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सोच की सीमाएं

उम्र बढ़ने के साथ बड़ा होना महज एक शारीरिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह कई तरह के अनुभव अपने साथ लेकर आता है। इसलिए बचपन की दहलीज से निकल कर जब हम किशोरावस्था की पहली सीढ़ी पर कदम रखते हैं तो हारमोनों में बदलाव अपना रंग दिखाना शुरू करते हैं।

आज जब हम नूतन समाज और तकनीक पर नाच रहे हैं, तब बेटियों की सखी बनने की बजाय उनसे छिपते फिरते हैं। (Source: Bihar government PR Handout)

जीवन में होने वाली हर घटना हमें कुछ न कुछ सिखा कर जाती है। अनुभव अच्छा हो या बुरा, यह कहीं न कहीं हमारी सोच और विचारधारा का हिस्सा जरूर बनता है। यह निर्भर करता है कि यादों की संदूक में उस पल को किस थैली मे बंद करके रखा गया है। जरूरत पड़ने पर अनुभवों की यही थैलियां हम अपनों को देते हैं, ताकि उस तरह की परिस्थितियों में उन्हें संभलने में आसानी हो। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हर पोटली का अनुभव हीरा ही हो। अनुभवों मे भी अगर समय की हवा न लगती रहे तो वे भी सड़ जाते हैं।

वाकया पिछले साल सब कुछ बंदी होने के एक महीने पहले का है। जब बेटी स्कूल से दुखी होकर लौटी थी। वजह पूछने पर उसने सीधा एक सवाल पूछा कि क्या माहवारी के बारे में जानना और बात करना गलत है! मैंने कहा कि नहीं। वह चुप हो गई। मैं हैरान थी, क्योंकि इससे जुड़ी सारी बातें मैं उसे पहले ही बता चुकी थी। उसकी परेशानी मुझे कचोट रही थी। दरअसल, स्कूल में कुछ दिन पहले महिला डॉक्टरों की टीम आई थी और ऊंची कक्षा की सभी लड़कियों को माहवारी से जुड़ी बातें बताई गई थीं। उसकी सहेली ने पहली बार इसके बारे मे सुना तो वह घबरा गई थी।

फिर उसने बताया कि उसकी सहेली ने जब इस बारे में अपनी मां से पूछा तो उसे डांट और मार, दोनों ही पड़ी। अब परीक्षाओं के बाद उसका स्कूल भी बदल दिया जाएगा, क्योंकि उसकी मां का कहना है कि स्कूल में ‘गंदी बातें’ सिखाई जा रही हैं। जब हम जानते हैं कि माहवारी लड़कियों का एक जरूरी शारीरिक बदलाव है और जो होना जरूरी है और अगर यह समय पर नहीं शुरू होता तो शरीर मे कई तरह की समस्याएं पनपती हैं, तब भी हममें से बहुत सारे लोगों के लिए यह ‘गंदी बात’ कैसे और क्यों है? स्त्रियों की सेहत का यह सवाल हमारे समाज में इतना हेय कैसे बन गया?

उम्र बढ़ने के साथ बड़ा होना महज एक शारीरिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह कई तरह के अनुभव अपने साथ लेकर आता है। इसलिए बचपन की दहलीज से निकल कर जब हम किशोरावस्था की पहली सीढ़ी पर कदम रखते हैं तो हारमोनों में बदलाव अपना रंग दिखाना शुरू करते हैं। यह लड़के-लड़कियों, दोनों के साथ होता है। लड़कों मे हो रहे बदलावों पर हम ध्यान देने की ही जरूरत नहीं समझते, बात करना तो दूर की बात है और लड़कियों से बात मजबूरी में की जाती है। वह भी ज्यादातर किंतु-परंतु से निपटा दी जाती है।

हम उन्हें सब कुछ समय से सिखाना चाहते हैं- खाना बनाना, घर का काम करना और इन सबकी अहमियत भी समझाते रहते हैं। लेकिन उनकी सेहत से जुड़े सवालों पर सीखने-समझने के लिए उन्हें अकेला छोड़ देते हैं। बल्कि उनके दिमाग में तरह की वर्जनाएं भर देते हैं, ताकि वे इस बारे में सही से कुछ समझ ही नहीं सकें। लड़कियों के दस-बारह साल पार करते ही आस-पड़ोस के लोगों के बीच गुपचुप चर्चा शुरू हो जाती है। इसे ऐसा पहलू बना दिया गया है, जिसमें इस पर छिप कर और फुसफुसाकर बात की जाती है।

खैर, इन घटनाओं के बाद एक सवाल दिमाग में तैरने लगा कि विचारों को खुलापन भी हम अपनी शर्तों पर ही देते हैं। सोशल मीडिया कि जितने भी मंच हों, वहां लोग होड़ में होते हैं अपने आधुनिक विचारों का खुलापन उड़ेलने के लिए। सुप्रभात संदेशों से लेकर शुभरात्रि तक संदेश देने और दूसरों के वीडियो, कहानियों पर ‘इमोजी’ सजाने में पल भर भी देर नहीं लगाते। हर तरफ सोच में आधुनिकता का तूफान नजर आता है। लेकिन जब वाकई कुछ मुद्दे चर्चा मांगते हैं तो अचानक हम पुराने रीति-रिवाज और तौर-तरीकों की वकालत करने लग जाते हैं। फिर किताबें पढ़ने और डिग्रियां अलमारी में सजाने का क्या फायदा?

हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इस मसले पर अलग-अलग धारणाएं और सोच रही हैं। कहीं यह उत्सव का माहौल बनाता है तो कहीं लड़कियों को उत्सव और त्योहारों से अलग-थलग पटक देता है। कहीं लड़कियों की पूजा होती है तो कहीं वे अछूत हो जाती हैं। इन परिस्थितियों में हमारी मां, काकी, ताई, दादी, बुआ ही खास भूमिका अदा करती हैं, फिर चाहे जश्न का माहौल हो या फिर लड़कियों को एकांतवास में धकेलना।

हैरानी होती है कि दुनिया की उन्नत सभ्यताएं जब पनप ही रही थीं, तब तक हमारे यहां इस मसले पर समृद्ध विचारों से लैस साहित्य थे। आज जब हम नूतन समाज और तकनीक पर नाच रहे हैं, तब बेटियों की सखी बनने की बजाय उनसे छिपते फिरते हैं। मां-बेटी की दोस्ती की बातें और किस्से हम खूब कहते और सुनते हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि हम कहीं न कहीं एक जैसे बदलावों का सामना करते हैं। लेकिन अगर एक का अनुभव दूसरे के काम ही न आ सके तो उसका फायदा क्या?

अब बूढ़ी मां की सीख खूब याद आती है। दादी कहने से वह गुस्सा हो जाती थी। बड़ी बहन को माहवारी आने पर घर की लड़कियों को ही नहीं, भाइयों को भी बुला कर उन्होंने सबको इस बारे में बताया और समझाया था। ताऊ जरूर बिगड़े थे कि लड़कों को यह सब बताने की क्या तुक। तब उन्होंने कहा था कि जानकारी का रास्ता हमेशा सीधा होना चाहिए। जब अपने घर की बहन-बेटी के बारे मे जानेंगे तो बाहर भी हर औरत की कद्र करेंगे। …और हां, बूढ़ी मां अनपढ़ थीं।

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