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विचार बनाम खीझ

भारतीय ज्ञान परंपरा में विचार का सरल अर्थ यह है कि बड़े ठहराव के साथ अपने आसपास की दुनिया समझें और उतना ही कहें, जितनी उसकी चीजों को लेकर स्पष्ट समझ हैं।

समाज में मिलने-जुलने और बातें करने की अपनी परंपरा है। (photo-pixabay)

प्रदीप कुमार राय
पूछा जाए कि ‘गाय की भैंस क्या लगी’ तो जवाब होगा- कुछ भी तो नहीं। उत्तर भारत के कुछ हिस्से में यह कहावत प्रचलित रही है। जब दो बेमेल बातों को जबर्दस्ती एक दूसरे के साथ जोड़ा जाता है, तो हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से में लोग यह कहावत बोलते हैं। इस कथन का यह अर्थ कतई नहीं कि गाय ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या भैंस। यह इसका संदर्भ ही नहीं है। इसके निहितार्थ बहुत मूल्यवान हैं। आपस में मेल न खाते विषयों को जबर्दस्ती एक दूसरे के साथ जोड़ने से या किसी चीज के वास्तविक स्वरूप को भूल कर उसे कुछ और मानने से इंसान भ्रम के गहरे जाल में फंस जाता है।

इन दिनों समाज में जो एक बड़ी समस्या विकराल रूप धारण कर रही है, उसको सही से समझने के लिए यह कहावत बहुत उपयोगी बनती है। दरअसल, सोशल मीडिया प्राणी बन रहा मानव खीझ भरी शैली में बात रखने को विचार करना या विचार प्रकट करना मान रहा है। ट्विटर पर तो बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग खीझ भरे संवाद में चिंतन खोज रहे हैं। अधिकांश संवाद ऐसा है कि जैसे बहुत लोग बात कहते हुए अंदर से फट गए। अब दुर्भाग्य है कि जब उनसे इस बारे पूछा जाए, तो वे कहते हैं कि संवाद कर रहे हैं, विचार कर रहे हैं। कहावत के प्रकाश में समझें तो ‘खीझ’ और ‘विचार’ का क्या मेल! एक अन्य और उदाहरण से इस बात को और साफ रोशनी में समझ सकते हैं। विष को अमृत या दिन को रात कहने से बड़ा झूठ कुछ नहीं लगता।

ऐसे ही खीझ भरी भाषा को विचार करना मानना उससे भी बड़ा धोखा है। यह धोखा है, खुद के साथ पूरी मानवता के साथ। खीझ भरा संवाद विष है, जो व्यक्ति के सोच विचार को रोगग्रस्त करता है। इस विष को मारने की मात्र औषधि संगत विचार है। विचार मनुष्य का भला किस प्रकार करता है? किसी वाहन के आगे का शीशे पर लगातार गिरती धूल को वाइपर साफ करता है, उसी प्रकार मनुष्य की दृष्टि यानी चीजों को सही परिप्रेक्ष्य मे समझने की शक्ति पर बहुत प्रकार की निराधार अवधारणाओं की धूल निरंतर पड़ती रहती है, बहुत बेकार बातों की धूल लगातार मनुष्य की चिंतन शक्ति को ढकती है। संगत विचार इस धूल को हटाने के वाइपर का कार्य करता है।
लेकिन विचार हो कैसे पाएगा? उसके लिए तो विचार शब्द का सही बोध लोगों के भीतर होना जरूरी है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि अंग्रेजी के शब्द ‘थिकिंग’ का भारतीय शब्द विचार से कोई नाता नहीं। ‘थिकिंग’ को सिर्फ सोचने की क्रिया के भाव के रूप में प्रयोग किया जाता है और इस संदर्भ में सोचने का उद्देश्य है कि चीजों के बारे में ‘आॅपिनियन’ बनाना। अंग्रेजी में मूल रूप से ‘आॅपिनियन’ को आपकी ‘फिलिंग’ माना गया है। बस आपने महसूस किया यानी आपके भीतर जो अचेतन में भी भाव उठा, वह आपका ‘आॅपिनियन’ या विचार हो गया। जबकि विचार का भाव है कि चीजों के सभी संभव पक्षों को सम्यकता के साथ देखना। यानी पहले ही मुनष्य को आगाह कर दिया कि बिना लाग-लपेट और पक्षपात के सम भाव से चीजों को देख कर वह विचार करने की प्रक्रिया की तरफ अग्रसर होगा। इससे भी बड़ी बात भारतीय ज्ञान परंपरा स्पष्ट कहती है कि विचार बहुत सूक्ष्म होता है। वह इतनी जल्दी पकड़ में आता नहीं। इसके लिए बारीकी में जाना पड़ेगा। इस सूक्ष्म से विचार को पकड़ने के लिए व्यक्ति को बहुत ठहराव भरे मनन से होकर गुजरना पड़ता है।

अब ठहराव की शर्त के साथ दुनियादारी को समझें, तो फिर खीझ उसमें रहेगी कहां? अगर वास्तव में विचार की वास्तविक प्रक्रिया से होकर व्यक्ति ने अपनी बात कर ली, तो बस फिर वह तो असली रस निकाल कर देगा। फरीद विचार के उस तल पर चले गए कि उन्होंने इतना गहरा ज्ञान पाकर भी कहा कि संसार की वास्तविकता को पूर्णता में समझना बड़े-बड़ों के वश की बात नहीं। इसीलिए तमाम ज्ञान पाकर वे कहते हैं- कछु नै सूझै, कछु न बूझै। आज की प्रचलित भाषा में इसको समझें तो फरीद कहते हैं कि इस संसार में बड़ी पेचिदगियां है, इसका विस्तार पकड़ में नहीं आता।

भारतीय ज्ञान परंपरा में विचार का सरल अर्थ यह है कि बड़े ठहराव के साथ अपने आसपास की दुनिया समझें और उतना ही कहें, जितनी उसकी चीजों को लेकर स्पष्ट समझ हैं। अन्यथा होगा यह कि भ्रम पर भ्रम बढ़ते जाएंगे और हम चाह कर भी किसी बात का निष्कर्ष नहीं निकाल पाएंगे। अब विचार के बारे में तो मनीषियों ने कह दिया कि वह ठहराव के साथ चीजों को समझने की प्रक्रिया है और इसकी अभिव्यक्ति भी ठहराव में होती है। लेकिन आज मानव जाति का सोशल मीडिया धर्म इतना प्रबल है कि उसे तत्काल अपनी प्रतिक्रिया देनी ही देनी है। ऐसे में मनुष्य जाति को तय करना होगा कि क्या हम खीझ भरे संवाद से आगे बढ़ कर मनुष्यता का भला नहीं करना चाहेंगे! अगर जवाब ‘न’ में हुआ तो विचार के गर्भ से निकलने वाली ‘नीर-क्षीर विवेकपूर्ण’ निर्णय शक्ति हमें कहां से मिलेगी!

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