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दायरे में प्रगतिशीलता

हर क्षेत्र में अपना डंका मनवाने वाली स्त्री के लिए क्या जरूरी है कि वह बताए कि वह किसकी पत्नी है? एक सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, इस कहावत को जानने-समझने वाले भी यह नहीं कहते कि मैं फलां का पति हूं।

culture, society, women lifeमहिला और पुरुषों में असमानता समाज की बड़ी बुराई है। (फाइल फोटो)

स्वरांगी साने
कोई लड़की कहीं भी अपना नाम बताती है, तुरंत उससे पूछ लिया जाता है पिता का नाम और बाद में पति का नाम। कहीं आवेदन करना हो तो वहां भी कुछ इसी तरह से छपा होता है ‘डॉटर आफ’ या ‘वाइफ आफ’। लेकिन लड़का होने की यह शर्त नहीं होती। वह किसका बेटा है, यह तो वह लिखता है, लेकिन किसका पति है, यह उल्लेख नहीं होता। स्त्री-पुरुष समानता की व्याख्या ‘नाम’ की इस परिधि से ही गलत हो जाती है और इस ओर किसी का ध्यान भी नहीं जाता। स्नेहा प्रतिभा राजा ने धर्म और जातिविहीन होने का प्रमाण-पत्र वैधानिक तौर पर हासिल करने वाली देश की पहली महिला होने का गौरव पा लिया। लेकिन क्या किसी के मन में नहीं आया कि वह किसी की बेटी या किसी की पत्नी होने के बंधन से भी मुक्त हो जाए?

स्त्रीवादी विचार या स्त्री विमर्श के नारों को सही मानने वाले और उन्हें झूठा करार देने वाले- दोनों ही इस सत्य से आंखें मूंदे बैठे हैं कि स्त्री की पूरी पहचान आज भी उसकी अकेले की अपनी नहीं है। कोई महिला अगर तय कर ले कि उसे पति का नाम नहीं लगाना है तो उसे पिता का नाम लगाना ही पड़ता है और कई बार कानूनी शपथ-पत्र भी देनी पड़ता है कि ‘मेरा नाम यह, वल्द यह’ और ‘मेरा ही नाम यह, पत्नी यह’ है। कानून सबको समान मानते हुए भी कुछ को अधिक समान और कुछ को कुछ कम समान मानता है। इसका यह नायाब उदाहरण है कि स्त्री की अपनी पहचान स्वीकारी नहीं जाती।

कानूनन ही स्वीकारी नहीं जाती हो तो समाज, घर-परिवार और अन्य मोर्चों पर उसकी लड़ाई, उसके सामने खड़े होने वाले सवालों की बिसात ही क्या! कागज-पत्रों पर कई बार घर पत्नी के नाम पर लेने वाले वास्तव में उसे वह अधिकार दे रहे होते हैं या महिला के नाम पर घर होने से ऋण की किश्तें कम देनी पड़ेंगी, इस यथार्थवादी सोच के चलते यह कदम उठाते हैं, पूछा जाना चाहिए। मकान को घर बनाने वाली स्त्री मकान मालकिन नहीं होती, वह सह-मकान मालकिन मतलब ‘को-ओनर’ हो सकती है, पर पूरी मालकिन नहीं। घर में सब्जी कौन-सी बनेगी, जैसी सीधी-सी बात भी उसके हिसाब से नहीं होती। उसकी मर्जी, उसकी सुविधा उस घर में नहीं होती, जिसे वह अपना कहती है।

हर क्षेत्र में अपना डंका मनवाने वाली स्त्री के लिए क्या जरूरी है कि वह बताए कि वह किसकी पत्नी है? एक सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, इस कहावत को जानने-समझने वाले भी यह नहीं कहते कि मैं फलां का पति हूं। किसी का पति कहलाने में अहंकार आड़े आता है और अहंकार तो बुरी बात है! तो क्या यह मान लें कि स्त्री अधिक सजग और अधिक श्रेष्ठ है। लेकिन ऐसा मानना भी पुरुष अहंकार पर चोट पहुंचाता है। पुरुष अहंकार कितना जटिल होता है, इसका एक आसान उदाहरण देखना हो तो आवाजाही से भरी सड़क पर निकल जाइए। कोई महिला एक आम पुरुष की गाड़ी से निकल जाए तो जिससे आगे निकली, वह तुरंत अपनी गाड़ी की रफ्तार बढ़ा कर आगे निकलना चाहता है।

भले ही उसे कोई जल्दी न हो, भले ही वह अब तक एक निश्चित गति से गाड़ी चला रहा हो, लेकिन जैसे ही देखता है कि एक महिला आगे निकल गई, उसके अंदर का पुरुष और उस पुरुष का अहंकार जैसे उसे धिक्कारता है और वह महिला को पीछे करने में लग जाता है।

महिला हमेशा पुरुष के पीछे चलेगी, अनुगामिनी रहेगी, यह भाव इतना कूट-कूट कर भरा होता है कि स्त्री-पुरुष समानता की हिमायत करने वाले भी जब कार्यान्वयन की बारी आती है तो जाने-अनजाने अपना असली चेहरा दिखा देते हैं। महिला आगे तो बढ़े, लेकिन हमसे पीछे रहे। उसका वेतन अच्छा हो, लेकिन हमसे कम हो। वह खूब पढ़े-लिखे, लेकिन शादी करते हुए देखा जाएगा कि होने वाला पति कम से कम उसके जितना पढ़ा-लिखा हो और उससे अधिक पढ़ा-लिखा मिल जाए तो और भी बेहतर। समाज के कई तबकों में लड़कियों की उम्र बढ़ रही है, लेकिन उनके लायक दूल्हा नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि लड़कियां तो पढ़-लिख गईं, पर समाज के लड़के उतने नहीं पढ़ पाए तो अब इन अधिक पढ़ी-लिखी लड़कियों का ब्याह कैसे हो?

हर समाज खुद को अग्रगामी या प्रगतिशील दिखाता है, लेकिन वह प्रगतिशीलता एक खास तरह की प्रगतिशीलता होती है। जैसे किसी गाय को खूंटे से बांध दिया जाए और उससे कहा जाए कि जितनी बड़ी रस्सी हो, वह उतनी दूरी तक घूम सकती है। सारा खेल रस्सी का है कि समाज में लड़कियों को ‘दी जाने वाली’ छूट की यह रस्सी जितनी लंबी या छोटी होगी, उन पर उतने ही कम-ज्यादा बंधन होंगे, पर बंधन तो होंगे ही। बात फिर स्नेहा की करते हैं, जब वे कहती हैं कि बतौर मनुष्य हम सृष्टि की सर्वाधिक विकसित प्रजाति हैं, तो फिर हमें जाति या धर्म की क्या जरूरत? सवाल उससे आगे बढ़ कर है कि अगर महिलाएं भी उसी विकसित प्रजाति का हिस्सा हैं तो उन्हें पिता या पति के नाम के आसरे की क्या जरूरत और क्यों जरूरत? हो सकता है कि सभ्यता के विकास क्रम में इन सवालों पर भी गौर किया जाए।

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