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समाज की धुरी

कोई भी दिन अपने साथ कई रंगों को समेटे होता है। पिछले महीने कुछ ऐसी ही अनुभूति लिए इस साल फिर महिला दिवस आया और चला भी गया।

womenसांकेतिक फोटो।

नंदितेश निलय

कोई भी दिन अपने साथ कई रंगों को समेटे होता है। पिछले महीने कुछ ऐसी ही अनुभूति लिए इस साल फिर महिला दिवस आया और चला भी गया। इस बार फिर दिखा कि संसार की महिलाओं ने फिर अपनी शक्ति और सपनों का अहसास किया। लेकिन सवाल है कि साल में सिर्फ एक दिन ही महिलाएं अपने अस्तित्व को लेकर फिक्रमंद क्यों हों! क्या इस एक दिन का विस्तार बाकी तमाम दिनों में नहीं होना चाहिए? बराबरी की लड़ाई को अब महज प्रतीक दिवसों से निकाल कर आम बनाए जाने की जरूरत है। सच यह है कि पुरुष प्रधान समाज की दरकती दीवारों के बीच स्त्री की ओजपूर्ण उपस्थिति आने वाले वक्त में उनकी जिजीविषा को बयान करती है।

सफलता एक व्यक्ति को व्यक्तित्व में परिवर्तित कर देती है। उसको उन ताकतों से परिचय कराती है, जिससे वह इंसान अभी तक अनजान बना हुआ था। एक सपने के पूरा होने जैसा यह अहसास होता है। जैसे ही सफलता का किसी के जीवन में प्रवेश होता है, समाज और परिवार के देखने का नजरिया बदल जाता है। यहां तक कि जो व्यक्ति अपने आप को कमतर आंकता रहता रहा होता है, सफल होते ही आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो जाता है। यानी यह मानना लाजिमी होगा कि सफल होना जहां एक अर्थ लेकर आता है
जब फ्रांसिस हैसल बिन ने संसार में एक महिला के रूप में ‘गर्ल स्काउट’ का नेतृत्व किया तो स्त्री की नेतृत्व कला ‘क्या’ की परिधि से निकल कर ‘कैसे’ के आकाश में बिखर गई। बात यह नहीं है कि कोई स्त्री बड़े स्तर पर नेतृत्व कर सकती है या नहीं, बल्कि जरूरत है कि वह कैसे उन योग्यताओं और मूल्यों को अपनाए, जिससे उसकी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता नई उड़ान भर सके।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले दो दशकों में स्त्रियों ने अपनी अदम्य शक्ति और असीम अभिलाषा से जीवन की दौड़ को परिवार और नौकरी, दोनों पटरियों पर दौड़ाया और जीतीं भी। उन्होंने पूरी लगन से पढ़ाई और नौकरी की, साथ-साथ अपने परिवार को भी पीछे मुड़ कर देखती रहीं। इस बदलाव ने उन्हें स्वतंत्रता, समानता और सहभागिता के अधिकार से जोड़ा तो दूसरी ओर उन्हें अब यह डर भी सताता है कि जीवन की दौड़ में धैर्य और करुणा कहीं पीछे न छूट जाए। इसलिए जरूरत है कि अधिकारों के सवालों से जुड़ी भावनाएं अब स्त्री को उनके बुनियादी अहसास के करीब भी ले जाए और जिस साहस और संतुलन के साथ उन्होंने विश्व के स्तर पर अपनी पहचान कायम की है, वह विश्वास भी अटल रहे। कुछ पाने में हमेशा कुछ छूटता जरूर है।

पुरुषों ने जो गलतियां कीं, उसे स्त्री को दोहराने की जरूरत नहीं है। कमाल तो तब है, जब परिवार की कल्पना में स्त्री के लिए बुजुर्ग और बच्चों की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति हो और दो व्यक्ति के बीच का संबंध नियंत्रण की परिधि से निकल कर समर्पण के भाव में खो जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो यह तय है कि स्त्री अपनी हर सफलता को असाधरण बनाती जाएगी। पुरुषों ने संसार में स्त्रियों को हमेशा सामाजिक दर्जे में दूसरा स्थान दिया और खुद प्रथम रहना चाहा। इस मनोभाव ने पूरे समाज का संतुलन बिगाड़ दिया। अब स्त्रियों को तय करना है कि उन्हें पुरुषों या स्त्रियों को पराजित कर आगे बढ़ना है या अपनी पहचान को सामूहिकता का स्पंदन देना है। परिवार उनकी ओर देख रहा है और मंजिल भी उन्हें पुकार रही है। जरूरत है धैर्य और करुणा के भाव से परिवार को सुना जाए, समझा जाए और फिर दुगुनी ताकत से लक्ष्य की ओर बढ़ा जाए। आखिर समाज की धुरी स्त्री ही है।

हाल ही में भारत के विकास का सफर दुनिया के लिए एक अद्भुत उदाहरण बन गया है। संसार यह स्वीकार कर बैठा है कि भारत संभावनाओं और संतुलन का देश है। ऐसे दौर में अगर नागरिक व्यवहार कोई असंतुलन उत्पन्न करे तो चिंता होना स्वाभाविक है। नया भारत, मेरा अपना भारत। एक ऐसा देश जहां अपना और अपने भारत का भाव समृद्ध होता रहे। कोई अस्वस्थ न रहे, कोई भूख से न मरे। मेरा नया भारत सबको सबल बनाए और समरसता के रंग में रंग डाले।

जब भी नए भारत के बारे में सोचता हूं तो यह आशा करता हूं कि अपने इस नए भारत में गुम हुए जीवन मूल्यों को फिर से स्थान मिले। वह विश्वगुरु बने और सिर्फ विज्ञान और तकनीक ही नहीं, बल्कि अपनी कला और संस्कृति से संपूर्ण विश्व को नई दिशा दे। अपने नए भारत में ग्राहक को भी देवता माना जाए, पर सबसे पहले मां-बाप और महिलाओं के प्रति भी चिंता नजर आए। एक इंसान ही है जो अपनी कमी मानता भी है और नहीं भी मानता। जो मान जाते हैं, वे समाज के लिए उत्तर बनते हैं और जो नहीं मानते वे आधे-अधूरे ही रह जाते हैं। मेरा मानना है कि कि नए भारत में स्त्री संज्ञा से निकल कर क्रिया बन जाए।

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