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जिंदगी के मेले

शहरों के मेलों में एक बनावटीपन है। वहां के फुटपाथ पर, छोटे-छोटे मैदानों में, महलों में या फिर मेलों के लिए विशिष्ट शैली में बनाए गए हाट या बाजार में सुरक्षागार्ड और कैमरों की निगरानी के बीच लगते हैं।

dunia mere aageभारतीय संस्कृति में मेलों की परंपरा रही है। करीब-करीब हर शहर में कोई न कोई मेला लगता है, जो वहां की विरासत को संजोता और प्रकट करता है। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

हेमंत कुमार पारीक

मध्य प्रदेश में बीड के पास हरसूद में बड़ा प्रसिद्ध मेला लगता है सिंगाजी का। दूरदराज से लोग शिरकत करने आते हैं। अब तो यह क्षेत्र डूब क्षेत्र में आ गया है। हरसूद कहीं और बस गया है। मुझे याद है, सिंगाजी का मेला देखने राजस्थान से हमारे एक रिश्तेदार आया करते थे। उनका वहां आने का मुख्य उद्देश्य सिर्फ सिंगाजी महाराज के दर्शन करना होता था। किसी सवारी का इंतजार किए बिना पैदल निकल पड़ते थे। वे मुझे अपने कंधे पर बिठाते और चल पड़ते हरसूद तक। उस समय के साधन थे बैलगाड़ी और साइकिल वगैरह। पर वे कहते, देव-दर्शन के लिए पदयात्रा ही करनी चाहिए। वैसे भी धार्मिक स्थलों पर जाने के लिए ग्रामीण इलाकों में पैदल चलने को लोग प्राथमिकता देते हैं।

मुझे अब भी याद है, टोपी और एक बांसुरी। छोटी-सी धोती और एक कुर्ता। घर आकर सजाते-संवारते। धोती और कुर्ता पहन कर सिर पर टोपी और हाथ में बंसी लिए उस गांव के एकमात्र फोटोग्राफर के स्टूडियो में ले जाते और फोटो निकलवाते थे। सोचता हूं कि जमाना कितना बदल गया है। आज स्मार्टफोन के प्रसार के साथ लगभग हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा होता है। सभी फोटोग्राफर हैं और सेल्फी ले रहे हैं!

बहरहाल, अब वे रिश्तेदार नहीं हैं। सिंगाजी तो है, पर हरसूद अब वहां नहीं है। हरसूद की जगह बदल गई है, पर वहां भरने वाला प्रसिद्ध मेला अब भी जारी है। लेकिन वे मेले कहां गए, पता नहीं। और भी दूसरे, जो नदी किनारे लगते थे, वे सब वक्त की धार में बह गए।

तब माघ-पूस की कंपा देने वाली ठंडी रातों में मेरे गांव के पास नदी किनारे मेलों का सिलसिला शुरू होता था। लेकिन अब वे मेले नजर नहीं आते। शायद नदियों के दायरे की जगहें सबको सहज होती होंगी। नदियों के सूखने से मेलों का समीकरण गड़बड़ा गया है। इधर शहर में इन्हीं दिनों मेले की बातें सुनाई पड़ती हैं, पर तासीर वह नहीं है जो गांव के मेलों में हुआ करती थी।

शहरों के मेलों में एक बनावटीपन है। वहां के फुटपाथ पर, छोटे-छोटे मैदानों में, महलों में या फिर मेलों के लिए विशिष्ट शैली में बनाए गए हाट या बाजार में सुरक्षागार्ड और कैमरों की निगरानी के बीच लगते हैं। पूरी तरह व्यावसायिक! पता नहीं, मेलों का स्वरूप बदल या बिगड़ गया है। लोगों की अलग-अलग पसंद हो सकती है, इसलिए कह नहीं सकते कि किसकी नजर में क्या बन या बिगड़ गया।

मुझे लगता है कि शायद वास्तविक मेलों का दौर खत्म हुआ, जो एकदम खुले आसमान के नीचे कलकल बहती नदी के किनारों पर लोगों के मनोरंजन के लिए लगते थे। कोई बंधन नहीं था। कोई खोजी आंख नहीं थी। दुकानें भी स्थानीय लोगों की हुआ करती थीं। जैसे कि शहरों में एक्सटेंशन काउंटर या विस्तारित खिड़कियां होती हैं। गांव के अंदर भी चलती थी वही दुकान और मेले में भी। लेकिन मेले में उसी दुकान का आकर्षण खास होता था। नदी के घाट पर यहां से वहां तक तंबू ही तंबू दिखते थे, शाम होते ही पेट्रोमैक्स जल उठते थे।

पेट्रोमैक्स के उजाले में बनती जलेबियां, समोसे, कचौड़ी, हलवा-पूरी आदि देख कर मुंह में पानी आ जाता था। लकड़ी और प्लास्टिक के तरह-तरह के खिलौने होते थे, मसलनफिरकी, चखरी, लट्टू, गुब्बारे, बंसी, डमरू और न जाने क्या-क्या। हर चीज खरीदने का मन करता था, पर जेब में तो सिर्फ एक चवन्नी होती थी। फिर भी मेलों का आकर्षण खींचता था। स्कूल से आते ही बस्ता रख दोस्त-यारों के साथ मेले की तरफ दौड़ लगा देते थे। गांव के वे मेले एक ही जगह नहीं ठहरते थे।

एक-दो हफ्ते एक जगह, तो अगले दो हफ्ते किसी दूसरी जगह। रात में मेलों में जाती बैलगाड़ियों का तांता लग जाता था। ठंडी उजियारी रात में घास-फूस से लदी बैलगाड़ियां मंथर गति से चल पड़ती थीं अपने गंतव्य की ओर। ठंडी रात में गाड़ियों के नीचे लटकती लालटेन और बैलों के गले में बजती घंटियां अद्भुत नजारा पेश करती थीं।
गांवों का महत्त्व अब समझ आता है। गांधीजी ने कहा था कि भारत गांवों में बसता है। कभी-कभी अपने गांव का जिक्र चलता है, तो गांव पर लिखी और पढ़ी कविताएं याद आती हैं।

उसके साथ याद आते हैं मेले और नदी। गांव का सुरम्य वातावरण और ठंडी शुद्ध हवा! यहां शहर के मेले देखे हैं। घूम फिर कर लौट आते हैं, पर लगता नहीं कि मेला देखा है। जब कभी शहरों में भरने वाले मेलों का अखबारी विज्ञापन पढ़ता हूं तो कलकल बहती नदी, नाचती हुई मढ़ई, रात में पेट्रोमैक्स के उजाले में रोशन एक छोटा-सा बाजार नजर आता है। अब न बैलगाड़ियां दिखती हैं और न बैलों के गले में बजती घंटियों की मधुर आवाज सुनाई देती है। नदियां सूख गई हैं और वे मेले वक्त की रफ्तार में जाने कहां खो गए!

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