगों का एक नया इंद्रधनुष बन जाता है। यही जीवन का परम सत्य है और इसी में कहीं न कहीं जीवन के सौंदर्यबोध की नैतिकता की ताकत की छिपी रहती है।

असल में जिंदगी का सौंदर्यबोध इस पूरी सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है। इसी की तलाश में यानी जीवन की खुशबू के लिए हमारे पुरखों ने तमाम ग्रंथों की रचना की। सवाल सिर्फ इतना था कि जीवन की समरसता को बचाया जा सके। लेकिन विज्ञान के इस आधुनिक युग ने तो सौंदर्यबोध की परिभाषा ही बदल दी है। आज जीवन का सौंदर्यबोध महज प्रतियोगिता, होड़ और तेज रोशनियों का उत्सव बन गया है। इधर चमक तो बढ़ी है, लेकिन उसमें से जीवन-तत्त्व का प्रकाश गायब दिखता है। इस चमक के पीछे खुशबू कहीं गायब हो गई है। ऐसा लगने लगा है कि हम धीरे-धीरे एक नई आभासी दुनिया में विचर रहे हैं और जीवन की मौलिकता को छोड़ते हुए अपने मन-मस्तिष्क से खाली हो रहे हैं। वास्तविक सौंदर्यबोध का रस कहीं पीछे छूट गया है।

मेरा खयाल है कि यही हमारे इन दिनों की सबसे बड़ी त्रासदी का एक नया वर्तमान है, जिसमें से इंसानियत का सौंदर्य कहीं छूट गया है और तात्कालिक प्राथमिकताएं समय के इस कालचक्र का प्रथम पृष्ठ बन गई हैं। अपने जीवन के मूल तत्त्वों के रोज थोड़ा-थोड़ा करके छिनते जाने और उससे पैदा अभाव और कमजोर होते मानव-मूल्यों को क्या हम महसूस कर पा रहे हैं? नए दौर के आभासी मूल्यों के साथ के जीवन में हम कितने मानवीय रह पाएंगे?

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