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किताबों का कोना

‘धारा को किताबों से कितना प्यार है? शायद थोड़ा ज्यादा ही’। यह पंक्ति टीवी पर दिखाए जाने वाले फेसबुक के एक विज्ञापन का हिस्सा है।

Liberaryसांकेतिक फोटो।

‘धारा को किताबों से कितना प्यार है? शायद थोड़ा ज्यादा ही’। यह पंक्ति टीवी पर दिखाए जाने वाले फेसबुक के एक विज्ञापन का हिस्सा है। शायद धारा का किताबों से यही लगाव उसे चलंत पुस्तकालय यानी मोबाइल लाइब्रेरी खोलने की ताकत देता है। इस प्रचार ने मुझे बारह साल के एक बच्चे की याद ताजा कर दी, जो करीब तीन दशक से ज्यादा पुरानी है।

उस बच्चे का नाम कुछ भी हो सकता है। यहां सुविधा के लिए हम उसका नाम बंटी मान लेते हैं। वह बच्चा बिहार राज्य के एक कस्बानुमा शहर सासाराम में रहता था। उसे भी किताबों से थोड़ा ज्यादा लगाव था, लगभग धारा की तरह। मगर वह अपने घर के आर्थिक हालात के चलते एक महीने में सौ रुपए की भी किताब नहीं खरीद पाता था। उस शहर में बच्चों के लायक किताबों का कोई पुस्तकालय भी नहीं था।

यों देश में आज भी बच्चों की रुचि के अनुरूप किताबों के पुस्तकालय का घोर अभाव है। खैर, किताबों के प्रति लगाव ने उस बच्चे के मन में एक उपाय को जन्म दिया। जैसे धारा को एक नया विचार सूझा। बच्चे के पड़ोस में परचून की एक छोटी दुकान थी। दुकान के मालिक बच्चे को बहुत मानते थे। उस बारह साल के लड़के ने दुकान मालिक से आग्रह किया कि आप अपनी दुकान के एक कोने में थोड़ी जगह मुझे दीजिए, ताकि मैं किताबों का एक पुस्तकालय खोल सकूं।

बच्चे की इस बात पर दुकान के मालिक ने अपनी सहमति दे दी। इस तरह बच्चे ने अपने पास रखी किताबों से एक पुस्तकालय खोल लिया। वह पचास पैसे प्रति किताब के हिसाब से बच्चों को किताब किराए पर देने लगा और इकट्ठा हुए सारे पैसे से वह हर महीने ढेरों किताबें खरीदने लगा। नए किताबों को पढ़ कर वह फिर इसे पुस्तकालय में रख देता, ताकि अन्य बच्चे इस पढ़ सकें। इस तरह यह सिलसिला चल पड़ा और बच्चे को पढ़ने के लिए किताबों की कमी नहीं हुई।

दरअसल, किसी एक के भीतर किताबों को पढ़ने का शौक दूसरे को भी पढ़ने की आदत डालता है। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक फोटो खूब प्रसारित हुआ, जिसमें चेन्नई में बाल काटने की दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति ने अपनी दुकान में किताबों का एक पुस्तकालय खोल रखा है। जो भी व्यक्ति उससे बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने के लिए अपनी बारी का इतंजार करता था, वह उन्हें किताब पढ़ने के लिए जरूर कहता।

इस तरह लोगों को अपनी बारी का इतंजार करने में कोई मानसिक परेशानी नहीं होती या वक्त काटना बोझ नहीं लगता था। यों आज के दौर में जब बच्चों में पढ़ने की आदत कम हो रही है और नतीजतन उनमें तार्किकता का अभाव दिखने लगा है, ऐसे वक्त में बच्चों के लिए पुस्तकालय का होना जरूरी हो जाता है। मोबाइल फोन किताब का विकल्प नहीं हो सकता है। लंबे समय में आॅनलाइन पाठ में किसी की रुचि का कायम रह पाना मुश्किल होता है। सेहत संबंधी अन्य दिक्कतें पैदा होती हैं, वह अलग।

बचपन में पढ़ी उस पंक्ति की सार्थकता आज ज्यादा दिखने लगी है, जिसमें यह बताया गया था कि ‘किताबों से अच्छा कोई साथी नहीं होता है’। खासतौर पर जब वर्तमान समय में एक महामारी का संक्रमण तेजी से दुनिया को अपने चपेट में ले रहा है। इस परिस्थिति में कई तरह के उतार-चढ़ाव का सामना करते लोग मानसिक अवसाद से ज्यादा ग्रस्त हो रहे हैं।

महामारी से बचाव के लिए जो नियम-कायदे जारी किए गए हैं, उसमें अवसाद से बचाव के लिए सबसे जरूरी जरिया भी दूर गया है। यानी लोगों से मेलजोल, उनसे अपनी बातें साझा करना और खुद को खुद ही ठीक करना। ऐसे में किताबें अकेला सहारा साबित हो सकती हैं। दरअसल, किताबें मानसिक खुराक देती हैं और सेहत को भी सुधारती हैं।

कई विकसित देशों, मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि के अस्पताल में पुस्तकालय में ढेर सारी किताबें रखने का इतिहास पुराना है। ऐसा देखा गया है कि किताबों ने मरीजों को मानसिक ऊर्जा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। मानसिक ऊर्जा से कई अन्य रोग भी जल्द ठीक होते हैं। हमें हिंदी फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ में यह देखने को मिलता है कि कैसे मुन्नाभाई की ‘जादू की झप्पी’ और उसके कई अन्य ‘मनोरंजक तरीके’ मरीजों को ठीक करते हैं। जब इस देश में ‘मुन्ना’ जैसे लोगों की कमी है, तब किताबें ही इस तरह के मरीजों का सहारा साबित हो सकती हैं, जिन्हें दवाइयों के साथ-साथ अन्य दूसरे तरीकों से उपचार की जरूरत हैं।

पहले चरण के कोरोना संकट काल में एक खबर यह भी पढ़ने को मिली थी कि गाजियाबाद के एक एकांतवास केंद्र पर जब मरीजों में भय और भ्रम का जाल तेजी से फैलने लगा और मरीजों के बीच आपस में झगड़े होने लगे, तब जिला प्रशासन ने वहां मरीजों के बीच किताबें वितरित कीं और इसका परिणाम सकारात्मक सामने आया।

निश्चय ही अच्छी किताबें जीवन जीने का होसला देती हैं और यह भी बताती हैं कि कैसे विषम परिस्थिति का मुकाबला किया जाता है। इस संदर्भ में महाश्वेता देवी की कविता ‘आ गए तुम?’ की याद आती है, जिसकी अंतिम पंक्ति में वे लिखती हैं कि ‘सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना!’ यों सोशल मीडिया का एक सूत्र ‘दिल खोल के तो देखो, दुनिया तुम्हारे साथ हैं’ जीने की एक नई ऊर्जा देता है।

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