भौतिकी और जीवन

अपने परिवेश की सामाजिक धारणाओं, मूल्यों-विश्वासों को हम इस तरह अंगीकार कर लेते हैं, जैसे वे हमारे अपनी धारणा, मूल्य, विश्वास हों। इसे बड़ी आसानी से सिद्ध किया जा सकता है कि हमारे दैनिक विश्वासों में से नब्बे फीसद लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे बीते कल थे।

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जीवन में सकारात्मक सोच के साथ-साथ परिवेश का भी असर पड़ता है। (Photo Source- FreePik)

स्वरांगी साने

हमेशा कहा जाता है सकारात्मक सोच रखें, अपने दृष्टि पटल को इसी बिंदु पर केंद्रित रहने दें। लेकिन कुछ साल बीतने पर शायद हमें भी लगता हो कि केवल सकारात्मक सोच रखना पर्याप्त नहीं है। भौतिकी में हम सबने क्वांटम सिद्धांत पढ़ा होगा। पूरा विश्व ऊर्जा की तरंगों से बना है और क्वांटम क्षेत्र में ऊर्जा की अलग-अलग आवृत्तियां कार्य करती हैं। तो इस क्वांटम सिद्धांत में समय-काल का महत्त्व नहीं है और कुछ भी संभव हो सकता है। जो ऊर्जा हमें चारों ओर घेरे है, वही ऊर्जा हमारे भीतर भी है। आइंस्टान का सापेक्षता का सिद्धांत बताता है कि पदार्थ और ऊर्जा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

व्यक्तिगत तौर पर ये सिद्धांत यह समझने में मददगार हो सकते हैं कि हमारा सत्य उस ऊर्जा पर निर्भर करता है, जो हम संचारित करते हैं या जो हमारे द्वारा संचारित होती है। यह ऊर्जा हमारी इच्छाओं, आकांक्षाओं से एकरूप होती है। अब पहली पंक्ति की ओर लौटते हैं। अगर हम सकारात्मक नहीं रहे तो सकारात्मक ऊर्जा संचारित नहीं होगी। हमें सकारात्मक रहने की रटंत भर नहीं करनी है, बल्कि खुद को उससे एकाकार भी करना है।

सीधा अर्थ यह है कि हमको सकारात्मक ऊर्जा केवल संचारित नहीं करनी, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का पिंड हो जाना है। बहुत उलझाव लग रहा है क्या? जबकि ऐसा करना बहुत आसान है। अपनी इच्छाओं को अनुभूत करना शुरू कर दिया जाए। ‘ऐसा होगा, तब वैसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा, फिर हम आनंदित होंगे’ के समीकरण को पलट दिया जाए। हम आनंदित हो जाएं, फिर वैसा हो जाएगा, जैसा हम चाहते हैं।

हम ऐसा करने के लिए अपना श्रेष्ठतम देना चाहते हैं, तो किन्हीं अदृश्य रुकावटों से खुद को घिरा पाते हैं। वे अवरोध हमें महसूस कराते हैं कि हमारे सपने अधूरे रह गए। दूसरी ओर दिन-प्रतिदिन के दुनियावी काम बड़ी आसानी से हो जाते हैं और इस तरह बारंबार होते हैं कि हम उस ओर ध्यान तक नहीं देते कि सब कुछ कैसे नियत समय पर हो रहा है। इसकी वजह है रोज-ब-रोज के काम हम लगातार, बार-बार करते रहते हैं, तो वे अपने आप वैसे होने लग जाते हैं, जैसे उन्हें होना चाहिए। यही बात हमारे विचारों से भी जुड़ी है।

हम अपने अभिभावकों द्वारा हमारे सामने रखी गई विचारधारा के तहत बड़े होते हैं। अपने परिवेश की सामाजिक धारणाओं, मूल्यों-विश्वासों को हम इस तरह अंगीकार कर लेते हैं, जैसे वे हमारे अपनी धारणा, मूल्य, विश्वास हों। इसे बड़ी आसानी से सिद्ध किया जा सकता है कि हमारे दैनिक विश्वासों में से नब्बे फीसद लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे बीते कल थे।

अब इसे ऐसे समझते हैं। निरंतरता बनाए रखना हितकर होता है, लेकिन अगर यह निरंतरता गलत चीजों में हो तो? हम अधिकतर ऐसा ही करते हैं। यही वजह है कि हम खुद को विचारों की अबाध शृंखला से घिरा पाते हैं। इन विचारों के साथ हमारी रुचि-अरुचि, चयन, व्यवहार और हमारी भावनाओं की जकड़न भी हमें घेर लेती है। हमें सब कुछ समान लगने लगता है, जैसे अब कुछ बदल ही नहीं सकता।

इस घेरे से बाहर निकलना होगा। खुद को बाहर की तरफ धकेलना होगा। इसका पहला कदम सकारात्मक विचार होगा। लेकिन केवल सकारात्मक विचारों से कुछ नहीं होगा। मसलन, हम ईमानदारी से जिम जाना शुरू करते हैं। लेकिन अगर साल में तीन बार जिम जाएंगे तो कुछ नहीं होगा। पहले कुछ दिनों में भी कुछ हासिल नहीं होगा। इसे आदत की तरह अपनी जीवनचर्या में शुमार करना होगा। मेहनत करनी होगी, प्रशिक्षण लेना होगा और अपनी जीवनशैली बदलनी होगी।

किसी भी बदलाव से गुजरते हुए हमें असहज लग सकता है। हमारा मन-मस्तिष्क एक सांचे में ढल चुका होता है। इस जानी-पहचानी जीवनशैली को बदलना हो सकता है हमें डरावना, असुविधाजनक या अजीब लगे और हमारा मन फिर पुरानी जीवनशैली में लौटने का करे। लेकिन इसी भावना पर काबू पाना है। बदलाव तभी होगा जब हमारा शरीर उन बदलावों को महसूस करने लगेगा। यह हमारी सोच और भावना को एक सूत्र में बांधेगा, ताकि हम कार्य कर सकें।

धीरे-धीरे हम खुशहाल और कृतज्ञ महसूस करने लगेंगे। खुद से प्यार करने लगेंगे और ऐसा करने का पश्चाताप नहीं होगा। यह प्रेममय जीवन की ओर ले चलेगा। छोटे-छोटे कदम भी शरीर और मन को हर काम नए तरीके से करने, नए तरीके से सोचने, देखने और महसूस करने की ऊर्जा देंगे। अब मस्तिष्क अतीत की परछाइयों में जकड़ा नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य का ताना-बाना बुनना चाहेगा। तो क्या केवल सकारात्मक विचार ही काफी है? इसका हां या ना में वस्तुनिष्ठ जवाब नहीं हो सकता।

सकारात्मक विचार खुशहाल होने और कृतज्ञ होने की नींव हैं, लेकिन अगर उनमें निरंतरता नहीं रखी तो वे केवल खयाली पुलाव बन कर रह जाएंगे। अपना ध्यान भटकने न दें और दूसरों की भी मदद करें और तब तक अपनी इच्छाओं को दरकिनार करें, जब तक कि हम तय न कर लें कि उन इच्छाओं पर काम भी करना है, खुद को बदलना भी है और निरंतरता बनाए रखनी है।

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