उमंग भरा मन

चाणक्य प्रतिभावान तो थे, लेकिन सुंदर नहीं। एक बार चंद्रगुप्त ने उनसे मजाक किया, ‘महामंत्री जी कितना अच्छा होता कि आप प्रतिभावान होने के साथ-साथ सुंदर भी होते?’ प्रत्युत्तर चाणक्य के स्थान पर महारानी ने दिया। बोलीं, ‘महाराज, रूप तो मात्र मृगतृष्णा है। किसी भी व्यक्ति का सम्मान उसके रूप के नहीं, प्रतिभा के कारण किया जाता है।’

पूनम पांडे

हम किसी न किसी तरह अपने आप को उत्साहित रखें, तो मन आनंदित रहता है। ऐसा ही मन जीवन को शानदार बनाता है। कबीर तो इसी मंत्र पर चलते रहे कि अपने कल्याण के लिए दूसरे की गुलामी न करनी पड़े। इसीलिए वे सदा सरल ही रहे। मगर कबीर की सरलता से जलने वाले बहुत थे। एक ऐसा ही सिरफिरा उनको मौका देख तंग करता रहता था। एक दिन जिद करके वह कबीर को जुआरियों के अड्डे पर ले गया। कबीर वहां का माहौल देख कर ठिठक गए और तुरंत लौट चले। पर वह सिरफिरा कहां बाज आने वाला था। बोला, ‘अरे, आप तो संत हैं, आप पर इन लोगों का क्या असर!’ कबीर ने शांत भाव से कहा, ‘मान्यवर, बुराई को आंख भर कर देखना और सुनना भी बुराई की पैरवी करना है।’

सरलता हर इंसान की ताकत ही साबित होती है, बंधन नहीं। कर्मनिष्ठ हों और धीरज हमारा संबल बने, तो चुनौतियां सरल हो जाती हैं। जब बुद्ध विश्व भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे, तब अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गांव में पहुंचे। घूमते-घूमते बुद्ध को बहुत प्यास लग आई थी। उन्होंने अपने एक शिष्य को पानी लाने को कहा। वह शिष्य नदी पर पहुंचा, जहां बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे और कुछ नहा रहे थे। नदी का जल बहुत गंदा दिख रहा था। शिष्य को लगा कि गुरुजी के लिए ऐसा गंदा जल ले जाना उचित नहीं होगा। वह वापस आ गया। पर बुद्ध को तो बहुत प्यास लगी थी, उन्होंने दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा। कुछ समय बाद वह शिष्य पानी लेकर वापस आ गया।

बुद्ध ने उस शिष्य से पूछा कि नदी का जल तो गंदा था, फिर तुम स्वच्छ जल कैसे ले आए? शिष्य ने कहा, प्रभु! वहां नदी का जल वास्तव में गंदा था, पर लोगों के जाने के बाद मैंने कुछ देर प्रतीक्षा की और कुछ समय बाद मिट्टी नीचे बैठ गई। बुद्ध यह सुन कर प्रसन्न हुए और अन्य शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा जीवन भी जल की तरह है। जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं, तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुख और समस्या आती है, जिससे जीवनरूपी जल गंदा लगने लगता है।

जीवन में तभी तक उलझाव है जब तक समझ विकसित नहीं हो जाती। यह समझ एक ऐसा दर्पण बन जाती है कि वहां किसी का काम ही उसका सच्चा परिचय होता है। चाणक्य प्रतिभावान तो थे, लेकिन सुंदर नहीं। एक बार चंद्रगुप्त ने उनसे मजाक किया, ‘महामंत्री जी कितना अच्छा होता कि आप प्रतिभावान होने के साथ-साथ सुंदर भी होते?’ प्रत्युत्तर चाणक्य के स्थान पर महारानी ने दिया। बोलीं, ‘महाराज, रूप तो मात्र मृगतृष्णा है। किसी भी व्यक्ति का सम्मान उसके रूप के नहीं, प्रतिभा के कारण किया जाता है।’

‘महारानी, आप तो रूप की प्रतिमूर्ति हैं। क्या कोई ऐसा भी उदाहरण है कि गुण के आगे रूप का कोई महत्त्व न हो?’ चंद्रगुप्त ने पूछा। जवाब चाणक्य ने दिया, ‘महाराज, ऐसे तो अनेक उदाहरण हैं। लीजिए आप पहले शीतल जल पीजिए।’ चाणक्य ने चंद्रगुप्त की ओर दो गिलास क्रमश: बढ़ा दिए। फिर उसने पूछा, ‘महाराज, आपको किस गिलास का पानी अच्छा लगा? पहले वाला स्वर्ण कलश का पानी था और दूसरे गिलास में मिट्टी के मटके का।’ चंद्रगुप्त बोले, ‘मुझे तो मिट्टी के मटके का पानी शीतल और सुस्वादु लगा।’

महारानी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘महाराज, महामंत्री जी ने बुद्धि कौशल से आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया है। स्वर्णनिर्मित कलश देखने में तो सुंदर लगता है, लेकिन उसका जल मिट्टी के मटके जैसा शीतल और सुस्वादु नहीं होता। अब आप ही निर्णय करें कि सुंदरता और गुण में से कौन बड़ा है?’ जिस मनुष्य में जागरूकता होगी, उसका पूरा व्यक्तित्व ही अखंडता की मूरत हो जाता है। वह कभी किसी मोड़ या पगडंडी पर लड़खड़ा कर नहीं गिर सकता। सतर्क रहने वाला सबसे सीखता है।

एक निराश और परेशान युवक मनोवैज्ञानिक सलाहकार के पास गया। बोला, ‘मैं सबकी नजरों में बिलकुल निकम्मा और बेकार हो गया हूं, किसी काम का नहीं रहा।’ सलाहकार ने मुस्करा कर कहा, ‘इतनी जल्दी अपने बारे में फैसला मत करो। कल सुबह मेरे पास आओ। तब तक कोई तीन बेकार, बेकाम की चीजों का पता लगा कर बताना।’ युवक अगले दिन आया और सलाहकार को बताया कि ‘गोबर, कुत्ता और झाड़ी किसी काम के नहीं।’

सलाहकार ने मुस्कराते हुए कहा, ‘मेरे दोस्त, गोबर से उपले बनते हैं, खाद बनती है, गोबर गैस बनती है। कुत्ता मनुष्य का सबसे वफादार दोस्त है। घर और खेतों की रखवाली करता है। झाड़ी फसल के लिए बाड़ बनाने के काम आती है, सूख गई तो ईंधन भी है।’ युवक यह सुन कर हैरान रह गया। उसने कहा, ‘यानी मैं भी किसी का दोस्त बन सकता हूं। उसे सुरक्षा दे सकता हूं।’ नवयुवक का आत्मविश्वास जाग गया।

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