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कसौटी पर श्रेष्ठता

आदिकाल से ही हमारा समाज जाति और वर्गों में बंटा हुआ है। उच्च कही जाने वाली जातियां और ऊंचे वर्गों वाले लोग अपने से निचली कही जाने वाली जाति और वर्गों का अपमान करते रहे हैं। यहीं से अनेक प्रकार के सामाजिक संघर्षों का जन्म होता है। जबकि हम सभी जानते हैं कि एक दूसरे के सहयोग के बिना इस संसार का चल पाना असंभव है।

superiority thoughtदूसरे का अपमान करने वाला व्यक्ति खुद भी आत्मविश्वास से खाली होता है। वह दूसरों को छोटा साबित करके खुद को बड़ा सिद्ध करना चाहता है। दूसरे को दबा कर ही उसे अपनी शक्ति का एहसास होता है।

रंजना मिश्रा
अक्सर देखा जाता है कि संसार में सबल लोग निर्बलों का अपमान करते हैं। कई बार हम भी बिना कारण बहुतों का अपमान करते हैं और हमारा अपमान भी बहुत बार होता है। कई बार ऐसा लगता है कि सारा व्यवहार ही एक-दूसरे का अपमान करने पर टिका हुआ है। मसलन, मालिक नौकर का अपमान करता है, पति अपनी पत्नी का और पिता अपनी संतानों का अपमान करता है। संसार में शायद कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसे जीवन में कभी न कभी अपमान न सहना पड़ा हो। अपमानित व्यक्ति अगर ताकतवर हुआ तो लड़ाई करता है और अगर निर्बल हुआ तो अपमान का जहरीला घूंट पीकर भी चुप रह जाता है। लेकिन उसका मन अपमानित होकर हीन भावना से भर जाता है। उसे अपनी निर्बलता का बोध होता है और उसके आत्मविश्वास का नाश हो जाता है। अपमान सहते-सहते धीरे-धीरे अत्याचार सहने की उसे आदत-सी पड़ जाती है।

अब सवाल यह है कि लोग दूसरे का अपमान करते क्यों हैं? इसका उत्तर है कि अपमान करने वाला व्यक्ति खुद भी आत्मविश्वास से खाली होता है। वह दूसरों को छोटा साबित करके खुद को बड़ा सिद्ध करना चाहता है। दूसरे को दबा कर ही उसे अपनी शक्ति का एहसास होता है। वह दूसरों को अपना प्रतिद्वंदी मानता है। उसे संसार एक अविरत संघर्ष प्रतीत होता है। लेकिन दूसरे को प्रतिद्वंदी मानने के बजाय अगर सहयोगी मान लिया जाए, यदि दूसरों के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना मन में हो तो कभी दूसरों का अपमान करने का विचार नहीं आएगा। आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति न तो किसी का अपमान कर सकता है और न अपमान को स्वीकार कर सकता है।

आदिकाल से ही हमारा समाज जाति और वर्गों में बंटा हुआ है। उच्च कही जाने वाली जातियां और ऊंचे वर्गों वाले लोग अपने से निचली कही जाने वाली जाति और वर्गों का अपमान करते रहे हैं। यहीं से अनेक प्रकार के सामाजिक संघर्षों का जन्म होता है। जबकि हम सभी जानते हैं कि एक दूसरे के सहयोग के बिना इस संसार का चल पाना असंभव है। फिर भी अपने आप को श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण साबित करने के लिए लोग अपने से कमजोर को सदैव दबाते रहे हैं और उनका शोषण करते रहे हैं। किसी कमजोर और मजबूर व्यक्ति को उसकी कमजोरी और मजबूरी का अहसास दिलाना कहां की श्रेष्ठता या महानता है? पर ऐसा करने में न जाने लोगों को कैसे आत्मसंतोष का अनुभव होता है! क्या दूसरे को कमजोर साबित करके ही खुद को श्रेष्ठ साबित किया जा सकता है?

बिना नींव के कोई भी इमारत खड़ी नहीं हो सकती। परिवार में भी हर सदस्य का अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इसलिए परिवार का मुखिया अगर परिवार के अन्य सदस्यों को डरा-धमका कर रखेगा तो वह परिवार कभी खुशहाल नहीं रह सकता। छोटों का सम्मान करना उतना ही जरूरी है, जितना कि बड़ों का। लेकिन हम अक्सर देखते हैं कि बड़ों का सम्मान करने की बात तो की जाती है, लेकिन छोटों का सम्मान करने की बात कम ही सामने आती है। नतीजा यह होता है कि एक दिन बड़े स्वयं भी अपना सम्मान खो बैठते हैं।
हम सभी को चाहिए कि अपने से ज्यादा दूसरों के महत्त्व को समझें, दूसरों को आदर दें। तभी दूसरे हमें भी महत्त्व और आदर देंगे। वरना हम किसी को अपमानित करेंगे तो अगर सामने वाला हमसे कमजोर है तो वह सामने चाहे न बोले, लेकिन उसके मन में कभी भी हमारे प्रति श्रद्धा और प्रेम नहीं पैदा हो सकता, बल्कि उसका हृदय हमारे प्रति नफरत से ही भर जाएगा। दूसरे के हृदय में पैदा की हुई नफरत स्वयं के लिए ही घातक सिद्ध होती है। इसलिए हमें नफरत नहीं, बल्कि दूसरे के मन में अपने लिए प्रेम का संचार करना चाहिए।

कितने ही बड़े शासक, अत्याचारी, बाहुबली अपनी-अपनी शक्ति दिखा कर इस दुनिया से विदा हो गए। कुछ अच्छे रूप में याद किए जाते हैं तो कुछ बुरे रूप में और यह सब उनके कर्मों पर ही निर्भर होता है। जो इस दुनिया में जैसे कर्म करके जाता है, वह यहां से जाने के बाद उसी रूप में याद किया जाता है। इस बात का हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए। अगर हम संसार में प्रेम की सुगंध फैला कर जाएंगे तो मरने के बाद भी यह दुनिया हमें याद करके श्रद्धा से शीश झुकाएगी और अगर नफरत फैला कर जाएंगे तो मरने क बाद भी सदैव दुनिया हमें नफरत से ही याद करेगी। बुरे लोगों के नाम पर तो लोग अपना नाम रखना भी पसंद नहीं करते।

हमारे कर्म संसार के लोगों को प्रेरित करते हैं, उन्हें शिक्षा देते हैं। इसलिए हम जो भी करते हैं, उससे पूरी दुनिया प्रभावित होती है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए और इसलिए बहुत सोच-समझ कर ही कर्म करने चाहिए और मुंह से अच्छे या बुरे वाक्य निकालना चाहिए। हमारी भावनाओं की तरंगे धरती के सभी प्राणियों को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि सकारात्मक विचार वाले व्यक्ति लोगों को आकर्षित करते हैं और नकारात्मक विचार वाले व्यक्तियों से लोग दूर ही रहते हैं।

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