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प्रसिद्धि की कसौटी

एक प्रसंग के मुताबिक एक बार रामकृष्ण परमहंस ने युवा नरेन यानी विवेकानंद से कहा- ‘नरेन जरा पास के पुकुर (तालाब) को देख कर आओ।’ नरेन जब तालाब के पास गए तो वहां एक कमल का फूल खिला था और उस पर भौंरें मंडरा रहे थे। रामकृष्ण परमहंस ने नरेन से कहा- ‘कमल का फूल भौरों को बुलाने नहीं जाता, भौरों को अपने आप पता चल जाता है। इसी तरह, जिसमें कोई खास बात होती है, उसका पता लोगों को चल ही जाता है।’

प्रसंगवशस्वामी विवेकानंद।

कमलेश कमल
पुष्प के सुवास का पता भ्रमर को कौन देता है? आम की मंजरियों का ठिकाना कोयल को कैसे मिलता है? साइबेरिया के प्रवासी पक्षी सहस्रों योजन दूर भरतपुर और हमारे देश के कुछ अन्य हिस्सों की अनुकूल पारिस्थितिकी को कैसे जान जाते हैं? चांदनी का पता चकोर को और बादल का पता मोर को कैसे चलता है? सिद्ध पुरुष की सिद्धि हो, साधक की साधना हो, चिकित्सक का उपचार-कौशल हो या कलाकार की कला हो, जिन्हें जानना चाहिए, जान ही लेते हैं। क्या आपने गौर किया है कि जहां मद्य निषेध है, वहां भी पीने वालों को पता चल ही जाता है कि मदिरा कहां से मिल सकती है। प्राकृतिक तौर पर मिली हुई पहचान की शक्तियों से इतर यह एक दिचचस्प पहलू है, जिसमें सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था, चलन और जनजीवन का पक्ष घुला हुआ है।

इस तरह के उदाहरणों के आलोक में देखें तो यह स्पष्ट है कि अगर आपमें रचनात्मक क्षमता है, सर्जनात्मक सामर्थ्य है, खोजने की इच्छा है तो अपने इच्छित और जरूरत की चीजों का पता सुधीजनों को लग ही जाता है। दुनिया आपको ढूंढ़ ही लेगी। इसके विज्ञापन की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आवश्यकता है सतत् साधना की। साधना पथ के राही, विज्ञापन के विश्वासी नहीं होते। वे कर्म के अभ्यासी होते हैं और कर्म-विलासी होते हैं। यह एक तथ्य है कि सर्जनात्मकता का परिक्षेत्र आमतौर पर हमेशा ही आम जनों के लिए रहस्यपूर्ण और आकर्षक रहा है। कोई कैसे अच्छा लिख लेता है या कोई कैसे अच्छी कलाकृतियों को जन्म दे देता है- यह कौतुहल तो यों ही बना रहता है। फिर भी, यह समझा जा सकता है कि इस सूचना-आक्रांत समय में बौद्धिक-कार्य व्यापार में लगे लोग भी अपने उत्पाद का विज्ञापन करते हैं। आखिर प्रसिद्धि के नशे को सबसे अधिक असरदार वैसे ही नहीं माना गया है।

प्रसिद्धि के लिए सामान्य से विशेष क्षमता से लैस होने से लेकर अवांछित हरकतें करके अपनी ओर ध्यान खींचने के प्रयासों तक की छवियां हमारे आसपास अक्सर दिख जाती हैं। लेकिन इस पर विचार अवश्य होना चाहिए कि इस तरह के विज्ञापन या खुद को अनावश्यक तौर पर प्रसिद्ध करने की कोशिशें कितनी प्रभावी होते हैं, उनकी आयु कितनी होती है! क्या इस तरह प्राप्त लोकप्रियता टिकती भी है?

एक प्रसंग के मुताबिक एक बार रामकृष्ण परमहंस ने युवा नरेन यानी विवेकानंद से कहा- ‘नरेन जरा पास के पुकुर (तालाब) को देख कर आओ।’ नरेन जब तालाब के पास गए तो वहां एक कमल का फूल खिला था और उस पर भौंरें मंडरा रहे थे। रामकृष्ण परमहंस ने नरेन से कहा- ‘कमल का फूल भौरों को बुलाने नहीं जाता, भौरों को अपने आप पता चल जाता है। इसी तरह, जिसमें कोई खास बात होती है, उसका पता लोगों को चल ही जाता है।’

इसमें कोई अत्युक्ति नहीं कि बिना सिद्धि के प्रचार के बल पर अर्जित लोकप्रियता कभी स्थायी नहीं होती। कुछ समय के लिए लोग आपके पास आ सकते हैं, पर जैसे ही उन्हें पता चल जाएगा कि आपके भीतर वह बात नहीं, वह गुरुता नहीं… तो वे आपसे छिटक कर दूर हो जाएंगे। हो सकता है कि कुछ वक्त तक एक भ्रम काम करे, लेकिन वक्त आने पर परदा उठता है। मानव व्यवहार के इस नियम का कोई अपवाद नहीं है।

यहां बौद्धिक विज्ञापन के मनोवैज्ञानिक कारण को भी देख लेना समीचीन होगा। यह हर संवेदनशील व्यक्ति और विशेषकर लेखकों के साथ होता है कि जीवन के अनुभव, विचार आदि से जूझते हुए या उनमें अंतर्भुक्त मौन को सुनते और गुनते वह अनेक यात्राएं कर जाता है। ऐसे में वह उन यात्रिक अनुभवों को शब्दों में पिरो कर पेश करना चाहता है। इसी अनुभव के वैशिष्ट्य को अतिरंजित कर जब वह बहुप्रचारित करने लगता है, तब उसकी आगे की यात्रा प्रभावित हो जाती है और कभी-कभी तो प्रगति भी रुक जाती है। सयानी समझ के धनी और भोगे हुए यथार्थ से संपृक्त वरिष्ठ जन और गुरुजन इसीलिए हमें आगाह करते रहते हैं कि कर्म विलासी बनो, प्रसिद्धि विलासी नहीं।

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि कलमकारों, रचनाकारों को अपनी उदग्र रचनाधर्मिता के नित-पोषण पर ही श्रम करना चाहिए और शीघ्र प्रसिद्धि के हथकंडों जैसे अनुपयोगी कर्म से बचना चाहिए। ऐसा कर्म हो, जिससे हमारे अंत:करण का आयतन बढ़े और रचनात्मक कौशल का परिष्कार होता रहे। बिना साधना के हासिल की गई घोषित क्षमता की बुनियाद बहुत मजबूत नहीं होती है। इस तरह की क्षमता कृत्रिम प्रयासों से कुछ समय के लिए तो प्रसिद्धि दिला सकती है, लेकिन उस प्रसिद्धि के दीर्घजीवी होने की संभावना कमजोर होती है। इससे जुड़ी एक बड़ी समस्या यह है कि कृत्रिम प्रयासों से प्राप्त प्रसिद्धि का महल सत्य के सामने आने पर ढहता है तो पहले की जमा की गई संपत्ति यानी विश्वसनीयता भी दांव पर लग जाती है। इसके ठीक उलट सत्य और वास्तविक क्षमताओं से मिली प्रसिद्धि की उम्र लंबी होती है, भले उसका दायरा बड़ा न हो।

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