ताज़ा खबर
 

बिना पंखों की उड़ान

आओ अपने अंदर अपना अतीत जिंदा करें। इस मधुर विश्वास को जियें कि आज अपनी अंधी दौड़ में विश्व जिसे अपनी महान उपलब्धियां कह कर फूला नहीं समाता, उसे हम अपने सुंदर अतीत में प्राप्त कर नकार चुके हैं।

यह विश्व कयामत की चाल चल जाए, तो भी हमारे अतीत की गरिमा की धूल भी नहीं फांक सकता। (Photo- Indian Express)

सुरेश सेठ
तत्त्ववेत्ता कहते हैं कि अपने अंदर एक शहर ही नहीं, पूरा ब्रह्मांड खुलता महसूस करो। जब से मुल्क के मसीहाओं ने हमारी नौकरी, रोटी और राहत भरे भविष्य की चिंता छोड़ कर हमें ऐसे तत्त्व चिंतन से जीवन जीने का संदेश देना शुरू किया है, हमने भी रुख बदल कर पलायन में राहत तलाश शुरू कर दी है। सुनते आए थे कि ‘रोजी-रोटी दे न सके, वह सरकार निकम्मी है… जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बदलनी है’। आजकल तो बदलने की बात गुनाह है। जिसे देखो वही उम्र भर का सामना करता नजर आता है।

पल की खबर नहीं। इसके बारे में न कोई सोचता है, न कोई महसूस करता है। जो एक बार चुनाव जीत जाता है, उसका सपना अपनी गद्दी पर हमेशा के लिए बैठ जाने का हो जाता है। अचानक उसके अंदर समाज से अधिक परिवार का दायित्व जाग जाता है। जब तक जियें, अपने लिए गद्दी सुरक्षित रखें। उसके बाद बेटे-बेटियां ही नहीं, नाती-पोते भी हमारी जिम्मेदारी हैं। उन्हें लगता है कि यह निर्विवाद सत्य है कि गरीब के बेटे को गरीब और मजदूर के बेटे को मजदूर रहना है। इसी प्रकार राजा के बेटे को राजा और नेता के बेटे को नेता रहना है। अब राजे-रजवाड़े तो रहे नहीं। इसलिए वजीरी के सर्वाहितकार इन घरानों में सुरक्षित रहने चाहिए। हम समाजवाद का जितना चाहे राग अलाप लें, राजाओं के घर कभी रंक पैदा नहीं होते।

राजपथ अगर उनकी अभीष्ट सड़क है, तो इस सड़क को जाने वाली सत्तावन गलियां उनके राजप्रासादनुमा भव्य भवन से ही शुरू होती हैं। देश की एक सौ तीस करोड़ जनता के लिए एक साल का जो बजट सरकार बनाती है, उसके बराबर तो देश के एक फीसद की धन-संपदा है। ऐसे लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी प्रणाम करके उनकी शोभायात्रा निकालना ही उस निन्यानबे फीसद का परम धर्म है। यही वह लोकतंत्र की पहचान है, जिसे इस देश का हर आदमी अपने अंदर पिछली पौन सदी से जीता महसूस कर रहा है। सपनों का एक शहर है, जो नेता लोग अपने घोषणा-पत्रों से, भाषणों से उसके अंदर जिंदा करते हैं। इस शहर में न जाने कितने ‘खुल जा सिम-सिम’ हैं जो उसके अंदर वोट डालने के दिनों में खुल जाते हैं। चार दिन की चांदनी के रूप में न जाने कितने जादुई चिराग हैं जो मीरे-कारवां अपनी शोभायात्राओं से उनके अंदर बांट जाते हैं। लेकिन इसके बाद मंजिल तक ले जाने वाली कोई अंधेरी सुरंग उनके लिए नहीं खुलती। जिंदगी में गड़ा खजाना मिलने की बात उन्हें कैसे कहें, जो पिछली पौन सदी में कूड़े के ढेर भी अपनी जिंदगी से हटा नहीं पाए।

उम्मीद थी कि इन सब दिनों में उनकी जिंदगी में तरक्की के सिंहद्वार खुल जाएंगे, लेकिन वे द्वार किसी भूल-भुलैया में खो गए और रिश्वतखोरी से लेकर दलाली तक को कानूनसम्मत बनाने की मांग होने लगी। जो रास्ते अगली मंजिलों की ओर जाने चाहिए थे, वे अपने अतीत में किसी गरिमा की तलाश करने लगे। देश का इतना गरिमापूर्ण अतीत है जनाब कि आज के सुपरसोनिक जेट विमान हमें अपने अतीत के उड़नखटोले नजर आते हैं, जिनमें देव और दानव समान रूप से विचरण करते थे। आज मौत के हरकारे तुम्हें परमाणु बमों और निर्देशित मिसाइल में नजर आते हैं, लेकिन अतीत के महायुद्धों के वीर योद्धाओं के मंत्रसिद्ध आग्नेय बाणों को कैसे भूल गए? आज इक्कीसवीं सदी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने से क्या होगा?

यह विश्व कयामत की चाल चल जाए, तो भी हमारे अतीत की गरिमा की धूल भी नहीं फांक सकता। आओ अपने अंदर अपना अतीत जिंदा करें। इस मधुर विश्वास को जियें कि आज अपनी अंधी दौड़ में विश्व जिसे अपनी महान उपलब्धियां कह कर फूला नहीं समाता, उसे हम अपने सुंदर अतीत में प्राप्त कर नकार चुके हैं। इसलिए आज महिमा काम की नहीं, ध्यान की करो, रोटी की नहीं, उपवास की करो, शहरों की तरक्की की नहीं, जंगलों में पलायन की करो।

नेता जी ने नए भारत का यह नया संदेश आपको दे दिया, ताकि आप उनको सवालों के कठघरे में न खड़ा कर दें कि आपके सुशासन में भूखों की संख्या, बेकार निहत्थों की कतार क्यों लंबी हो गई! आपको रोटी की जगह उपवास का, काम की जगह ध्यान का संदेश दे दिया है। अब आप शीतलपट्टी बिछा कर शांति से युग बदलने का इंतजार कीजिए। कभी ध्यान भटके तो नेता जी द्वारा रचे हुए सपनों के स्वर्ण मृग के पीछे भाग लीजिए। अब आपको कैसे बताएं कि पकवान खाने की जगह उन्हें खाने की कल्पना अधिक आकर्षक लगती है। विकास की अंधी दौड़ धनिक प्रासादों के लिए छोड़ दीजिए।

हम सर्वश्रेष्ठ हैं, हमारे लिए तो इस कल्पना पर विश्वास करना ही पर्याप्त है कि हम एक ऐसे पंछी हैं जो अपने टूटे हुए पंखों से उस मरुस्थल को पार कर गए जहां मध्यजनों ने अपने नखलिस्तान बना रखे हैं। जहां रिश्वत की थैलियों के आधार पर खड़ी की गई दीवारें एक ऐसे आसमान का निर्माण कर देती हैं कि इसे पार करने के लिए चाहे जितनी संकल्प भरी उड़ान भर लें, गिरना तो उस धरा पर ही है जहां तड़प-तड़प कर मरते लोगों को हमदर्दी के बोल भी नहीं मिलते। हां, राह चलते लोग उनकी रुक कर वीडियो अवश्य बनाने लगते हैं।

Next Stories
1 सफलता की राह
2 आदतों का सफर
3 जल है तो कल है
ये पढ़ा क्या?
X