ताज़ा खबर
 

रंगों से अनुराग

बचपन में रंगों में डूब कर होली मनाने का आनंद ही कुछ और था। अब हम बड़े हो गए हैं, इसलिए वह लड़कपन नहीं रहा। लेकिन हृदय के किसी कोने में बचपन अभी भी बरकरार है। इसलिए बचपन जैसी मस्ती नहीं करते, लेकिन बच्चों की मस्ती देखकर मगन हो जाते हैं।

Dunia mere aage, Holi, Mathuraमथुरा में लट्ठमार होली का आनंद लेते श्रद्धालु। (फोटो- पीटीआई)

गिरीश पंकज
होली जब-जब पास आती है, मैं खो जाता हूं अतीत की मधुर स्मृतियों में। पिछले दिनों सोचने लगा कि ये रंग क्या हैं? कहने को वे लाल, हरे, नीले, पीले और होते हैं, लेकिन मेरा अपना मानना है कि हर रंग में उत्साह के गवाक्ष हैं। इनमें उमंग है, तरंग है। रंग तो रंग हैं। बहिरंग हो या अंतरंग, अगर उसके साथ हमारा रागात्मक रिश्ता बन गया, तो जीवन रंगीन हो जाता है। अगर रंगों से हमने परहेज किया, तो जीवन बेरंग हो जाता है। बेनूर हो जाता है। इसलिए हमें रंगों के साथ जीने की आदत डालनी चाहिए। होली के पर्व पर जब रंग-गुलाल उड़ते हैं तो ऐसा लगता है दसों दिशाएं रंगशाला बन गई हैं।

लगता है आकाश में इंद्रधनुष बिखर गया है। प्रसन्नता के साथ पिचकारी चलाते बच्चे जब दिखते हैं, तो महसूस होता है, यही तो है जीवन। तमाम चिंताओं से दूर जीवन को भरपूर तरीके से जीने का समय। यह अलग बात है कि रंगों की आड़ में कुछ लोग नफरत और अलगाव का बदरंग मलने की कोशिश करते हैं। लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर वे लोग हैं, जो रंगों को जीने की कोशिश करते हैं। एक दूसरे को रंग कर अपने जीवन में उमंग का संचार करते हैं। दरअसल, फागुन का त्योहार यही संदेश देता है कि जीवन को रसरंग से परिपूरित करना है। हो सकता है कि जीवन में बहुत-सी परेशानियां और बाधाएं हों, लेकिन वे सारी बाधाएं कुछ समय के लिए रंगों के साथ जैसे तिरोहित हो जाती हैं। रंग हमें फिर से नवीन कर देते हैं। रंग हमें नीरस से सरस बना देते हैं। रंग के साथ खील बताशे, भांग और ठंडाई आदि हमारे जीवन में एक अलग किस्म के आनंद की सर्जना करते हैं।

बचपन में रंगों में डूब कर होली मनाने का आनंद ही कुछ और था। अब हम बड़े हो गए हैं, इसलिए वह लड़कपन नहीं रहा। लेकिन हृदय के किसी कोने में बचपन अभी भी बरकरार है। इसलिए बचपन जैसी मस्ती नहीं करते, लेकिन बच्चों की मस्ती देखकर मगन हो जाते हैं। यही मस्त होना ही प्रकारांतर से बचपन को जीना है। रंग के संग और उमंग के साथ जीवन को जीने के आदी हो जाएं तो हर दिन फागुन और हर रात दिवाली हो जाए। लेकिन तनाव में डूबा हुआ मनुष्य त्योहारों को भी ठीक से जी नहीं पाता। तथाकथित रूप से बड़े पदों पर विराजमान लोग त्योहारों पर भी मुस्कुराने से परहेज करते हैं।

ये एक तरह के अभिशप्त लोग हैं, जो समाज में रहते हुए भी असामाजिक बने रहते हैं। उनके तथाकथित पद उन्हें सहज-सरल मनुष्य नहीं होने देते। ये लोग आम लोगों से मिल कर न होली खेलते हैं, न दिवाली मनाते हैं। इनकी अपनी एक कथित सीमा रेखा है, जिसके भीतर रह कर ये थोड़ी-बहुत खुशी जरूर मना लेते हैं, लेकिन व्यापक समाज से कट कर अपने आप को आभिजात्य वर्ग का बताने की हल्की कोशिश में लगे रहते हैं।

रंग न तो छुआछूत मानते हैं, न जात-पात देखते हैं। न धर्म या मजहब के लफड़े में पड़ते हैं। ये जिसके हाथों में पहुंच जाते हैं, उसके हो जाते हैं। फिर चाहे वह केसरिया रंग हो, हरा रंग हो या गुलाबी। जो भी रंग हो, वह हमारे अंतस को इंद्रधनुषी कर देता है। इसीलिए जैसे ही मैं रंग देखता हूं, उसके संग हो जाता हूं और कवि मन कह उठता है- ‘रंग संग खेलेंगे प्यार से जरा/ कह दो, यह कह दो संसार से जरा/ रंग नहीं जानते हैं जात-धर्म को/ रंग नहीं मानते हैं छूत-कर्म को/ यारी तुम कर लो त्योहार से जरा/ रंग संग खेलेंगे प्यार से जरा।’ फागुन के त्योहार को लेकर क्या हिंदी और क्या उर्दू या अन्य कई भारतीय भाषाएंङ्घ इनके कवियों ने बेहद सहज सरल कविताएं लिखीं। नजीर बनारसी की तो मशहूर पंक्तियां ही हैं- ‘फिर देख बहारें होली की’। इसलिए जब-जब होली आती है, हमें होली के साथ हो लेना चाहिए और अपने अंतस के सारे कलुष को धो लेना चाहिए।

होली खेलने के एक दिन पहले जब होलिका दहन होता है, तो वह भी एक बड़ा प्रतीक है। अब यह होली के एक अहम हिस्से के तौर पर इस त्योहार में शामिल हो चुका है। होलिका दहन के दूसरे दिन फाग की धूम मचती है। यह धूम अच्छाई की जीत की खुशी में मचती है। लोग एक दूसरे से गले मिलकर बधाई देते हैं और अनजाने में ही यह संकल्प भी लेते हैं कि हमें जहां तक संभव हो सके, अपने आसपास सद्भाव के रंग बिखेरने हैं। इंसानियत की जड़ों को मजबूत करना है।

जैसा प्यार और मेलजोल का संदेश यह त्योहार लेकर आता है, उसे ज्यादा से ज्यादा फैला सकें। खासतौर पर दुनिया में जिस तरह एक समुदाय को दूसरे समुदाय से दूर करने की कोशिशें चल रही हैं, ऐसे में हमें रंगों के इस त्योहार के जरिए अपने आसपास जीवन और इंसानियत से मुहब्बत रंग से लबरेज बाग को जीवन देना है। हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाते हैं कि तमाम तरह के रंग धर्मनिरपेक्ष हैं। इनका धर्म सिर्फ प्रसन्नता बांटना है। यही फाग का राग है। इसी राग से हम जुड़े रहेंगे, तो रंगों से हमारा अनुराग बना रहेगा और हमारे भीतर मनुष्यता भी जीवित रहेगी।

Next Stories
1 गम, गुड़िया और साथी
2 इंद्रधनुषी सौंदर्य
3 नेपथ्य में छिपी प्रतिभाएं
ये पढ़ा क्या?
X