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उपेक्षा का दंश

हमारे मोहल्ले के एक काका बुजुर्ग हुए तो कब परिजनों ने उन्हें वृद्धाश्रम में भेज दिया, हमें पता ही नहीं चला। एक दिन उनके एक परिजन ने कहा- ‘भाई, काका को देखने जाना है’, तब पता चला कि परेशान होकर अपने ही लोगों ने उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया है।

Neglection, disrespectअपनों की उपेक्षा और उनसे दूरी समाज को गलत राह पर ले जाती है। (फोटो- गजेंद्र यादव- इंडियन एक्सप्रेस)

सुरेशचंद्र रोहरा
एक उम्र में जब बाल पूरी तरह सफेद हो जाते हैं, दांत गिरने लगते हैं, किसी को सहारे के लिए लाठी की दरकार होती है, व्यक्ति को उठने-बैठने में दिक्कत होने लगती है, ऐसे में शरीर और मन में कई तरह के दर्द उभर आते हैं। कोई इस पीड़ा को सहता है, कोई घर में रहते हुए भी बेगाना हो जाता है, तो कोई वृद्धाश्रम पहुंच जाता है। वृद्धावस्था की यह पीड़ा और उसमें रहने वाले बुजुर्गों का दुख मैंने अपने आसपास बड़ी तल्खी से महसूस किया है। ऊपर से सब कुछ सामान्य प्रतीत होता है, मगर भीतर प्रविष्ट हुए नहीं कि दर्द का दरिया बहता हुआ दिखाई देता है। एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए इसका सामना करना बेहद तकलीफदेह होता है। जाने कितने गीत, कविताएं, कहानियां बुजुर्गों के दर्द को शब्दों में पिरो कर लिखी गई हैं, जिसे सुनकर आंखों की कोर भीग जाती हैं। आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की कहानी ‘वट बाबा’ में एक प्राचीन वटवृक्ष के ध्वस्त होने की गाथा को मानवीय भावों और शब्दों में पिरोया गया है, जो एक तरह से बुजुर्गों के दर्द को ही शिद्दत के साथ दर्शाता है।

कुछ समय पहले मैं एक परिजन के विवाह समारोह में शामिल होने गया था। लोगों के लिए मिष्टान्न बने थे, तोरण द्वार सजे थे। लाखों का खर्च सामने दिखाई दे रहा था। अचानक जो दिखा, उसके बाद मैं एक तरह से काठ बन कर रह गया। कोने में बैठी एक वृद्ध महिला शायद किसी का छोड़ा हुआ बचा-खुचा खाना खा रही थी। मैंने एक व्यक्ति से इस महिला के बारे में पूछा जब यह पता चला कि यह इस परिवार की ही एक महिला है, तो भीतर तक परेशान हो गया। सच मेरे सामने सबसे कड़वी अवस्था में था। आज जब मैं यह सोचता हूं कि ऐसी परिस्थितियां क्यों बनी, तो कोई उत्तर ढूंढ़े नहीं मिलता, सिवा इस सवाल के कि उस परिवार के बच्चों के भीतर से संवेदना और मानवीयता कैसे सूख गई और वे इतने संवेदनहीन कैसे हो गए! उसके बाद बुजुर्गों के खिलाफ अत्याचार के कई मामलों से रूबरू होना पड़ा, अपनी सीमा में जो बन पड़ा, किया, लेकिन वह दृश्य आज तक नहीं भुला सका।

हमारे आसपास के बुजुर्ग होते लोग, जो कभी परिवार के प्रमुख हुआ करते थे, कई बार अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में छोटी-छोटी चीजों के लिए मोहताज हो जाते हैं। जो बच्चे उन्होंने बड़े किए, वे आज घर के मुखिया होते हैं और उनकी निगाह में ये बुजुर्ग किसी ‘फालतू की चीज’ से ज्यादा की हैसियत के नहीं होते। यह सब देख कर एक खालीपन पैदा होता है, आंखों के सामने ऐसा वितान रचता है कि आंसू भर आते हैं। यह एक ऐसा दर्द है जो जाने कब से चला रहा है और चलता रहेगा। अलग ढंग से, अलग भावभूमि में..! मगर इसका इलाज आखिर क्या है, यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने मुंह बाए आज भी खड़ा है।

जब से मैंने होश संभाला था, तभी एक दिन घर-परिवार में बुजुर्गों का यह सच देखा-सुना था। एक परिजन कह रहे थे कि ‘बुढ़ापा बड़ा दुखदाई है… इससे अच्छा होता कि भगवान चलते-फिरते ही मुझे उठा लेता’! फिर बातों-बातों में यह उद्गार भी सुने कि ‘जब तक जियो, कभी अपनी संपत्ति बच्चों के नाम नहीं करनी चाहिए’ और यह भी सुना कि ‘फलां का बुढ़ापा नरक बन गया है’। एक दिन सुना कि नगर की एक बड़ी विद्युत कंपनी में नौकरी कर रहे एक परिचित ने अपने पिता को वृद्धाश्रम में रख छोड़ा है तो मन कड़वाहट से भर गया था।

हमारे मोहल्ले के एक काका बुजुर्ग हुए तो कब परिजनों ने उन्हें वृद्धाश्रम में भेज दिया, हमें पता ही नहीं चला। एक दिन उनके एक परिजन ने कहा- ‘भाई, काका को देखने जाना है’, तब पता चला कि परेशान होकर अपने ही लोगों ने उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया है। बुजुर्गों के प्रति आत्मीयता, स्नेह और सम्मान का भाव हम बस सुनते-पढ़ते देखते आए हैं, मगर एक दिन जब अपने ही आसपास कुछ घटनाएं घटने लगती हैं तो मन मस्तिष्क शून्यवत हो जाता है।

दरअसल, परिदृश्य में तमाम हालात ऐसे होते हैं जो चिरंतन रहे हैं। समय बदल जाता है, मगर स्थितियां वही घूम कर सामने आकर खड़ी हो जाती हैं। अक्सर इसके लिए घर में आई बहू को कसूरवार ठहरा दिया जाता है और हम बड़ी आसानी से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। हाल ही में मैंने देखा कि एक बहु अपने ससुर के पक्ष में खड़ी है, मगर बेटे और बेटियां कह रहे थे कि घर के मुखिया की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और क्यों न इन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया जाए।

न सिर्फ अपने आसपास के बुजुर्गों की हालत देख कर, बल्कि ठीक अपने बारे में भी तमाम खयालों से गुजरते हुए यही लगता है कि हर परिस्थिति में बुजुर्गों के प्रति संवेदना का भाव परिवार में होना चाहिए। मगर यह कब तनाव और त्रासदी में बदल जाता है, हम देखते रह जाते हैं। क्या एक अदद वृद्धाश्रम ही समस्या का इलाज है? क्या हम खुद को ही बेहतर इंसान बनाने के लिए थोड़े संवेदनशील नहीं हो सकते? क्या हमें अस्तित्व देने वाले अपने बुजुर्गों के लिए अपने दिल के कोने में एक जगह नहीं निकाल सकते?

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