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बोली के संदर्भ

यह कोई बताने वाली बात तो नहीं, लेकिन पिछले कुछ समय के दौरान एक बदलाव यह आया है कि आजकल हमने अपने घर में कुछ दिन बाद खुद ही मेहमान होना शुरू कर दिया है।

Corona, Covid, Madhya Pradeshकोरोना संकट के कारण मध्यप्रदेश में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं ( सोर्स – एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

प्रभात कुमार

यह कोई बताने वाली बात तो नहीं, लेकिन पिछले कुछ समय के दौरान एक बदलाव यह आया है कि आजकल हमने अपने घर में कुछ दिन बाद खुद ही मेहमान होना शुरू कर दिया है। कुछ दिन बाद घर में पत्नी से कह बैठता हूं कि ‘बहुत दिन से हमारे ड्राइंग रूम में कोई मेहमान नहीं आया… आज हम ही वहां बैठ कर चाय पीते हैं’। पहले जब गलती से कोई रिश्तेदार या परिचित मेहमान बनता था तो मेज साफ करने से लेकर उनकी खातिरदारी करने तक की बाकी तैयारी करना एक खास अनुभव होता था। पहले आमतौर पर यह जिम्मेदारी पत्नी ही निभाती थीं, लेकिन अब मैं भी साफ-सफाई, खासतौर पर ‘ग्लव्स मारने’ यानी झालर वाले दस्ताने से सतह की धूल आदि साफ करने में अनुभवी हो गया हूं।

समझा जाए तो ‘मारना’ वास्तव में ऐसी क्रिया है जिससे सीधे-सीधे खतरा जुड़ा हुआ है। सहज, सौम्य और आम व्यवहार के तहत तो अधिकतर लोग किसी को नहीं मारना चाहेंगे, क्योंकि उसके बाद उन्हें खुद भी उसी व्यवहार से सामना करना पड़ सकता है। फिर भी जाने अनजाने यह शब्द जिंदगी में तेज हवा की तरह शामिल हो गया है, जो हर वक्त मारामारी मचा कर रखता है। इससे मिलते-जुलते शब्दों और अर्थों में लिपटे अनेक प्रयोग हमारी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा हैं।

‘मारे गए गुलफाम… अजी हां मारे गए गुलफाम’ गीत में ‘मारे गए’, ‘फंस गए’ भाव में प्रयुक्त हुआ है। आजकल इंसानियत मरने की बात बहुत की जाती है। इच्छाओं को मारने (दबाना) में उदासी है, पेंटिंग में बाजी मारी (जीती) में उल्लास है। घरेलू कामकाज में भी झाड़ू मारने से लेकर कई कामों में कहीं सहज तो कहीं अटपटा-सा प्रयोग सामान्य है। इसके अलावा, थप्पड़ मारना, गोली मारना, कुर्सी पर पॉलिश मारना, सेंध मारना, हाथ-पांव मारना, डुबकी मारना जैसे तमाम अनेक छोटे वाक्य हैं और अन्य भी होंगे, जिनमें दूसरे उचित और सहज शब्दों की जगह मारने जैसा प्रचलित और स्वीकृत शब्द प्रयोग हो रहा है।

फिलहाल तो महामारी ने जोरदार तरीके से हमारी जिंदगी में वापस घुसकर सेहत की हालत खस्ता कर दी है। दूसरी ओर, मोबाइल फोन ने आजकल मारने का काम ज्यादा बढ़ा दिया है। मित्र, परिचित, रिश्तेदार अब पहले की तरह फोन नहीं करते। कोई समझदारी से फोन कर ही दे तो उधर से संवाद के तहत यह कहा जाता है कि मैं तो आज आपको फोन मारने (करने) की सोच ही रहा था। अलसुबह से देर रात तक वीडियो एक दूसरे को भेजते रहते हैं, फिर जगह बनाए रखने के लिए ‘डिलीट मारते’ रहते हैं। यह जरूरी काम सभी को करना पड़ता है।

कई बार सोचता हूं कि क्या उचित, उपयुक्त शब्दों की जगह ‘मारना’ शब्द का इस्तेमाल करना जीवन में ईमानदार प्रयासों से लाई गई आक्रामकता के कारण नहीं है! ऐसा लगता है कि सहज प्रयोग वाले इस शब्द में तीव्र गति और भरपूर शक्ति है, जिसे हमारे विकसित होते जाते जीवन में निरंतर प्रयोग किया जा रहा है। अर्थ निकालते हुए या अनुवाद करते हुए अन्य क्रियात्मक शब्दों की जगह सीधे ‘मारने’ शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। बोलचाल की भाषा में यह कितनी ही क्रियाओं के लिए एक शब्द प्रयोग करना भी माना जा सकता है। विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी बोलचाल को पीट-पीट कर कितना जख्मी कर दिया है।

अगर शब्दकोष के बारे में पूछ लिया जाए तो ‘मार’ और ‘मारना’ शब्द वहां भी है। वहां मुक्का मारना या सिर पर पत्थर मारा जैसे भाव में या सीधे-सीधे मारना संदर्भित है। शिकारी ने जानवर को मार दिया या वह बस दुर्घटना में मारा गया, मार गिराना, मार भगाना, मार लाना (हथियाना) या किसी का पैसा मारना, किसी को भूखा मारना, लात मारना, सेंध मारना जैसे उदाहरण हैं। कीड़े मारना, टक्कर मारना, नकल मारना या मछली मारना जैसे प्रयोग भी दिए हैं। शब्दकोष भी इंसान की रचना है। बातचीत करते हुए अगर मार, मारना, मारो शब्दों की जगह उचित शब्दों का प्रयोग शुरू किया जाए या खोजा जाए तो संभवत बोलचाल और व्यवहार में सौम्यता और सहजता बढ़ सकती है। शब्दकोष भी समृद्ध होगा!

दरअसल, बातचीत के लिए प्रचलन वाले शब्दों का इस्तेमाल हमें आसान लगता है और हम उसे प्रयोग करते हुए इस पर गौर नहीं करते कि हमारे जरिए यह प्रयोग भाषा को व्यवस्था का हिस्सा बनाने में भूमिका निभाता है। किसी काम को करने के क्रम में उसके लिए ज्यादा स्पष्ट क्रिया का प्रयोग करने के बजाय ‘मारना’ शब्द का इस्तेमाल करने के पीछे आक्रामकता और जल्दबाजी का मनोविज्ञान काम कर रहा होता है। यह हमसे आगे बढ़ते हुए हमारी अगली पीढ़ियों में स्थानांतरित होता है।

कई ऐसे शब्द हम इस रूप में ढोते चलते हैं, जो सामाजिक व्यवस्था में किसी समूह को कमतर लक्षित करने के लिए भी इस्तेमाल में लाए जाते हैं। प्रथम दृष्ट्या यह सिर्फ बातचीत का सामान्य हिस्सा चलन के शब्द लगते हैं, लेकिन खुद कुछ अवांछित शब्दों के प्रयोग के जरिए हम सामाजिक व्यवस्था की किन परतों को कायम रखने में मदद कर रहे होते हैं, हमें इसका अंदाजा नहीं हो पाता है।

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