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सामूहिकता का विवेक

बृजमोहन आचार्य अपने देश की संस्कृति के बारे में कहा जाता है कि यहां वसुधैव कुटुंबकम की भावना एकदम गहरे तक पैठी हुई है। यही कारण है कि आज भी देश में कई परिवार संयुक्त रूप से रह रहे हैं और एक-दूसरे की हर स्थिति और कठिनाई में काम आते हैं। हालांकि वर्तमान में युवा […]

नोएडा के श्मशान घाट में कोविड -19 पीड़िता का अंतिम संस्कार करते स्वास्थ्य कार्यकर्ता और परिवार के सदस्य। (PTI फोटो)

बृजमोहन आचार्य
अपने देश की संस्कृति के बारे में कहा जाता है कि यहां वसुधैव कुटुंबकम की भावना एकदम गहरे तक पैठी हुई है। यही कारण है कि आज भी देश में कई परिवार संयुक्त रूप से रह रहे हैं और एक-दूसरे की हर स्थिति और कठिनाई में काम आते हैं। हालांकि वर्तमान में युवा पीढ़ी ने कुछ हद तक पाश्चात्य संस्कृति को पसंद करना शुरू कर दिया है, क्योंकि उसके हाथों में स्मार्टफोन है और वह एकल रहने की प्रवृत्ति देख रहा है। हालांकि उसके बाद भी वह वसुधैव कुटुंबकम की भावना से मुंह नहीं मोड़ना चाहता है। वह स्कूल और कॉलेज के ग्रीष्मावकाश के दौरान अपनी नानी के घर जाना चाहता है और दादा के कंधों पर बैठ कर शहर की सैर करना उसे पसंद है। लेकिन पढ़ाई का बोझ उसे इन सभी से दूर करने के लिए आमादा है। पिछले दिनों कई ऐसी खबरें देखा और यह सोचने को मजबूर हो गया कि अपने देश में भलाई की नदी कितनी प्रवाहित हो रही है और हर कोई इसमें डुबकी लगा कर अपने आपको स्वच्छ और निर्मल करना चाहता है।

हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए, जिसमें किसी व्यक्ति ने अस्पताल में जगह दिलाने में किसी मरीज की मदद की, तो किसी ने ऑक्सीजन मुहैया कराने के लिए पूरा जोर लगा दिया। ऐसे भी मामले देखे गए जिसमें अगर महामारी से किसी व्यक्ति की मौत हो गई और परिजनों या पड़ोसियों ने अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया तो दूसरे धर्म या वर्ग के लोगों ने आगे बढ़ कर मृतक के धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार कराया। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि सब कुछ तकनीकी होती इस दुनिया में भी समाज का मूल तत्त्व और उसकी संवेदना अभी बची हुई है। आधुनिक तकनीकी इसी पर हमला कर रही है। हालांकि संवेदना से बचे हुए बहुत सारे लोग इसी तकनीकी का सहारा लेकर एक दूसरे की मदद भी कर रहे हैं।

अगर देश में किसी भी व्यक्ति के मन और दिमाग में सहायता की भावना न होती तो पिछले वर्ष हुई पूर्णबंदी के दौरान कोरोना से कम और भुखमरी से कितने ही लोगों की जान चली जाती। कई दानदाताओं ने मुश्किल में पड़े मजदूर वर्ग के लिए खाने और उन्हें उनके गांवों तक पहुंचाने के लिए वाहनों तक की व्यवस्था कर दी थी। यह सही है कि सरकारी स्तर पर भी कुछ व्यवस्थाएं की गई थीं, लेकिन इस तरह की व्यवस्था एक सीमा तक ही होती है। आम लोगों के बीच से खड़े हुए दानदाताओं ने हर आदमी की मदद कर यह जता दिया था कि भारत में कुछ लोग भूखे उठते जरूर हैं, लेकिन भूखे सोते नहीं हैं।

सहायता करने की भावना कहीं किसी किताब को पढ़ने और धारावाहिक देखने से नहीं आती है। यह भावना हमारे मनोविज्ञान में समाई हुई है, जिसकी बुनियाद हमारे परिवार और समाज के आस-पड़ोस से पड़ती है। इसलिए जब घर में नवजात पैदा होता है तो उसे उसके परिवार के सदस्य मानवीय संस्कारों की घुट्टी पिलाते हैं, ताकि उसका असर उसके जीवन भर रहे। जिस संस्कृति में माता-पिता दोनों नौकरीपेशा होते हैं तो उसमें बच्चे की देखभाल और उसके भीतर संवेदनात्मक विकास के लिए जरूरी और पर्याप्त व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

हालांकि यह व्यवस्था आज हमारे देश में भी जोर पकड़ रही है, उसके बाद भी ऐेसे तमाम परिवार हैं जिसमें बच्चे को दादा-दादी और नाना-नानी ही संभाल कर बड़ा करते हैं। इसके अलावा, सार्वजनिक वाहनों में महिलाओं की सीट पर बैठे पुरुषों की शिकायतें आम हैं, लेकिन ऐसे भी उदाहरण आए दिन देखने को मिल जाएंगे जिसमें अगर कोई महिला बस या रेलगाड़ी में खड़ी-खड़ी सफर करती है तो उसे सम्मानपूर्वक कोई पुरुष यात्री अपनी सीट देकर उसे बैठाता है।

गर्मी के इस मौसम में आज बहुत सारे घरों की मुंडेर पर पक्षियों के लिए पानी का पालसिया रखा हुआ दिख जाएगा और पशुओं के लिए भी कहीं न कहीं पर भोजन डाला जाता है। मेरे शहर में आज भी कुछ खास मौकों पर श्वानों के लिए हलवा बनाया जाता है और पक्षियों को प्रतिदिन चुगा-दाना डाला जा रहा है। ये सभी पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और उसके साथ नत्थी मनोविज्ञान की बदौलत ही किए जा रहे हैं। कोई बच्चा जो काम अपने घर में देखता है और उसे सीखता है तो वह उसे बड़ा होने पर अपनाता भी है। इसलिए कहा भी जाता है कि बच्चों को संस्कार दिए बिना सुविधाएं देना पतन का कारण भी है।

इस पतन को रोकने के लिए भी घर में मां अपने लाड़ले को समाज में कुछ अच्छा करने का ज्ञान देती है। किसी दार्शनिक ने कहा भी है कि दुनिया की हर चीज कुछ न कुछ कीमत देकर खरीदी जा सकती है। कुछ चीजें डरा-धमका कर तो कुछ चीजें छीन कर, लेकिन व्यक्ति का मानस वह पक्ष है जो न तो दौलत से खरीद सकते हैं और नहीं डरा धमका कर। यह सिर्फ माता-पिता और परिजन से मिल पाता है। बच्चे को क्या सिखा कर कैसा बनाना है, क्या सीखने से उसे बचाना है, उसके सोचने-समझने और विवेक का ढांचा कैसा बनाना है, यह बच्चों के माता-पिता पर काफी हद तक निर्भर करता है।

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