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भाषा की माटी

जब रेणु के रचना-संसार में आंचलिकता के प्रभाव से पात्रों को ही नहीं, पूरे परिवेश को धड़कते पाया और अपने क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित कवयित्री की सरस, सजीव और भाव-प्रवण भाषा में स्थानीय बोली से जुड़े अनुभवों की केंद्रीय भूमिका को पहचाना तो लगा कि अगर मेरा बचपन बोलियों से हरा-भरा होता तो मेरी हिंदी का बाग विविधवर्णी स्थानीय अभिव्यक्तियों के फूलों से सदाबहार होता।

गांव की माटी में भाषा की अपनी खुशबू है। (Express Photo by Praveen Khanna)

मेधा
उत्तर बिहार के एक शहर में हिंदी के प्राध्यापक के घर जन्म लेने के कारण हिंदी से मेरा सहज रिश्ता होना स्वाभाविक ही है। एक प्राध्यापक के रूप में जो भाषिक अनुभव रहा, उससे पिताजी के मन में बोलियों को लेकर एक दूरी-सी बन गई। दरअसल, मातृभाषा के रूप में विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों का प्रयोग करने वाले छात्र-छात्राओं की कॉपियां जांचते वक्त बोलियों की मिलावट से हिंदी के एक से एक बिगड़े हुए नमूने उन्हें देखने को मिलते थे। उन्हें लगता कि कामकाज और बाहरी संसार में बरतने वाली पहली भाषा खड़ी बोली हिंदी ही है। इसलिए विद्यार्थियों और अपने बच्चों की हिंदी भाषा के विकास के लिए वे बहुत सजग थे। यही कारण था कि बोलियों के विविधवर्णी संसार में रहते हुए भी रूप, गंध और भाव से भरी किसी बोली को अपनी मातृभाषा बनाने का सौभाग्य मुझे नहीं मिल सका।

बहुत समय तक मैं भी पिताजी के भाषाई अनुभव से प्रभावित रही। लेकिन बाद में यह प्रभाव धूमिल होता चला गया। जब रेणु के रचना-संसार में आंचलिकता के प्रभाव से पात्रों को ही नहीं, पूरे परिवेश को धड़कते पाया और अपने क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित कवयित्री की सरस, सजीव और भाव-प्रवण भाषा में स्थानीय बोली से जुड़े अनुभवों की केंद्रीय भूमिका को पहचाना तो लगा कि अगर मेरा बचपन बोलियों से हरा-भरा होता तो मेरी हिंदी का बाग विविधवर्णी स्थानीय अभिव्यक्तियों के फूलों से सदाबहार होता। स्थानीय बोलियों को अपने जीवन में शामिल करना केवल अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि अपने समाज और संस्कृति को जानने-समझने के लिए भी आवश्यक है। यह अहसास भी वक्त के साथ बड़ा होता गया।

शायद हिंदी भाषी समाज ने अपनी बोलियों की शक्ति को उस तरह नहीं पहचाना। और न ही उस शक्ति का उपयोग अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति की समृद्धि के लिए किया। हां, इस संदर्भ में कुछ अपवाद जरूर मिल सकते हैं। लेकिन कई समाजों के लिए आज भी मातृभाषा के रूप में अपनी क्षेत्रीय बोली इतने गौरव का विषय है कि कोई जब अपने शत्रु के विनाश की कामना करता है, तो उसे ‘शाप’ देता है- ‘तुम्हारे बच्चे अपनी मां की भाषा से वंचित हो जाएं।’

भाषा के ऐसे ही गौरव को जीने वाला पहाड़ी समाज रहा है- दागिस्तान। लेखक रसूल हमजातोव ने अपनी किताब ‘मेरा दागिस्तान’ में एक संस्मरण का जिक्र किया है। एक बार लेखक की मुलाकात दागिस्तान छोड़ कर फ्रांसीसी लड़की से शादी कर फ्रांस में बस गए एक दागिस्तानी से होती है। अपने देश लौट कर लेखक ने उस मुलाकात का जिक्र उस व्यक्ति की मां से किया। लेखक की बात खत्म होने पर मां ने पूछा- ‘तुम दोनों ने अवार भाषा में तो बात की होगी?’ लेखक के न कहने पर मां पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा और उसने अपने को संभालते हुए कहा- ‘लेखक आप किसी और से मिले होंगे, मेरा बेटा तो कब का मर चुका।’

हमें बज्जिका से दूर रखने वाले पिताजी अपनी ‘ईया’ से बज्जिका में ही बातचीत करते थे, हालांकि दादी हिंदी बहुत अच्छे से जानती थी। हिंदी हम भाई-बहनों की तो मातृभाषा थी, लेकिन हमारे परिवेश में हिंदी को ‘जीवन की भाषा’ का दर्जा प्राप्त नहीं था। वहां उसकी हैसियत बाहरी की थी। एक औपचारिक भाषा जिसमें लिखत-पढ़त का काम किया जाता था। वहां इतनी भर थी, हिंदी की हैसियत। ऐसे में हम जब बोलचाल के लिए हिंदी का प्रयोग करते तो सारा परिवेश हमें अचरज और व्यंग्य से देखता। हमारे पड़ोसी फब्तियां कसते- ‘देशी मुर्गी विलायती बोल’।

हम जिस सहजता से समस्त उत्तर भारत के लिए ‘हिंदी पट्टी’ पद का प्रयोग करते हैं, उसके एक बहुत बड़े हिस्से के लिए हिंदी सचमुच ही विलायती बोल के समान है। लिखत-पढ़त की भाषा यह जरूर है, लेकिन जीवन आज भी बोलियों में धड़कता है। बोलियों को हिंदी के लिए अछूत बना कर शुद्धतावादियों ने बोलियों से अधिक हिंदी का नुकसान किया है। जो बात हिंदी की राजनीति करने वाले बहुतेरे बुद्धिजीवी नहीं समझ पाए, उसे बाजार ने अच्छी तरह समझा। यानी लोगों के दिलों में अपनी बात बसानी है तो लोकभाषाओं का सहारा लेना होगा। विज्ञापन की भाषा इसका प्रमाण है। ‘चलत मुसाफिर ले गयो रे पिंजड़े वाली मुनिया’ और गढ़वाली लोकगीत ‘बेडू पाको बारामासा’ की तर्ज पर बनाए गए विज्ञापनों की अपार सफलता इस बात की पुष्टि करते हैं।

बोलियों में जीने वाले सभी समाजों के लिए किताबी हिंदी दूसरी भाषा है, पहली नहीं। यह बात तब और अधिक पुष्ट हुई जब कुमाऊंनी बोलने वाले एक ग्रामीण अंचल में कुछ साल रहने का अवसर मिला। वहां के विद्यार्थियों के लिए हिंदी सीखना उतना ही कठिन था, जितना कि हिंदी बोलने वालों के लिए अंग्रेजी। वहां महाविद्यालयों के प्रध्यापकों को बहुधा अपना विषय पढ़ाने से पहले उनकी हिंदी पर काम करना होता है।

बहरहाल, आज महसूस होता है कि पिताजी का फैसला कई पीढ़ियों को प्रभावित करेगा, क्योंकि आज मैं चाहूं भी तो अपनी बेटी को किसी बोली की सौगात नहीं दे सकूंगी। लेकिन पिता हिंदी को भ्रष्ट बनाने के लिए हिंदी की बोलियों को जिम्मेदार मानते हैं।

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