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उल्टी गंगा के तैराक

स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना भ्रष्टाचार की नजर लग जाने से बंद होने के कगार पर है। कहीं-कहीं तो उच्च न्यायालय के आदेश से इसे पुन: जीवनदान मिला है। पर केवल भूख मिटाना क्यों, यहां तो अधनंगे बदनों को कपड़े से भी ढकने की समस्या है। अपने राज्य के स्कूलों में सरकार ने बच्चों के लिए मुफ्त वर्दियां बांटने की घोषणा की है। लालफीताशाही इसे भूल गई, खाली खजाने का रुदन राग तो चलता ही रहता है।

सुरेश सेठ

यह नई दुनिया है। बदलाव भरी दुनिया। शिक्षा क्रांति का नारा लगाती दुनिया। सेहतयाब होती दुनिया। बता रहे हैं कि स्कूलों का चेहरा बदल गया और बच्चों से लेकर बड़ों तक कुपोषण की समस्या भी खत्म हो गई। इन स्कूलों का चेहरा बदल गया है और इसका माडल दिखा कर चुनावी विजय होती है। मगर वहां पढ़ते बच्चे तो आज भी सींकिया बदन हैं। सरकार ने बच्चों के हाथ में पुस्तक और पेट में रोटी देने के लिए स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना शुरू की थी। उम्मीद थी कि कम से कम एक समय तो उन्हें उचित भोजन मिल जाएगा।

उधर सर्व शिक्षा अभियान भी चला रखा है। प्राथमिक शिक्षा का सब बच्चों को संवैधानिक अधिकार भी दे दिया है, लेकिन देने की घोषणा करने और वास्तव में मिल जाने के सच में अंतर होता है। ‘पब्लिक स्कूल कल्चर’ की कमर तो टूटी नहीं, गरीब बच्चों को इन स्कूलों की आरक्षित सीटों पर दाखिला नहीं मिला। बीच में निजी शिक्षा के मसीहाओं ने अदालतों की निषेधाज्ञा खड़ी कर दी। अब इंतजार और अभी।

इधर सरकारी स्कूलों में जो मध्याह्न भोजन योजना शुरू हुई है, उसमें पुष्ट-पोषण के नाम पर खबरचियों ने खबर दी कि बच्चों को सूखी रोटी के साथ नमक मिलना शुरू हो गया है। आंकड़ा शास्त्रियों ने भी इसके असल चेहरे की गवाही दे दी। बताया कि इस देश में पांच साल की उम्र तक के बच्चे आधे से अधिक काल कलवित हो जाते हैं, तो बारह-चौदह साल के बच्चों में भी कुपोषण की वजह से, उसी तरह लगभग आधे काल का ग्रास हो जाते हैं। शेष जो बचते हैं, उनमें से बड़ी तादाद मानव तस्करों की कृपा से लापता होकर तेल धनी देशों के शेखों के द्वार तक पहुंच जाती है।

अब मध्यपूर्व के इन देशों में राजनीतिक उथल-पुथल बढ़ जाने के बाद सोचा जा रहा है, कि क्या इससे धनी शेखों के धन के पहाड़ कुछ कम हो जाएंगे? क्या उनकी रुचियों, ऐश्वर्य और विलास में कुछ अंतर आएगा? अंतर चाहे न आए, लेकिन इसी आशंका से हो सकता है कि मानव तस्करी का धंधा कुछ मंदा हो जाए। बच्चे अगर अपहृत होकर लापता कम होने लगेंगे, और गरीबों की गूदड़ बस्तियों में दनदनाते नजर आएंगे।

स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना भ्रष्टाचार की नजर लग जाने से बंद होने के कगार पर है। कहीं-कहीं तो उच्च न्यायालय के आदेश से इसे पुन: जीवनदान मिला है। पर केवल भूख मिटाना क्यों, यहां तो अधनंगे बदनों को कपड़े से भी ढकने की समस्या है। अपने राज्य के स्कूलों में सरकार ने बच्चों के लिए मुफ्त वर्दियां बांटने की घोषणा की है। लालफीताशाही इसे भूल गई, खाली खजाने का रुदन राग तो चलता ही रहता है। सुबह के मुर्गों ने दोपहर को बांग दे दी, सरकारी मशीनरी जागी। गर्मियों की वर्दियां सर्दियों में बंटी। अब उम्मीद है कि सर्दियों की वर्दियां भरपूर गर्मी तक बंट कर सबका उपकार कर सकेंगी। भई, भला हो पर्यावरण प्रदूषण का। मौसम का सारा गणित बिगाड़ रखा है।

गर्मी के दिनों में सर्दी पड़ने लगती है और सर्दियों में पंखा चलाने की नौबत आती है, कि जैसे सावन की बेवफाई ने बिन बादल बरसात के अतिकथन को सच करना शुरू कर दिया है। इस पर्यावरण प्रदूषण से जल्द तो छुटकारा मिलेगा नहीं, क्योंकि चचा सैम ने ‘अमेरिका अमेरिकियों’ का वादा लगा कर इन संधियों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है, और सजा के तौर पर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा कर तीसरी दुनिया के देशों का तेल-डीजल बंद करने का प्रयास किया है। अब अगर महंगा होता कच्चा तेल कम आयात होने लगेगा तो इसका प्रयोग भी कम होगा। यों पर्यावरण प्रदूषण अपने आप कम हो जाएगा।

इसी तरह तेल का आयात जब घटेगा, गरीब देशों की उत्पादक गतिविधियां कम हो जाएंगी। उनका हरित गैस का उत्सर्जन अपने आप कम हो जाएगा। जी हां, यहां और वहां, देश में और विदेश में जटिल समस्याएं यों ही हल होती हैं। पर्यावरण प्रदूषण रुक नहीं पाया, मौसम बेवफा हो गया। बच्चों की पिछड़ी वर्दियां काम आ गईं। नई शिक्षा नीति के अनुसार तीन घंटे की परीक्षा का विकल्प ढूंढ़ा जा रहा है। आनलाइन अनुमान न मिलने के कारण सरकारी आदेश के बावजूद दलित छात्रों के रोल नंबर नहीं मिल रहे। परीक्षाएं व्यर्थ हो रही हैं, अवश्य इनका कोई विकल्प नई शिक्षा नीति में तलाश लिया जाएगा।

इधर मध्याह्न भोजन योजना की विफलता और भूख के दबाव में स्कूली छात्र भगोड़े होने लगे। इससे देश में बाल श्रमिकों की संख्या में कोई कमी नहीं आएगी और सरकार का यह दावा सच होता नजर आता रहेगा कि अपने देश में उत्पादकों के लिए श्रम बड़ा सस्ता है और यह सस्ता ही रहेगा। अब बताइए, अगर स्कूली छात्र खुद भगोड़े हो गए तो भाग्यनियंताओं का क्या दोष!

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