औपचारिकता से आगे

अपनी पुस्तक ‘शिक्षा में क्रांति’ में ओशो कहते हैं कि जिस दिन शिक्षक और विद्यार्थी के ज्ञान में अंतर एवरेस्ट की चोटी और उसकी तलहटी में खड़े शख्स-सा होगा, उस दिन सम्मान का अंतर भी होगा। आज के शिक्षक बिना पाठ की पूर्व तैयारी के कक्षा में आते हैं। परिणाम सामने है। वही सामग्री विद्यार्थी ने कुंजी से पढ़ी होती है। ऐसे में उनकी नजरों में सम्मान की तलाश करना बेमानी है।

Education, Teacher's day
शिक्षा जबसे नैतिकता विहीन हुई, तभी से शिक्षा का स्तर सीखने-सिखाने के बजाए डिग्री बांटने वाला हो गया।

सालों से एक औपचारिकता की तरह शिक्षक दिवस पर आदर्श की बातें होती हैं और फिर अगली बार वही दोहराया जाता रहा है। लेकिन हम शिक्षक के रूप में अपने दायित्वों को निभा भी रहे हैं कि नहीं, इस पर सोचने की जरूरत नहीं समझी जाती। शिक्षकों के प्रति सामाजिक और सरकारी रवैया क्या है? अपनी योग्यता का कितना उपयोग हम कर पा रहे हैं? क्या शिक्षक महज सरकार की नजर में एक आम सरकारी कर्मचारी रह गया है या उसके प्रति कोई सम्मान का थोड़ा बहुत भाव अभी भी शासन में बचा है?

अपने पच्चीस वर्षों के गहन और विविधमुखी अध्यापन और शैक्षिक प्रशासन के दायित्वों को संभालने के बाद मैं कुछ निष्कर्षों पर पहुंचा हूं। सबसे बड़ी कमजोरी तो यह कि शिक्षक ने भी खुद को मात्र शिक्षक ही मान लिया है। वह वेतन के बदले पाठ्यक्रम पूरा कर अपने कर्तव्यों की इति श्री मान लेता है। उसने अपने विद्यार्थियों के साथ गहरे मानवीय, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक सरोकार बंद कर दिए हैं।

इसके लिए कुछ तो आज के बदलते भौतिकतावादी समाज के हालात जिम्मेदार हैं तो कुछ उसकी सरकारी प्रतिबद्धताएं उसे अवकाश नहीं लेने देतीं। फिलहाल वह महज शिक्षक रह गया है, न कि गुरु। गुरु वह होता है जो जीवन पर अमिट छाप छोड़ता है। आज नैतिक शिक्षा के पाठ हटा लिए गए हैं, नैतिकता समाज में हाशिए पर पड़ी है। आज के शिक्षक की आम शिकायत है कि अब वह सम्मान नहीं बचा इस पेशे में, जैसा पहले था। मेरा सवाल यह है कि कुछ सेवाएं ऐसी हैं जिनको पेशा या व्यवसाय कहना उनका अपमान करना है। दरअसल वे शुद्ध सेवा हैं। मसलन, शिक्षा, चिकित्सा, राष्ट्र रक्षा आदि। यों कभी राजनीति भी सेवा या मिशन ही थी, लेकिन अब वह व्यवसाय हो चुकी।

मशहूर क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने अपने एक उपन्यास में लिखा था कि आजादी से पहले राजनीति शहीदों का काम था, उसके बाद क्रमश: शरीफों और शोहदों का काम होता चला गया। अपनी पुस्तक ‘शिक्षा में क्रांति’ में ओशो कहते हैं कि जिस दिन शिक्षक और विद्यार्थी के ज्ञान में अंतर एवरेस्ट की चोटी और उसकी तलहटी में खड़े शख्स-सा होगा, उस दिन सम्मान का अंतर भी होगा। आज के शिक्षक बिना पाठ की पूर्व तैयारी के कक्षा में आते हैं। परिणाम सामने है। वही सामग्री विद्यार्थी ने कुंजी से पढ़ी होती है। ऐसे में उनकी नजरों में सम्मान की तलाश करना बेमानी है।

