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अभिव्यक्ति का आकाश

पिता-पुत्र या भाई-भाई के भिन्न विचारों को लेकर होने वाले झगड़े या मनमुटाव को हमारा समाज सामान्य रूप में स्वीकार कर लेता है, लेकिन पति-पत्नी के भिन्न विचारों को लेकर हुए झगड़े और मनमुटाव को समाज टेढ़ी नजर से देखता है।

dunia mere aageजहां विचार स्वातंत्र्य सभी के लिए जरूरी मान लिया जाता है, वहां विचारों का लोकतंत्र एक दिशा लेने लगता है। (Photo Source: Getty Images)

अरुणा कपूर

विचारों की स्वतंत्रता की बहुत बड़ी अहमियत है। सभी स्त्री-पुरुषों के अलग विचार और मान्यताएं होती हैं। बच्चों के मन में भी कई तरह के विचार पल रहे होते हैं। किसी के विचार किसी के ऊपर थोपे नहीं जा सकते। अगर ऐसा होता है तो यह विचार स्वातंत्र्य को छीनने, दबाने या रोकने जैसा है। कोई विचार सिर्फ मन में उभर कर रह जाता है और उसे व्यक्त नहीं किया जा पाता, तो उनका महत्त्व उसी व्यक्ति तक सीमित रह जाता है। लेकिन व्यक्त किए गए विचारों का महत्त्व यकीनन ज्यादा है, क्योंकि उनका प्रभाव जाहिर करने वाले व्यक्ति से संबंधित सभी व्यक्तियों और समाज पर भी पड़ता है, जिन तक उस विचार को पहुंचाया जाता है। अगर कोई स्त्री या पुरुष अपने विचारों को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करें और उसमें खुद को ढालते हुए कोई काम करना चाहें तो जाहिर है कि कार्य के परिणाम की जिम्मेदारी उसकी अपनी होती है।

इसीलिए अपने विचारों पर अमल करना और परिणाम जो भी अच्छा या बुरा आए, उसके लिए तैयार रहना संबंधित व्यक्ति के ही हिस्से में जाता है। यह जरूरी नहीं कि आपके संपर्क में आने वाले सभी लोग आपके विचारों से सहमत हों। आपके विचार जान कर अपना आपा खोने वाले, उसके परिणामों से डरने वाले, जानबूझ कर आपका विरोध करने वाले और आपका मजाक उड़ाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। जब आप अपने विचारों पर अमल करने के लिए कदम बढ़ाने लगें तो आपके रास्ते में कई तरह की रुकावटें डालने वाले व्यक्ति भी मिल जाएंगे।

ऐसे में मन दृढ़ बना कर आगे बढ़ना या अपने आप को रोकना आपका स्वतंत्र निर्णय है। पिता-पुत्र, भाई-भाई और पति-पत्नी के विचार भी कई मामलों में भिन्न हो सकते हैं। ऐसे में कई बार विचारों की असहमति आगे चल कर प्रत्यक्ष या परोक्ष टकराव तक भी पहुंच सकता है और फिर आपस में मनमुटाव और झगड़े भी हो सकते हैं।

पिता-पुत्र या भाई-भाई के भिन्न विचारों को लेकर होने वाले झगड़े या मनमुटाव को हमारा समाज सामान्य रूप में स्वीकार कर लेता है, लेकिन पति-पत्नी के भिन्न विचारों को लेकर हुए झगड़े और मनमुटाव को समाज टेढ़ी नजर से देखता है। पत्नी के विचार पति से भिन्न होने को समाज बर्दाश्त नहीं कर पाता। अगर पत्नी अपने स्वतंत्र विचारों पर अमल करती है और पति उसका विरोध कर रहा है, तो पैदा होने वाली पारिवारिक समस्या के लिए जिम्मेदार पत्नी को ही मान लिया जाता है।

शायद यही वजह है कि आज से कुछ दशक पहले इसी कारण को लेकर विवाहित स्त्रियां अपने विचारों को व्यक्त करने से डरती थीं। सोचती थीं कि कहीं पति ने विरोध जताया तो गृहस्थी छिन्न-भिन्न हो जाएगी। जाहिर है, असहमति या भिन्न विचार होते हुए भी ऐसी पत्नियां मन मार कर रह जाती थीं। ऐसे में परिवार के अन्य सदस्यों का साथ होना असंभव ही था। पत्नी को शायद ही किसी का समर्थन मिल पाता था। उसके अपने अभिभावक और माता-पिता भी उसे पति के विचारों के विरुद्ध कदम उठाने से साफतौर पर मना कर देते थे। उसे वोट भी उसी राजनीतिक पार्टी और उम्मीदवार को देना पड़ता था, जिसे पति पसंद करता था। अपनी सोच या अपने स्वतंत्र विचारों को वह क्रियान्वित नहीं कर सकती थी।

समय ने करवट बदला। पाश्चात्य संस्कृति के समाज पर कुछ बुरे प्रभाव अवश्य पड़े, लेकिन एक अच्छा प्रभाव भी पड़ा। बहुत सारी महिलाओं ने अपने आप को कमजोर और लाचार समझना, खुद को लाचार मानना छोड़ दिया। अपने बलबूते कार्य करने के लिए मन को मजबूत बना लिया और अपने स्वतंत्र विचारों पर अमल करना सीखा। जैसे जोत से जोत जलाई जाती है, वैसे ही एक स्त्री दूसरी स्त्री की प्रेरणा बनती गई। इससे समाज में भी जागृति आई।

शुरुआती दौर में जरूर इसका सामाजिक विरोध हुआ, लेकिन कुछ पतियों ने ही अपनी पत्नियों का साथ देकर एक अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने रखा। क्या हुआ अगर पत्नी के विचार उनके विचारों से नहीं मिलते। इससे पारिवारिक शांति में कोई खलल नहीं पड़नी चाहिए, यह बात उनकी समझ में आ गई।

समाज में ज्यों-ज्यों जागरूकता बढ़ी, लैंगिक समानता के स्वर मुखर होने लगे, स्त्रियों के मसलों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी, वस्तुस्थिति और उसकी वजहों को ठीक से समझ पाने वाले पुरुषों के भीतर विचारों के बदलने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। नतीजतन, एक घर में समाज, राजनीति और विश्व के मसलों पर अलग-अलग राय रखने वाले ध्रुवों का विकास हुआ और विचारों का लोकतंत्र एक दिशा लेने लगा। आज कई परिवारों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति समर्थन जताने वाले लोग सहयोग के साथ रह रहे हैं।

विचार स्वातंत्र्य सभी के लिए जरूरी है। सभी के विचारों का महत्त्व होता है। इसलिए दूसरों को भी ध्यान से सुनना और उनके विचार जानना आवश्यक है।

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