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कहीं देर न हो जाए

आज बहुत से ऐसे मुल्क है जहां गरीबी अपनी चरम सीमा पर है और टीका कुछ अमीर देशों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। जिस देश के पास पैसा है, वही सारा टीका खरीद रहा है और जिस देश में गरीबी है, वहां मौत किस कारण से हुई, यह कोई नहीं पूछता, न कोई कुछ जानना चाहता है, क्योंकि गरीबी में ज्यादातर मौतें भूख से होती हैं!

जम्मू के एक अस्पताल में कोरोना वैक्सीन लगवाती युवती।

नंदितेश निलय
मुनीर नियाजी ने लिखा है- ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं।’ आजकल जब जीने की बात होती है तो हम भी कुछ देर कर जाते हैं- मास्क पहनने, हाथ धोने, बड़ों की बात मानने और छोटों को समझने में। आज इस महामारी के दौर में हमें बचना होगा अपनी इस आदत से, जहां कोई भी काम बहुत देर से शुरू होता है और समाप्त पश्चाताप पर ही होता है।

आज बहुत से ऐसे मुल्क है जहां गरीबी अपनी चरम सीमा पर है और टीका कुछ अमीर देशों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। जिस देश के पास पैसा है, वही सारा टीका खरीद रहा है और जिस देश में गरीबी है, वहां मौत किस कारण से हुई, यह कोई नहीं पूछता, न कोई कुछ जानना चाहता है, क्योंकि गरीबी में ज्यादातर मौतें भूख से होती हैं! उन मुल्कों में खाना पहुंचने में देरी हो गई और बहुत विलंब हो गया गरीबी को हटाने में! हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि हम उस देश में रहते हैं, जहां हमारा पेट भी भर जाता है और मन भी। आज टीका भी मिल जाता है और हमारी आवाज भी दूसरों तक पहुंच जाती है। लेकिन अब देर करने की जरूरत नहीं है। अगर देर हो गई तो न आॅक्सीजन पहुंच पाता है, न दवा।

समय आ गया है कि हम अपने अंदर उस औपनिवेशिक काल से पलते हुए आलस्य को समाप्त करें और किसी भी सकारात्मक कार्य को करने के लिए देरी से बचें। बहुत देर हो गई है। अब उस अहंकार को भी छोड़ दें जो हमें कोरोना से सतर्क होने नहीं देता। हो सके तो हम अपने अंदर पलते हुए उस जिद को भी छोड़ दें जो हमें हमेशा सही मानता है और दूसरों को गलत। अगर ऐसा हुआ तो हम खुद की भी मदद करेंगे और दूसरों की भी। कोरोना की महामारी ने हमें यह बताया कि जिंदगी तभी तक खूबसूरत और और शानदार लगती है, जब तक जिंदगी में आॅक्सीजन होता है और आॅक्सीजन तभी मिलता है, जब हमें अहसास हो कि हमारे अंदर फेफड़ा भी है।

हमें बात तब समझ में आती है, जब मुसीबत हमारे सिर पर आती है। पर अगर विपदा कोरोना जैसी महामारी बन कर आ गई हो तो कुछ देख कर, कुछ सुन कर और कुछ मान कर हमें अब सतर्क होने की जरूरत है। वह ऐतिहासिक आलस्य, जो हमारे मास्क को नाक तक पहुंचने नहीं देता, उसे अपनी शान मान कर नाक तक पहुंचाने की जरूरत है। दूसरों की हथेली देखने से अच्छा है कि हम खुद की हथेली साफ रखें। सबसे खास बात कि हम जीना चाहते हैं क्या? अगर हां तो अपनी वे बुरी आदत छोड़ने में विलंब नहीं करें जो हमें हमारे अंदर कोई कमी नहीं दिखाता। कोरोना ने हमें हमारे उस चेहरे से रूबरू कराया है, जहां खुद की कमी को समझने में बहुत देर हो गई है। वह हमारी लापरवाही में बखूबी कुछ महीनों से नजर आ भी रही है। यह दुखद है और शर्मसार करने वाला भी। सरकार को मास्क नहीं पहनने वालों के लिए प्रार्थना करना पड़ रहा है और जुर्माना भी लगाना पड़ रहा है।

हम कब नागरिक होंगे और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कब हम सभी उस संवेदना के इर्द-गिर्द रहेंगे, जहां जीना अपने आप में एक तपस्या है और उस तपस्या की शुरुआत शरीर से होती है और समाप्ति भी शरीर में हो जाती है। कहीं देर न हो जाए यह भी समझने में कि हम एक नागरिक भी हैं और एक इंसान भी।

समय आ गया है कि हम यह समझें कि कहीं देर न हो जाए अपने आप को और अपनों को और दूसरों को बचाने में! कोरोना ने कोई विलंब नहीं किया है। वह समय से पहले आ चुका है। हम भी अब तैयार हो जाएं। अगर हम सिर्फ अपने लिए जीना चाहते हैं तो वही सही। डरें नहीं, पर जिम्मेदारी का भाव जरूर पैदा करें। अगर नागरिक बनना चाहते हैं तो उनके लिए भी सोचें जो हमारे आसपास रहते हैं। यह अहसास करें कि जिंदगी जीने के लिए आॅक्सीजन चाहिए और वह हमें पेड़-पौधों से मिलता है, इसलिए हम अपने परिवेश के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों।

जरूरत इस बात की है कि अब हम जिंदगी को आवाज दे दें और उसे वापस बुला लें अपने लिए और उन सब के लिए जो हमें अपना मानते हैं और जिनको हम अपना मानते हैं। उन अपनों में हमारा परिवार है समाज है और मुल्क है। सोचता हूं कि मुनीर रियाजी ने जब यह लिखा होगा तो इसके लिए उन्हें कितने गहरे जाकर खुद को पहले खोजना और फिर जाहिर करना पड़ा होगा- ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं हर काम करने में/ जरूरी बात कहनी हो कोई वादा निभाना हो/ उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो/ हमेशा देर कर देता हूं मैं।’ तो मेरा खयाल है कि देर नहीं करना चाहिए… न जिंदगी को आवाज देने में और न उसे वापस बुलाने में!

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