मैं अपने अपने दौर को याद करता हूं तो पाता हूं कि मुझे कक्षा या उसके बाहर कभी भी अनुशासनहीनता की समस्या से दो-चार नहीं होना पड़ा। कारण स्पष्ट था कि जिस छात्र या छात्रा ने एक-दो बार मेरी कक्षा में सचेतन उपस्थिति दर्ज की और मेरे अध्यापन से जुड़ गया, वह प्रभावित हुआ। मैंने नियमित स्वाध्याय कभी नहीं छोड़ा, इस कारण मेरी विषय सामग्री में नयापन बना रहा और रोचकता भी। आज के हालात बहुत दूसरे हो चुके हैं। मशीनी तौर पर महज पाठ्यक्रम पूरा करना और बस ड्यूटी की तरह कक्षा निपटाना। हो सकता है कि कुछ कमी शिक्षकों में भी हो, लेकिन व्यवस्था के दबाव में भी शिक्षकों की रचनात्मकता कम हो रही है। सरकारों का रुख भी शिक्षकों के प्रति बहुत सहानुभूतिपूर्ण नहीं है।

चुनाव इस देश का महोत्सव है, जो पांच साल तक चलता रहता है और इसका काम स्थानीय स्तर पर प्रतिनियुक्ति पर विभिन्न विभागों के कर्मचारी लगा कर चलाया जाता है। कुछ शिक्षक अन्य सरकारी कामों में इतना व्यस्त रहते हैं कि उनसे स्कूल शिक्षण प्रभावित होता है। साथ ही विद्यालय व्यवस्थाएं भी। लेकिन न प्रशासन चुनाव के अत्यावश्यक कार्य के डंडे के नाम पर प्रधानाध्यापक या प्राचार्य की सुनता है, न उसकी प्रशासन से पंगा लेने की क्षमता है। पल्स पोलियो से लेकर शिक्षकों को पशुओं गणना, कोविड ड्यूटी तो कभी राशन बांटने आदि के कामों में लगा दिया जाता है। साथ ही बेहतर परीक्षा परिणामों की उम्मीद भी की जाती है।

पिछले कुछ वर्षों में इन सब बाधाओं के बाद भी सरकारी स्कूलों के परिणाम दिल्ली, राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में निजी स्कूलों की तुलना में सुधरे हैं और सरकारी स्कूलों के प्रति नजरिया बदला है। आज जरूरत है कि सरकार, समुदाय और शिक्षक समाज के बीच एक संवाद का पुल कायम हो। शिक्षक राष्ट्र निर्माता है। इसको महज नारे के रूप में न दोहरा कर इसकी अहमियत को समझा जाए। अपने दौर में मैंने देखा है कि हमारी स्नातकोत्तर की कक्षा में ‘सरोज स्मृति’ पढ़ाते हुए एक शिक्षक कक्षा में भावुक होकर रोने लगते थे।

एक अन्य शिक्षक की कक्षा में निर्धारित क्षमता से अधिक अन्य कक्षाओं के के विद्यार्थी भी आ बैठते थे। एकाग्रता से कक्षाएं चलती थी। आज ऐसे शिक्षकों और वैसा समर्पण खोजना मुश्किल है। लेकिन इसके लिए अकेले शिक्षक जिम्मेदार नहीं है। आज का शिक्षक स्थानांतरण और अन्य कामों में ड्यूटी के दुश्चक्र में ही फंसा रहता है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की आशा करना व्यर्थ है। समाज उसे कोरे शब्द सम्मान नहीं दे, उसे सुने, समझे और वह अवकाश भी दे कि उसकी मेधा, कल्पना और चिंतन को नव-उड़ान मिल सके।

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