छाया की तलाश

रामचंद्र शुक्ल की एक कविता है ‘बसंत पथिक’। प्रसंगवश उसकी कुछ पंक्तियां हैं- ‘देखा पथिक ने दूर कुछ टीले सरोवर के बड़े/ हैं पेड़ चारों ओर जिन पर आम जामुन के खड़े/ हिलकर बुलाते प्रेम से प्रतिदिन हरे पत्ते जहां/ ...आवो पथिक विश्राम लो ‘दिन छांह’ में बसकर यहां।’’

Dunia Mere Aageछाया सिर्फ शरीर को ही आराम नहीं देती है, बल्कि यह मन को भी तृप्त करती है।

प्रयाग शुक्ल
गर्मियां आते ही छाया की तलाश शुरू हो जाती है। राहगीर राह चलते हुए किसी पेड़ की, किसी छायादार दीवार की तलाश शुरू करते हैं, जहां कुछ देर रुक कर सुस्ताया जा सके। नीम, बरगद, आम, इमली, जिसकी भी छाया मिले, वे उसकी ओर ताकते हैं। यह सुस्ताना बहुत प्रिय होता है। वृक्ष मित्र बन जाते हैं और किसी अपरिचित घर-दुकान का बाहरी, छायादार हिस्सा, प्रिय और परिचित हो उठता है। छतरी की सुधि आने लगती है। वह निकाली जाती है। कहीं से फट, टूट गई हो तो उसकी मरम्मत कराई जाती है! सिर पर एक छाया किए हुए साथ-साथ चलती है।

छाया का अपना इतिहास है। वह सदियों से तलाशी जाती रही है। आखिर मानव ने बारिश-धूप-शीत से बचने के लिए ही गुफाओं की ‘छाया’ ढूंढी थी और फिर गुफाओं को ‘घर’ बनाने बनाने में देर कहां लगी थी। आज भी वास्तुशिल्पियों की नई विधियों, नए डिजाइनों में छाया का ध्यान रखा जाता है। छाया की तलाश सिर्फ राहगीर, पथिक, बटोही ही करते हों, सो बात भी नहीं। उसकी तलाश तो कार, बाइक, साइकिल में बैठे लोग भी करते हैं। प्रमाण है गर्मियों में किसी ऊपरी पैदल पार पथ या किसी छायादार जगह के नीचे खड़े होने वाले वाहन या फिर किसी रेस्तरां-होटल के परिसर में गाड़ी-बाइक खड़ी करके कुछ खाने-पीने वाले लोग।
छाया की उपयोगिता अपनी जगह है ही, उसका अपना सौंदर्य भी है, जिसे आधुनिक काल में सुमित्रानंदन पंत अपनी कविता ‘छाया’ में अमर कर गए हैं- ‘कौन कौन तुम परिहत बसना/ म्लान मना भूपतिता-सी/ कहो कौन हो दमयंती-सी/ तुम तरु के नीचे सोयी? / हाय तुम्हें भी त्याग गया क्या/ अलि! नल सा निष्ठुर कोई!’ यह कविता कई उपमाओं, रूपकों और बिंबों-दृश्यों को उजागर करती हुई छाया के मर्म को कई तरह से उलटती-पलटती, जांचती-परखती है!

छाया की ओर सचमुच ध्यान कई रूपों में जाता है। वह उपयोगी है। सुरम्य है। वह ग्रीष्म की साथिन है। वह एक ठंडक पहुंचाती है। तन-मन को शीतल करती है। और हां, वह अपने विभिन्न रूपों में निहारने लायक हो जाती है। प्रहरों के हिसाब से सृजित और परिवर्तित होती है। उसकी व्यवस्था की बात कई तरह से सोची जाती रही है। वह रंगमंच पर चित्रों में फिल्मों में कई तरह से अपने खेल दिखाती है। एक विशिष्ट भूमिका अदा करती है। कठपुतली के खेल में तो विशेष रूप से।
शीत ऋतु में हम जिस धूप की तलाश करते हैं, ग्रीष्म में उसी से बच कर कुछ शीतल की तलाश करने लगते हैं। इस शीतल की तलाश का ही एक नाम और मानो छाया है। छाया की तलाश का कोई प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता है। बचपन से ही सब उसकी तलाश की अपनी-अपनी विधि आजमाते हैं। वह ग्रीष्म में मानो अपनी ओर खींचने लगती है। वह कहां मिलेगी कैसे मिलेगी, का एक उपक्रम हम सभी करने लगते हैं। हम मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी। छाया की यह तलाश ग्राम्य जीवन में, लोक जीवन में और भी गहरी और सर्वव्यापी रही है। छतरी न हो तो गमछा ही सही, जो सिर पर सजा रहे। कुछ छाया और ठंडक पहुंचाए! नीम के नीचे चारपाई हो। पास में पानी का एक घड़ा हो। और क्या चाहिए!

न जाने कितने उपन्यासों, कहानियों, कविताओं, नाटकों, निबंधों में कई अंश मिल जाएंगे जो ‘छाया’ से संबंधित है। छाया का मर्म खोलने वाले आलोचक-कवि रामचंद्र शुक्ल की एक कविता है ‘बसंत पथिक’। प्रसंगवश उसकी कुछ पंक्तियां हैं- ‘देखा पथिक ने दूर कुछ टीले सरोवर के बड़े/ हैं पेड़ चारों ओर जिन पर आम जामुन के खड़े/ हिलकर बुलाते प्रेम से प्रतिदिन हरे पत्ते जहां/ …आवो पथिक विश्राम लो ‘दिन छांह’ में बसकर यहां।’’ जरा सोचिए, जब ‘दिन छांह’ में बस कर विश्राम करने का यह आग्रह वसंत से है, तो ग्रीष्म से यह आग्रह और कितना अधिक बढ़ जाएगा। दिन भर की छांह भी शरीर और मन को कुछ ठंडक तो पहुंचाती ही है। और जब वह सिर पर छाया के रूप में नहीं होती है, तो भी कहीं दूर-पास-खड़ी एक सम्मोहन रचती है।

‘छानी छप्पर’ वाले हमारे झोपड़े और घर, जिनमें देश की एक बड़ी संख्या बसती रही है, वे भी तो छाया की तलाश में ही बने-संवरे-सजे हैं। और देखी है बचपन में, अपने गांव के एक बाग में आम, महुआ, आदि पेड़ों की वे सघन कतारें, जिनकी छाया दोपहर में भी एक अंधेरा-सा रच देती थीं। इस श्यामल छाया का एक बड़ा आकर्षण था हमारे लिए जो तपती गर्मी के दिनों में भी हमें अपनी ओर बुलाती थी, खेलने-कूदने के लिए। पेड़ों पर चढ़ कर कच्चे या पक्के आम तोड़ने के लिए। बड़े होकर भी जब-जब श्यामल छाया वाली अमराइयां देखी हैं, वहां थोड़ी देर ठहरने का मन हुआ है। अब वैसी अमराइयां जरा कम दिखाई पड़ती हैं। एक टीस-सी उठती है।

हां, छाया ‘छांह’ करती है और दृश्य रूप में भी वह आंखों को सुख देती है। अचरज नहीं कि छाया परछार्इं, फोटोग्राफरों को विशेष रूप से लुभाती रही है। मेघ छाया। वृक्ष छाया। वस्तु छाया। अनगिनत हैं छाया-रूप।

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