औपचारिकता के अभिवादन

गरमी की छुट्टी या शादी-विवाह के मौके पर नानी, मौसी या बुआ के घर के प्रवास से लौटते समय नए कपड़े से विदाई और बड़े जनों के चरण स्पर्श के एवज में हाथ में चवन्नी या अठन्नी की भेंट आज के सैकड़ों रुपए के मूल्य से अधिक थे।

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पीएम मोदी जब भी अपनी मां से मिलते हैं, उनके पांव छूकर आशीर्वाद लेते हैं। (फोटो- सोशल मीडिया)

अशोक कुमार

भारतीय परंपराओं में दीर्घकाल से सामाजिक सुदृढ़ता के अनेक आख्यान आज भी शाश्वत हैं। चूंकि परिवार हमारे जीवन की प्राथमिक पाठशाला है, जहां प्रारंभिक ज्ञान बोध की रश्मियां हमें प्राप्त होती हैं। काल और परिस्थिति के परिवर्तन के फलस्वरूप इसके आयाम से हमें सदा जुड़े रहना भी पड़ता है। बचपन की स्मृतियों में जब मैं झांकता हूं, तो सहसा कुछ प्रसंग मन को मुदित कर देते हैं। लेकिन उसके गूढ़ अर्थ और भाव जीवन के प्रेरक पाठ्य के रूप में दिखते हैं।

बाल्यावस्था में बताया गया था कि गोधूलि बेला में जब मास्टर जी पढ़ाने आएं तो खुद लालटेन साफ कर इसे जला कर तैयार रखना है और द्वार पर उनके दस्तक देते ही जाकर चरण-स्पर्श करना है। बचपन की चंचलता के कारण कभी-कभी यह क्रम टूटने पर गुरुजी अति स्नेहिल भाव से संदेश दिया करते थे कि अभिवादन का यह क्रम दूसरे दिन भंग न हो।

गरमी की छुट्टी या शादी-विवाह के मौके पर नानी, मौसी या बुआ के घर के प्रवास से लौटते समय नए कपड़े से विदाई और बड़े जनों के चरण स्पर्श के एवज में हाथ में चवन्नी या अठन्नी की भेंट आज के सैकड़ों रुपए के मूल्य से अधिक थे।

अभिवादन के अर्थ को जब हम मनन करते हैं, तो इसके कई पर्याय हमारे समक्ष होते हैं। अलग-अलग तरीके से सम्मान व्यक्त करने का प्रयोग सदियों से चला आ रहा है। इस क्रिया को भारतीय संस्कृति के अमूल्य धरोहर के रूप में स्वीकार भी किया गया है। संसार के सभी धर्मों में अभिवादन को अलग-अलग शब्दों में चिह्नित किया गया है। जैसे मुसलिम भाई ‘अस्सलाम-वालेकुम’, अंग्रेजों द्वारा ‘गुड मार्निंग’, ‘गुड डे’, ‘गुड इवनिंग’ एवं गुड नाइटह्ण और बौद्ध धर्म एवं जैन धर्मावलंबी मस्तक झुका कर अपनी श्रद्धापूर्ण भावना प्रकट करते हैं।

हमारे सिख भाई ‘सत श्री अकाल’ के उच्चारण से एक-दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हैं। भारतीय संस्कृति में दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका कर अभिवादन या प्रणाम करने का प्राचीन प्रचलन है। योग विज्ञान ने यह प्रमाणित किया है कि अभिवादन मानव संचार की वह प्रभावी क्रिया है, जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे को अपनी उपस्थिति स्वीकार कराते हैं। आपसी संबंध के नवीकरण का दौर प्रस्तुत करता है।

नमस्कार या प्रणाम करना एक मनोवैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें हम हाथ जोड़ कर जोर से बोल नहीं सकते, क्रोध नहीं कर सकते और भाग नहीं सकते। दरअसल, यह एक ऐसी क्रिया है, जिससे हम मुस्कान की मुद्रा लिए सकारात्मक धरा पर श्रद्धा, विनम्रता और अपनत्व का प्रदर्शन करते हैं। पश्चिमी देशों में हाथ मिलाकर परस्पर मान-सम्मान का क्रम सदियों से गतिशील है। संचार साधनों की प्रबलता ने आज चिट्ठी-पत्री, लेखन और प्रेषण का क्रम बाधित कर दिया है, जबकि पहले लिखे जाने वालों पत्रों में ‘प्रणाम’, ‘नमस्कार’, ‘नमस्ते’, ‘आशीष’ आदि शब्दों से ही पत्र की शुरुआत होती थी।

इस भाव का अर्थ है कि सभी मनुष्यों के हृदय में एक उदात्त चेतना और प्रकाश अवस्थित है, जो एक का दूसरे से आभार प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। इसे एक सात्विक संस्कार के रूप में भी निरूपित किया गया है, क्योंकि इसके प्रकटीकरण से हमारा अहंकार और आडंबर कुछ पल के लिए विसर्जित हो जाता है। यह विदित है कि विद्या की शोभा विनम्रता में है। जो सरल हैं, झुकते हैं और कोमल हैं, वे कभी टूटते नहीं। जबकि कड़क, कठोर और खुरदरे शीघ्र टूट कर बिखर जाते हैं। नमस्कार की मुद्रा गैरों में भी कभी-कभी अपनत्व का बीज बो देती है, क्योंकि इसमें साधुता, सरलता, कोमलता और पवित्रता का तात्त्विक मिश्रण है।

अन्य सामाजिक परंपराओं की तरह अभिवादन के स्वरूप में भी परिवर्तन हो रहे हैं। यों कहें कि इसके मूल्यों और गरिमा में ह्रास के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगे हैं। भारतीय मान्यताओं कोे भौतिक आचरण ने जिस रूप में अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया है, उससे अभिवादन भी अछूता नहीं रह गया है। टाटा, बाय-बाय, हेलो, आल द बेस्ट जैसे शब्दों के गहन प्रचलन ने विरासतीय अभिवादन के कई सूत्रों को जकड़ तो लिया ही है, साथ ही हमारी संस्कृति के सामाजिक मूल्यों को ‘देशी मुर्गी बिलायती बोल’ के सांचे में भी ढाल दिया है।

सम्मान प्रकट की मुद्राओं की जगह अब अभिवादन की औपचारिकता अनेक घरों में देखी जा रही है। ‘प्रात: काल उठी के रघुनाथा, मात पितु गुरु नावहीं माथा’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने अभिवादन के अर्थ और उसकी महत्ता को जिस भाव से समाज के समक्ष रखा था, उसकी कड़ी से दूर होते जाना आज विस्मयपूर्ण स्थिति है।

कभी ‘साष्टांग’ दंडवत और चरण स्पर्श करने वाले को अपने वरिष्ठ जनों से हार्दिक आशीष प्राप्त होता था, जो उनके जीवन में फलित भी हुआ करता था। आज भौतिक विडंबनाओं में घनीभूत हो रहा हमारा सिद्ध शिष्टाचार खानापुरी से जिस रूप में जुड़ गया है, वह चिंताजनक है। उपाय यही है कि बिखरते और दरकते अभिवादन के प्रकल्पों को गृह पाठशाला से ही पुनर्जीवित किया जाए।

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