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खंडित सपनों का बोझ

अब विश्राम का नाम ही श्रम हो गया है। इसी विश्राम के साथ तरक्कियां मिल जाती हैं। उपलब्धियों के चांद-सितारे छू लेते हैं और फिर अपने आप को एक नया सूरज घोषित करते देर ही कितनी लगती है। अभी सूचना मिली है कि एक नया विभाग सरकार ने खोल दिया है। निर्माण में मरम्मत की संभावनाएं ढूंढ़ने का विभाग।

सुरेश सेठ
हम आज तक समझ नहीं पाए कि अपना देश कब तक यों ही लेटे हुए चलने का अभ्यास करता रहेगा। यहां लोग ‘आराम हराम है’ कह कर आराम फरमाते और बैठे-बैठे कुछ ऐसे भाषण दागते हैं कि जैसे अभी बिना दूसरों की मदद से आकाश में अपना उपग्रह प्रक्षेपित कर लेंगे। कभी वक्त था जब हम किसी बड़े आदमी का उपग्रह बन कर सफलता के आकाश में प्रक्षेपित होना चाहते थे। लेकिन लोगों ने देखते ही देखते अपने आकाश रच लिए और उस पर खुद ही प्रक्षेपित होकर युग बदलने का इंतजार करने लगे।

अब विश्राम का नाम ही श्रम हो गया है। इसी विश्राम के साथ तरक्कियां मिल जाती हैं। उपलब्धियों के चांद-सितारे छू लेते हैं और फिर अपने आप को एक नया सूरज घोषित करते देर ही कितनी लगती है। अभी सूचना मिली है कि एक नया विभाग सरकार ने खोल दिया है। निर्माण में मरम्मत की संभावनाएं ढूंढ़ने का विभाग। किफायत के नाम पर सरकार ने इस विभाग पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए हैं, लेकिन मरम्मत की कहीं जरूरत ही नहीं पड़ी। कहीं निर्माण होता तो मरम्मत की संभावना पैदा होती। अधूरी योजनाओं से क्या निर्माण होते हैं। एक फ्लाईओवर बनने में वर्षों लग गए, फिर कोई नई रूप-रेखा बन गई। तब उसी फ्लाईओवर का कोई सुधरा हुआ रूप बनने लगा। न निर्माण पूरा हुआ, न मरम्मत की जरूरत पड़ी और मरम्मत विभाग बैठे ठाले उन भ्रष्ट लोगों की किस्मत को रो रहा है जिन्होंने परियोजना पूरा नहीं होने दिया। पूरा हो जाता तो उनके लिए कुछ मरम्मत का काम भी मिल जाता। अब भला बताइए निरी सूखी आय में किस राष्ट्रभक्त का गुजारा होता है।

लेकिन बंधु अपने यहां क्रांति नहीं होती, क्रांति के पुराने नारे ठुस्स होते हैं, नए नारे गढ़े जाते हैं। अधूरी सड़कें, अधूरे पुल और अधर में रुक गए फ्लाईओवर देश का बदलता हुआ चेहरा पर्यटकों के सामने पेश करते हैं। लेकिन उन्हें न समझाइएगा कि यह चेहरा ज्यों का त्यों कई वर्षों से यहीं खड़ा है। मंडियों में कभी तेजी आई नहीं, और अब यहां मंदी के नजारे भी पेश आने लगे। तरक्की के सूचकांक उछले भी नहीं, और अपनी निष्क्रियता पर देश शर्मिंदा नजर आने लगा।

लेकिन यहां अपनी शून्य कारगुजारी पर कोई शर्मिंदा नहीं होता। उसके लिए विपक्ष को दोषी बता दिया जाता है। हर बात का जवाब उनके पास है। आपका काम नहीं हुआ? आपका हर मंसूबा अधूरा रह गया? आपके उपक्रमों का नफा, नुकसान में बदल गया? दुनिया बदल देने, समाज के कायाकल्प के वादे हुए, लेकिन यह क्या किया? जब काम करने चले तो घपलों-घोटालों के साथ उन्होंने उनकी हत्या कर दी। लेकिन इन बातों से आजकल कोई चौंकता नहीं। आज जो कुर्सी पर बैठे हैं, उनके विरुद्ध घपलों-घोटालों के आरोप हवा में तैरते हैं, तो परेशानी क्या? सीधा जवाब हाजिर है, तनिक अपना युग याद कर लीजिए। विपक्षियो, जब आपका युग था, तो आपने इससे भी बड़े-बड़े घोटाले किए थे। एक की भी हवा नहीं लगने दी थी।

हवा लग गई तो तुरंत जांच कमीशन के ठंडे बस्ते स्थापित कर दिए। आपका युग गया, हमारा युग आ गया। यह जांच सुरसा की आंत की तरह बढ़ती और मुंह की तरह खुलती ही चली गई। विवश होकर किसी रिपोर्ट पर कार्रवाई करनी पड़ी, तो भ्रष्ट नेता अपने को आरोपित कह कर हाथी पर सवार होकर जेल गए।

बंधु, आरोपित होना कोई अपराध नहीं होता। मुकदमा चलना कोई अपमान नहीं होता, बल्कि हमने तो कानून प्रक्रिया का सामना करके इस देश की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है। अब अदालतों में तारीख पर तारीख का मकड़जाल हमारी सहायता करेगा। हम अपनी बीमारी की खबरें प्रसारित करके लोगों का दिल जीतेंगे। चुनाव आएगा तो फिर उसे लड़ कर क्रांति निनाद करेंगे, जीत गए तो क्रांतिवीर कहलाएंगे। समाज को बदलने की एक और परिकल्पना प्रस्तुत कर देंगे। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि कभी आरोप अपराध सिद्ध हो जाएं। ये जेल चले गए तो भी चिंता क्या? पैरोल मिलने का रास्ता खुला है। ये पैरोल पर कुछ दिन बाहर आते हैं, फिर अपने बिखरते संकट को खड़ा कर जाते हैं। जनता को अपने परिवार की नई पीढ़ी के खड़ा होने का संदेश दे जाते हैं। जानते तो हो, यहां हर चीज परंपरा से ही सही होती है।

जब परंपरा पानी में दूध मिलाने की है, तो हम उसे तोड़ कर क्यों अपने अतीत की गरिमा का हनन करें? यहां तो ऐसी हर परंपरा अनुकरणीय है, जो भाषण वीरों के हक में जाती है। अब जब किसान का बेटा किसान, गरीब का बेटा और भी गरीब है तो नेता का बेटा नेता और मंत्री का बेटा मंत्री क्यों न बने? इसीलिए भ्रष्टाचारी नेता अपराधी घोषित हो जाए, दंडित हो दंड भुगतने चला जाए, तो भी अंतर नहीं पड़ेगा। जेल की कोठरी में से भी बाहुबलि अपना कारोबार चलाते हैं। राजनीति तो जनसेवा के नाम पर वंश सेना हो गई। कारोबार चलता रहेगा। कुछ ढीला हुआ तो पैरोल पर बाहर आकर उसके बखिए दुरुस्त कर देंगे। अब आम आदमी का रोना क्यों रोने लगे? उसका तो काम ही है हमारे जलसों में शामिल हो ताली बजाना, हमारे जुलूसों में शामिल हो जिंदाबाद के नारे लगाना और बिना चूके अपने खंडित सपनों का बोझ ढोते रहना।

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