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किसकी धरती

यह दुनिया मनुष्य से इतर किसी दूसरे के लिए भी हो सकती है, इसे स्वीकार ही नहीं करता। आखिर किस ने लिख कर दिया कि धरती पर सौ फीसदी हक सिर्फ मनुष्यों का है, बाकी और कोई प्रजाति जीने के लायक ही नहीं।

पक्षियों और पौधों की वजह से मानव जीवन चल रहा है। (Source: Ranjit Lal)

सवेरे-सवेरे खिड़की पर पंछियों के लिए दाना रख रही थी कि नजर बेलपत्र के पेड़ पर पड़ी। उस पर पत्ते बहुत कम थे, मगर सैकड़ों फल थे। कुछ पीले भी थे, यानी कि वे पक गए होंगे। एक कबूतर और दो तोते बिल्कुल शांत भाव से ऋषियों की तरह बैठे दिखाई दिए। क्या करें, बेल के कठोर छिलके को चोंच से भेद भी नहीं सकते, लेकिन जिस पार्क में ये दोनों लगे हैं, वहां दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता।

बेल के पेड़ से हट कर चम्पा पर नजर पड़ी। हल्के पीले और लाल छींटेदार फूलों के इतने गुच्छे। तैयारशुदा बुके, यानी गुलदस्ता। लेकिन गुलदस्ता भी किसके लिए! इन दिनों न कोई उत्सव, न मेल-मिलाप, न किसी त्योहार को मनाने की ललक। याद आने लगे वे सामान्य दिन, जब मौके-बेमौके लोग एक दूसरे से मुलाकात की औपचारिकता में संवेदना की सांस भरने के लिए फूलों का गुलदस्ता बतौर भेंट देते थे। अब भी देने की इच्छा रखते होंगे, लेकिन अब शायद गुलदस्ते के सहारे संवाद या फिर संबंध में सुगंध भरने के दिनों का इंतजार किया जा रहा होगा।

खैर, कुछ देर बाद दूसरी तरफ बालकनी की खिड़की खोल कर कपड़े सुखाने लगी, तो फूलों से लदा गुलमोहर और अमलतास दिखाई दिया। चटख लाल और वसंती रंग के ढेर सारे फूल। आजकल के इस उदास मौसम में जैसे पेड़ों की यह उत्फुल्लता ही सहारा है। वरना तो सवेरे से शाम तक सिर्फ नकारात्मक खबरें ही सुनाई देती हैं। कितने मित्र-परिचित साथ छोड़ गए। हर रात डर में बीतती है और हर सुबह इस आशंका से शुरू होती है कि पता नहीं, आज क्या हो। मनुष्य जो अपने को दुनिया का मालिक समझने का भ्रम पाले था, उसे एक विषाणु ने ठिकाने लगा दिया है।

दूसरी तरफ ये पेड़, जिन्हें हम कुछ नहीं समझते हैं, जब चाहे काट कर, जड़ों में तेजाब डाल कर नेस्तनाबूद कर देते हैं, वे इस मुसीबत के समय भी वैसे ही मुस्करा रहे हैं, जैसे पहले मुस्कराते थे। आखिर महामारी का कोई असर इन पर क्यों नहीं पड़ा? ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जैसे साल भर से हम मुरझाए दिख रहे हैं, ये भी वैसे ही उदास दिखते। इन पर भी फूल न लगते। ये भी मनुष्य की तरह डॉक्टरों और अस्पतालों की तरफ भागते।

लेकिन प्रकृति का नियम तो देखिए। जो मनुष्य अपने को सर्वशक्तिमान समझ रहा था, वह इन दिनों एक-एक दिन की जान की भीख मांग रहा है और ये पेड़, ये पौधे, ये पंछी, ये पहाड़, ये नदियां सब जस के तस हैं। इनके होने से ही मनुष्य आज खुद को एक सीमा में खुद को सुरक्षित पा रहा है। वरना जिस रफ्तार से पेड़-पौधों को काटने या जंगलों को खत्म करने की प्रक्रिया चल रही है, उसमें आने वाले दिनों की बस कल्पना की जा सकती है। आज समूची दुनिया ऑक्सीजन की चुनौती का सामना कर रही है। सवाल है कि वह जीवनदायिनी ऑक्सीजन की उपलब्धता कैसे और कहां से होती है!

जिस कॉरपोरेट ने अपने-अपने उत्पाद बेचने के लिए तरह-तरह के मुहावरे गढ़े थे, आपका ‘स्टाइल स्टेटमेंट’, आपका ‘एटीट्यूड’, जीने के अपने-अपने तौर-तरीके, वे सब देखते-देखते धराशाई हो गए हैं। हम अक्सर मनुष्य के संदर्भ में प्रकृति की विनाश लीला की बातें करते हैं। लेकिन अगर पेड़, पहाड़, नदियां, पशु-पक्षी बता सकते तो कहानियां न जाने कितनी डरावनी होतीं कि मनुष्य ने अपने स्वार्थों के लिए प्रकृति के इन उपादानों का कितना सर्वनाश किया है। मनुष्यवादी सोच न केवल इस धरती, बल्कि अंतरिक्ष तक को अपनी जागीर समझता है।

यह दुनिया मनुष्य से इतर किसी दूसरे के लिए भी हो सकती है, इसे स्वीकार ही नहीं करता। आखिर किस ने लिख कर दिया कि धरती पर सौ फीसदी हक सिर्फ मनुष्यों का है, बाकी और कोई प्रजाति जीने के लायक ही नहीं। स्वार्थ के रथ पर सवार समूची धरती पर कब्जे की जिस प्रवृत्ति में वह जी रहा है, क्या इस तरह उसका खुद का जीवन सुरक्षित रह पाएगा? क्या मनुष्य को इस बात का अहसास आज भी नहीं हो पा रहा है, जब अपनी इसी प्रवृत्ति की वजह से उसका अस्तित्व खतरे में है?

स्वार्थ से भरे इसी सोच का परिणाम है कि मनुष्य अपनी दुनिया में सिमटता हुआ कैद में अपने जीवन के सामने भी कई तरह की चुनौतियां देख रहा है। पेड़ इसलिए चाहिए कि वे जीवन के लिए जरूरी ऑक्सीजन देते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं। हमारे खाने-पीने का प्रबंध करते हैं। और तो और, मुसीबत के वक्त हमें जीवन का अहसास कराते हैं और कई बार मनोरंजन भी करते हैं। जैसा कि मेरे साथ हुआ था।

पेड़ स्वतंत्र रूप से एक इकाई भी हैं। इस धरती पर उनका भी उतना ही हक है, जितना कि हमारा। जब तक हम यह नहीं मान लेते, तब तक प्रकृति का विनाश नहीं रुक सकता। इस विनाश के कारण जीवन चक्र में जो असंतुलन पैदा होता है, जिसके कारण तरह-तरह की बीमारियां और महामारियां पैर पसारती हैं, वे भी नहीं रुक सकतीं।

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