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अपना गिरेबां

मेरे घर के अहाते के सामने एक सरकारी नल लगा हुआ है। मैं अक्सर देखती हूं कि एक दूध बेचने वाला व्यक्ति उस नल से पानी लेकर अपने दूध के बर्तन में मिलाता है।

Adulterationसांकेतिक फोटो।

संगीता सहाय

मेरे घर के अहाते के सामने एक सरकारी नल लगा हुआ है। मैं अक्सर देखती हूं कि एक दूध बेचने वाला व्यक्ति उस नल से पानी लेकर अपने दूध के बर्तन में मिलाता है। एक दिन जब मैंने उसे टोका तो उसने सहजता से कहा कि हम दूध में पानी नहीं मिलाएंगे तो हमारा काम कैसे चलेगा। इस महंगाई में खर्च चलाने के लिए यह सब करना मजबूरी है।

फिर हर ओर सभी तो यही कर रहे हैं। उसकी बेलाग बातों ने मुझे निरुत्तर कर दिया। सही मैंने उसे उसके किए का आईना दिखाया, लेकिन उसके सवाल का दायरा सचमुच बड़ा था। हम गौर से देखें तो पएंंगे कि समाज के लगभग हर वर्ग ने पैसे कमाने के लिए अलग-अलग तरीके से इन्हीं तौर-तरीकों को अपना लिया है।

जिसे जहां जितना हाथ लग रहा है, समेटने में लगा है। ‘ये सही है और ये गलत’ जैसे फलसफे बीते जमाने की चीज हो गई है। गली, मुहल्लों, गांव, शहर हर तरफ इसी की फ्रिक है कि कौन, कितना कमा रहा है। हजार से लाख, लाख से करोड़, करोड़ से अरब और उससे भी आगे जितना बढ़ा जा सके। इसका कहीं कोई जिक्र नहीं होता कि पैसे किन राहों से होकर आ रहे हैं। और तमाम छोटे-बड़े धनकुबेरों ने इनकी प्राप्ति के लिए क्या-क्या किया है।

मतलब सिर्फ साध्य से होता जा रहा है और उसके लिए लगभग कोई भी साधन स्वीकार्य है। एक दौर था जब व्यक्ति दूसरे के गुणों से प्रभावित होकर उसके जैसा बनने की कोशिश करता था। जबकि आज ज्यादातर लोग यह देखते हैं कि किसी व्यक्ति ने अपने उन गुणों से कितना रसूख और कितना पैसा हासिल किया है।

यानी आज इंसान के गुण और योग्यता पर पैसा हावी हो चुका है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से आज गलत तरीके से पैसे कमाने या भ्रष्टाचार की बातें करना असंगत-सा होता जा रहा है। कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे भ्रष्टाचार का समाजीकरण होने के साथ-साथ यह सर्वग्राह्य भी बन चुका है। करीब-करीब हर स्तर पर लोग इसे जीवन का अंग मान चुके हैं। कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार हमारे देश में अनवरत रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक प्रक्रिया बन चुकी है। मुट्ठी भर निष्ठावान लोगों को छोड़ कर सभी किसी न किसी रूप में इसी प्रक्रिया में लगे हैं।

बावजूद इसके जीवन के हर क्षेत्र को घुन की तरह खाते इस व्यापक समस्या पर जब बात होती है तो हर व्यक्ति अपने गिरेबां में नहीं झांक कर दूसरी दिशा में अंगुली उठा देता है। अपने दसों नख भ्रष्टाचार के नाले में डुबोए बैठा आदमी भी मौका मिलते ही सहजता से सदाचार और नैतिकता की बात करने लगता है और अपने किए को जीवन की जरूरत की संज्ञा दे देता है। भ्रष्टाचार का जिक्र होने पर नेताओं और मंत्रियो को कोस कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेना भी हमारी आदत बन चुकी है।

गौरतलब है, कि क्या सवा करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश में महज कुछ सौ जनप्रतिनिधियों या कुछ हजार नेताओं आदि के भ्रष्ट होने ही से पूरा राष्ट्र इस मकड़जाल में उलझ गया है? सोचने की जरूरत है कि इन नेताओं को चुनता कौन है! निश्चित रूप से तमाम भ्रष्ट लोगों को, चाहे वे सांसद और विधायक हों, मंत्री हों, सरकारी ओहदेदार हों, व्यवसायी या ठेकेदार हों या आम आदमी, सभी हमारे इसी समाज की पैदाइश हैं।

और इसी ने उनके भ्रष्ट होने की ग्रंथियों को खाद-पानी देकर उन्हें पल्लवित-पुष्पित किया है। घरों में परिवार के बड़े सदस्यों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को देखते, सुनते और सीखते हुए बच्चे जवान होते हैं। सामान्यतया उनके आचार, व्यवहार का आधार उनका परिवार और आसपास का परिवेश ही होता है।

उनके पिता या अन्य लोग अगर गलत आचरण करते हैं, नियम-कानून को ताख पर रख कर अपने अधिकार का नाजायज फायदा उठाते हैं और अपनी शक्ति और सत्ता का प्रयोग अपना घर भरने में लगाते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनका बच्चा वही सीखता है और बड़ा होकर उन्हीं राहो पर चलता है। ऐसे में उसका एक बेहतर इंसान बनना कैसे संभव है? फिर कैसे उस समाज से एक आदर्श और गुणवान कार्यकर्ता या नेता आदि के उपजने की कल्पना की जा सकती है?

देश की परिस्थितियां बदले, देश का पैसा, उसके संसाधन, नियम-कानून सभी के जीवन की आवश्यकता को पूरी करने वाला बन सके, सरकारी व्यवस्था शोषक न बन् ाकर परिवर्तनकारी कार्य करे, इसके लिए एक सशक्त कानून के साथ-साथ सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि हर व्यक्ति सर्वप्रथम खुद को परखे और तोले।

वह तात्कालिक क्षुद्र हितों से ऊपर उठ कर समाज और देश के हित पर विचार करे। जापान और चीन जैसे देशों की निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का उदाहरण खबर बनने के साथ-साथ हमारे जीवन में भी उतारने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के कर्ता के साथ-साथ उसके कारण, उसके होने के वजह को ढूंढ़ना और देखना होगा। निष्ठा और सदाशयता के संदर्भों को व्यापक और समग्र बनाने की जरूरत है। साथ ही व्यवस्था बदले, इसके लिए परिवर्तन की शुरुआत प्रत्येक घर और प्रत्येक व्यक्ति से होनी चाहिए।

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