खेल और खेती का मेल

हम अब तक यही मानते आए हैं कि जिनकी जो समस्या होती है उसके लिए उन्हें ही आवाज बुलंद करनी चाहिए। हो भी वही रहा है। किसान अपनी किसानी के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ रहा है। दुर्भाग्य से हमें इसकी तनिक भी जानकारी नहीं होती कि किस राज्य में कितने किसान मर रहे हैं? क्यों मर रहे हैं? कैसे मर रहे हैं? यह सब हमारे लिए निरर्थक और समय की बर्बादी लगता है।

Farmers Protest, Farm Laws
कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन एक साल पूरे होने के अवसर पर प्रदर्शन करते किसान। (Photo Source- Gurmeet Singh- Indian Express)

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त

देश का स्टेडियम में जीतना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी हरे-भरे खेतों में किसान का जीतना है। क्रिकेट के मैच में एक-एक विकेट बहुत जरूरी होता है, ठीक उसी तरह खेती के लिए हर किसान का अपना महत्त्व होता है। आज देश की भूख मिटाने वाले अनगिनत किसान भुखमरी, लाचारी, कर्ज और अलग-अलग समस्याओं के चलते आत्महत्या करते जा रहे हैं। हमारा जो भी पसंदीदा खिलाड़ी होता है उसके लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह शतक बनाए।

क्या कभी हमने अपने आसपास के या किसी परिचित किसान के लिए भगवान से प्रार्थना की कि वह सौ थैले अनाज उगाए? एकाध घंटा बल्ला पकड़ कर खेलने वाला खिलाड़ी हमारी नजरों में भगवान बन जाता है, लेकिन वहीं जीवन भर पेट की भूख मिटाने वाले किसान इंसान कहलाने के लिए तरस जाते हैं। हां, यह अलग बात है कि चुनावों के समय ये अन्नदाता, देश की रीढ़ जैसे अलंकारों से नवाजे जाते हैं। चुनावों के तुरंत बाद से अगले चुनाव तक उनकी हालत वही ढाक के तीन पात होती है।

यह देख कर कि देश को जीतने के लिए कम गेंदों में ज्यादा रन चाहिए, हममें तनाव पैदा होने लगता है। हम व्याकुल हो उठते हैं। क्या कभी देश को जीवित रखने वाले नदियों, तालाबों, सरोवरों और जल स्रोतों का धीरे-धीरे सूखते जाना हममें वही तनाव पैदा करता है, जो क्रिकेट मैच के दौरान होता है? कभी नहीं। अगर वही तनाव हममें पैदा होता तो देश में गांवों और किसानों की संख्या दिन-ब-दिन कम न होती। अपने पंसदीदा खिलाड़ी को प्रोत्साहित करने के लिए जी-जान एक कर देते हैं। वहीं हमारी भूख मिटाने के लिए जी-जान एक कर देने वाले किसानों को प्रोत्साहित करना तो दूर, उनके बारे में सोचने की जहमत तक नहीं उठाते हैं।

हमें दुनिया भर के स्टेडियमों के पिच की जानकारी होती है। हमें पता होता है कि कौन-सी पिच गेंदबाजी के लिए उपयुक्त है या फिर बल्लेबाजी के लिए। पहले बैटिंग करने पर जीतते हैं या फिर बालिंग करने पर। दुर्भाग्य से हमें अपने गांव की मंडी के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं होती। वह किस हालत में है, उगाई गई फसल का वहां बाजार समर्थन मूल्य क्या है, वह कार्य कैसे करता है और वहां होने वाली धोखाधड़ी के बारे में हमें बिल्कुल जानकारी नहीं होती।

पाकिस्तान टीम को भारत में खेलने की अनुमति देनी चाहिए या नहीं, इस बारे में सिर खपाने लगते हैं, पर क्या कभी सोचा है कि निवाले के दाने स्वेदशी हैं या विदेशी? इसका आयात हुआ है या फिर निर्यात? कभी इसके बारे में सोचने के लिए अपने बेशकीमती समय में से कुछ पल दिए? नहीं न? देंगे भी कैसे? जब तक पीड़ा की अग्नि हृदय को नहीं जलाती, तब तक मस्तिष्क इन सबके बारे में सोचने से दूर भागता है। हम देश के क्रिकेट बोर्ड या फिर टीम द्वारा की गई गलतियों के बारे में बारीकी से समीक्षा करते हैं, लेकिन खेती में कहां चूक हो रही है और इसके लिए दोषी कौन है, उसके बारे में पता लगाने और उसके लिए मुहिम छेड़ने की कोशिश कभी नहीं करते हैं। करे भी क्यों?

हम अब तक यही मानते आए हैं कि जिनकी जो समस्या होती है उसके लिए उन्हें ही आवाज बुलंद करनी चाहिए। हो भी वही रहा है। किसान अपनी किसानी के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ रहा है। दुर्भाग्य से हमें इसकी तनिक भी जानकारी नहीं होती कि किस राज्य में कितने किसान मर रहे हैं? क्यों मर रहे हैं? कैसे मर रहे हैं? यह सब हमारे लिए निरर्थक और समय की बर्बादी लगता है।

क्या कभी समर्थन मूल्य, खाद, पानी और बिजली के लिए लाठी से चोटिल घायल किसानों को देखा है? किस देश का गेंदबाज कैसी गेंदबाजी करता है, किस तरह के करतब दिखाता है, इन सबके बारे में हमें पूरी जानकारी होती है। दुर्भाग्य से बिचौलियों द्वारा किसानों के लूटे जाने के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं होती। किसान किस तरह से छले जा रहे हैं, किस तरह से धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं, इसके बारे में जानने या सुनने की हमारे पास फुर्सत नहीं है।

क्रिकेट कमेंट्री सुनने-देखने के लिए हम टीवी पर आंखें गड़ाए बैठे रहते हैं, कभी किसानों के बारे में हो रही चर्चा को सुनने के लिए समय निकाला है? ग्यारह खिलाड़ियों द्वारा खेले जाने वाले खेल के लिए हम लाखों लोग एक हो जाते हैं। वहीं करोड़ों लोगों की भूख मिटाने वाले किसान के लिए हम क्या कर रहे हैं? कृषि को उत्तम कार्य माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों से वह अधम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। हरे भरे खेतों में किसान को आबाद रखना है, तभी अन्नदाता सुखी कहला सकता है।

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