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सभ्यता की साथी किताबें

शैक्षिक संस्थानों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर किताबें उपलब्ध करवाएंगी। पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति का विकास करेंगी। लेकिन अफसोस है कि ऐसा हो नहीं रहा। बेहतर नागरिक बनने-बनाने के बजाय किताबें पढ़ने-पढ़ाने का मकसद परीक्षा की वैतरणी को पार करना हो गया है।

किताबें इंसान के लिए जीवित शिक्षक हैं। (Source: ellen_g_king/Flickr)

अरुण कुमार कैहरबा
आज जब पूरी दुनिया में महामारी फिर से अंधकार फैला रही है। इसके कारण अधिकतर स्कूल बंद कर दिए गए हैं। विभिन्न राज्यों में बोर्ड की परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी हैं या फिर उन्हें स्थगित कर दिया गया है। महामारी का भय, अकेलापन और घर पर रहने की मजबूरी में जो हमारा सबसे सच्चा साथी बन कर ज्ञान के प्रकाश द्वारा अंधेरे को दूर कर सकता है, वे किताबें ही हैं। किताबों के द्वारा हम घर बैठे दुनिया भर की सैर कर सकते हैं। किताबों के अध्ययन के द्वारा हम विचारों और कल्पनाओं के विकास से अपना दायरा व्यापक बना सकते हैं।

‘अंधकार में सूरज बन कर सबको दे उजियारा पुस्तक, जब भी भटकें सही दिशा से बने भोर का तारा पुस्तक।’ किसी कवि की ये पंक्तियां हमारे जीवन में किताबों की अहमियत को बयां करती हैं। किताबें केवल समय काटने का साधन नहीं हैं, बल्कि एक बेहतर सहयोगी, सद्भावनापूर्ण, तर्कशील, विचारशील और ज्ञान आधारित नागरिक समाज के निर्माण में ये महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बढ़ती मारधाड़ और आपाधापी का इलाज अध्ययन संस्कृति के जरिए ही हो सकता है, क्योंकि किताबें मनुष्य की पाशविकता को सोख कर संवेदनशील बनाती हैं। शिक्षा किताबों के संसार से हमारा परिचय कराती है। किताबें हमारी जिज्ञासाओं को शांत करती हैं। हमारी मानसिक और बौद्धिक जरूरतें पूरी करने में इनकी अहम भूमिका है। ये हमें सपना देखने के साथ-साथ प्रश्न पूछना सिखाती हैं। सपनों को साकार करने का रास्ता भी दिखाती हैं और ऊंचाइयों को हासिल करने का आत्मविश्वास देती हैं।

शैक्षिक संस्थानों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर किताबें उपलब्ध करवाएंगी। पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति का विकास करेंगी। लेकिन अफसोस है कि ऐसा हो नहीं रहा। बेहतर नागरिक बनने-बनाने के बजाय किताबें पढ़ने-पढ़ाने का मकसद परीक्षा की वैतरणी को पार करना हो गया है। उद्देश्य की यह संकीर्णता यहीं तक सीमित नहीं रहती, कुंजियों के अध्ययन-अध्यापन और रट्टा-पद्धति में सिमट गई है। अध्यापकों और सुविधाओं की कमी के चलते भी उद्देश्य व्यापक होने के बजाय संकीर्ण होते गए हैं और शिक्षा विद्यार्थियों की सृजनशीलता को पल्लवित-पुष्पित करने के बजाय उसे कुंद करने पर तुल गई है।

विडंबना यह है कि ज्यादातर अध्यापक आमतौर पर पढ़ाई जाने वाली विषय-वस्तु का कामचलाऊ ज्ञान रखते हैं। यही कारण है कि स्कूलों और कॉलेजों में पुस्तकालयों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। खुद किताबें तलाशने और पढ़ने के प्रति कम ही विद्यार्थियों का रुझान होता है और बहुत कम अध्यापक विद्यार्थियों को खुद पढ़ने के लिए प्रेरित कर पाते हैं।

सरकारों द्वारा ‘स्मार्ट सिटी’ की अवधारणाओं को जम कर उछाला जा रहा है। आदर्श गांव-शहर के विविध आयामों पर चर्चा भी होती है। इन्हें नेता अपने भाषणों में मुद्दा भी बनाते हैं, लेकिन पुस्तकालय और किताबें पढ़ने की संस्कृति उनके भाषणों से नदारद रहती है। देश भर में विकास के नाम पर तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं। करोड़ों-अरबों रुपए बहा दिए जाते हैं। उससे कम पैसों से पुस्तकालय बनाए जा सकते हैं। लेकिन यह किसी की प्राथमिकता में नहीं होता है।

मुझे कई बार ऐसा भी लगता है जैसे किताबों और किताबों से होने वाले सशक्तिकरण से हमारे राजनेता भय खाते हैं। शायद इसीलिए बने-बनाए पुस्तकालयों को विकास की भेंट चढ़ा कर खत्म तक कर दिया जाता है। हरियाणा के करनाल में पाश पुस्तकालय को मेडिकल कॉलेज के नाम पर ध्वस्त कर दिया जाना इसी प्रकार का उदाहरण है। जबकि वह पुस्तकालय मेडिकल कॉलेज में भी रखा जा सकता था। गांवों में तो पुस्तकालय खोलने के बारे में सोचा भी नहीं जाता। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कई पंचायतें बहुत ही संपन्न हैं। लेकिन पंचायतें गांव में एक अदद पुस्तकालय खोलने के बारे में नहीं सोचती हैं।

लोग भी न जाने कैसी चीजों में उलझ गए हैं कि मिल कर एक पुस्तकालय खोलने के बारे में नहीं सोचते, जहां से बच्चे और युवा ज्ञान और आनंद के लिए पढ़ने का हुनर सीखें। मूल्यहीनता की स्थिति में इस सारे विकास को हम बेकार होते हुए देख रहे हैं, लेकिन मूल्यों और बेहतर संस्कारों के लिए स्थायी उपाय की तरफ नहीं सोच पा रहे हैं। आज अध्ययन संस्कृति के विकास और पुस्तकालय की अनिवार्यता के विचार को जोर-शोर से उठाए जाने की जरूरत है। समाज में किताबों की अहमियत को लेकर विचार-विमर्श का माहौल बनाया जाना चाहिए। अध्ययन संस्कृति और विचार-विमर्श की संस्कृति का गहरा संबंध है।

किताबें हमारे बीच आएंगी। उन्हें पढ़ा जाएगा तो संवादहीनता और मुद्दाविहीन समाज में मुद्दे केंद्र में आएंगे और उन पर चर्चा भी हो पाएगी। इक्कीसवीं सदी में विकास के दावों और अंधविश्वास, जात-पात, सांप्रदायिकता और भेदभाव की उपस्थिति की सबसे बड़ी वजह किताबों की अनुपस्थिति है। मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रचलन ने भी किताबें पढ़ने का काफी समय ले लिया है। बहुत से बच्चों और युवाओं को इसकी लत भी लग रही है। महामारी के समय में खासतौर से उनमें चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ रहा है।

अनेक प्रकार की मानसिक समस्याओं के मकड़जाल में उलझते बच्चों व युवाओं को इससे निकालने के लिए भी किताबें बेहतर विकल्प हैं। हर गांव में पुस्तकालय और हर विद्यार्थी के हाथ में किताब, उसके अध्ययन और विचार-विमर्श को मुद्दा बनाने की जरूरत है। रंगकर्मी सफदर हाशमी के शब्दों में कहें तो- ‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’

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