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वंचना के घेरे में

हमारे पितृसत्तात्मक समाज का ढांचा ही ऐसा बुना हुआ है कि स्त्री को अधिकतर मामलों में फैसले लेने का हक नहीं है। फिर चाहे वह देह से जुड़ा हो या जायदाद से। जब कोई स्त्री गर्भधारण करती है या अंतरंग संबंध बनाती है तो वह अपने शरीर की उपयुक्तता के बारे में नहीं सोचती। बल्कि परिवार, समाज की परंपरा और पति की इच्छा का ध्यान रखती है।

महिलाओं के प्रति हिंसा सभ्य समाज में एक कलंक की तरह है।

सरस्वती रमेश
कुछ समय पहले इलाहाबाद में हुई घटना है। मेरे पड़ोस की एक महिला की मौत गर्भावस्था के दौरान पैदा हुई दिक्कतों के कारण हो गई। महिला के माता-पिता और दो बेटियां बहुत दुखी थीं, मगर सभी के लिए यह महज गर्भावस्था के दौरान हुआ हादसा था। उनका ऐसा मानना इसलिए था कि हमारे देश में स्त्रियों के साथ ऐसा अक्सर होता है। मगर मेरी नजर में यह महज हादसा नहीं था। यह स्त्री की देह पर उसका अपना अधिकार न होने का दुखद पक्ष भी था। वह एक पढ़ी-लिखी लड़की थी। सरकारी नौकरी कर रही थी। दो बेटियों की मां थी। मगर पति और ससुराल वालों की ओर से बेटे के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा था। बेटे की चाह में उस महिला ने सात बार गर्भधारण किया, मगर हर बार कुछ हफ्तों या महीनों में उसके गर्भ में कुछ कमी आ जाती। इस बार भी यही हुआ था, मगर आठवें महीने में। महिला के शरीर में खून की पहले ही कमी थी। इससे पहले कि ऑपरेशन कर बच्चे को बाहर निकाला जाता, महिला की सांसें थम चुकी थीं।

यह सिर्फ किसी एक महिला की त्रासद, मगर सच्ची कहानी नहीं है। हमारे देश में हर तीसरी औरत इस त्रासदी का शिकार है। औरतों को अपनी मर्जी से गर्भधारण करने, उसे हटाने या फिर संबंध बनाने की स्वतंत्रता नहीं है। यहां तक कि नसबंदी, खतना और कौमार्य परीक्षण जैसे मसलों पर भी उनकी इच्छा पूछना जरूरी नहीं समझा जाता। इन स्थितियों की पुष्टि करते हुए संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यानी यूएनएफपीए ने अपनी एक रिपोर्ट ‘माई बॉडी इज माई ओन’ में शीर्षक से जारी की है। इस रिपोर्ट में सत्तावन देशों की महिलाओं पर होने वाले यौन हमलों का जिक्र किया गया है। इन देशों की आधा से ज्यादा महिलाओं को अपने शरीर से जुड़े मामलों में फैसले लेने का अधिकार नहीं है। मेरे पड़ोस की वह महिला ऐसे ही अधिकारों से वंचित महिला का उदाहरण है।

उसकी मौत की खबर मिलने पर मेरे जेहन में पहला प्रश्न यही कौंधा था कि आखिर किस मजबूरी में उसने आठ बार गर्भधारण धारण करने का जोखिम उठाया होगा! क्या हर गिरते गर्भ ने उसे अपने शरीर को लेकर अपना फैसला खुद करने के लिए चेतावनी नहीं दी होगी? मगर अफसोस कि उस महिला को अपने शरीर को लेकर किए जाने वाले फैसले लेने का भी अधिकार नहीं था शायद, जिसकी परिणति सबसे अधिक उसकी दो मासूम बेटियों को भुगतनी पड़ेगी।

दरसअल, हमारे पितृसत्तात्मक समाज का ढांचा ही ऐसा बुना हुआ है कि स्त्री को अधिकतर मामलों में फैसले लेने का हक नहीं है। फिर चाहे वह देह से जुड़ा हो या जायदाद से। जब कोई स्त्री गर्भधारण करती है या अंतरंग संबंध बनाती है तो वह अपने शरीर की उपयुक्तता के बारे में नहीं सोचती। बल्कि परिवार, समाज की परंपरा और पति की इच्छा का ध्यान रखती है। ऑपरेशन से प्रसव यानी बच्चा पैदा होने के बाद डॉक्टर अगले गर्भधारण में कम से कम तीन वर्ष का अंतराल रखने की सलाह देते हैं, मगर महिलाएं इन बातों को लेकर अधिक गंभीर नजर नहीं आतीं।

ग्रामीण इलाकों में कम उम्र में ब्याही गई लड़कियां भी शादी के कुछ महीने बाद ही गर्भवती हो जाती हैं। न तो उनका परिवार और न ही वे खुद अपनी कच्ची देह के बारे में सोचती हैं। बच्चों को अब भी ‘ईश्वर का प्रसाद’ माना जाता है और गर्भ ठहरने को ‘ईश्वर की इच्छा’। परंपरा के नाम पर स्त्रियों के साथ हुई तमाम ज्यादतियों का एक लंबा इतिहास है। एक स्त्री जब गर्भधारण करती है तो उसमें शारीरिक बदलावों के साथ ढेरों मानसिक उथल-पुथल भी होते हैं। वह गर्भावस्था के दौरान कई तरह की परेशानियों और तनाव से लड़ती है। क्या ऐसे संवेदनशील समय में अपने शरीर से जुड़े फैसले उसे खुद लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए? सिर्फ गर्भावस्था के दौरान ही क्यों, जब देह स्त्री की, तो अधिकार किसी और का कैसे हो सकता है?

हकीकत तो यह है कि समाज के लोकतांत्रिक होने की तमाम दुहाई के बावजूद लड़की विवाहित हो या अविवाहित, आज भी उसे खुद के बारे में निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। अधिकतर परिवारों में जब तक लड़की का विवाह नहीं हुआ रहता है, तब तक उसके माता-पिता उससे जुड़ा हर फैसला करते हैं। फिर शादी के बाद उसके पति या ससुराल वाले। सच यह है कि एक विवाहित स्त्री को तो अपनी सुविधा के अनुसार कपड़े पहनने का भी अधिकार अब तक नहीं मिल पाया है। परिवार की परंपरा और सम्मान के लिए पढ़ी-लिखी अपने पैरों पर खड़ी स्त्रियों को घूंघट करा दिया जाता है, गोदना गुदवा दिया जाता है और पांव-पांव भर कर पैरों में छागल पहना दिया जाता है।

कुछ स्त्रियां गहनों से दबने और घूंघट में अपनी प्रतिष्ठा समझती हैं। ऐसे में विचार और व्यक्तित्व के विकास जैसे बाकी प्रश्न बेमानी ही लगते हैं। किसी भी आजाद देश और समाज के लिए यह स्थिति विचारणीय है। परंपरा व्यवहार में व्यक्ति की गरिमा को मजबूत करने के लिए होनी चाहिए। इंसानी समाज हर अगले दौर में ज्यादा सभ्य होने का दावा करता रहा है। तो इसी के मुताबिक समाज के सबसे अहम हिस्से के तौर पर स्त्रियों के अधिकार भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए।

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