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धैर्य के अभाव में

सब्र नाम की चीज खत्म हो गई है। अगर स्कूल में कोई बच्चा एक सवाल को दो-तीन बार पूछ लेता है तो शिक्षक के सब्र का बांध टूट जाता है। वह उसे या तो बुद्धू करार कर देता है या समस्यात्मक बालक। लेकिन शिक्षक खुद भी इसके लिए कम दोषी नहीं।

धैर्य बड़ी चीज है। यह जितना होगा, जीवन उतना ही निर्मल होगा। (फोटो- सोर्स- फ्रीपिक)

धैर्य की परीक्षा आपत्तिकाल में ही नहीं होती, उसकी परीक्षा हर उस क्षण में होती है, जब आप कोई कठिन निर्णय ले रहे होते हैं। लेकिन लगता है कि हमारा समाज एक धैर्यविहीन समाज में तब्दील होता जा रहा है। चारों ओर एक अजीब-सी आपाधापी का वातावरण है। लगातार आगे निकलने की होड़ है, चाहे वह येन-केन-प्रकारेण हो। हर कोई अपने नौनिहाल को सबसे आगे देखना चाहता है। शायद इसी मन:स्थिति ने व्यग्रता का सृजन चहुंओर कर दिया है। सब्र नाम की चीज खत्म हो गई है। अगर स्कूल में कोई बच्चा एक सवाल को दो-तीन बार पूछ लेता है तो शिक्षक के सब्र का बांध टूट जाता है। वह उसे या तो बुद्धू करार कर देता है या समस्यात्मक बालक। लेकिन शिक्षक खुद भी इसके लिए कम दोषी नहीं। पिछले दिनों इस धैर्यहीनता का अनुभव बहुत शिद्दत से हुआ। शिक्षकों की काउंसलिंग के दौरान वाजिब हक के लिए ही नहीं, गैरवाजिब हक के लिए भी जब शिक्षक अपना संयम और झूठे सच्चे दावे करते नजर आए तो अफसोस हुआ। लेकिन यह मात्र इस वर्ग की दिक्कत नहीं है, बल्कि हमारे चारों ओर का परिदृश्य ही कुछ ऐसा बनता चला जा रहा है।

जाहिर है, शिक्षा व्यवस्था इसके लिए ज्यादा दोषी है, क्योंकि मूल्यों की नींव रखने का मूल दायित्व माता-पिता के बाद पाठशाला पर ही होता है, लेकिन जब उसके पाठ ही विकृत हों या उन पर बेचैनी और हताशा की आड़ी-तिरछी लकीरें खिंची हों, तो समाज में धीरज शब्द की तलाश व्यर्थ है। चोट की आवाज तो बहुत सुनी जाती है जीवन में, लेकिन एक समय ऐसा आता है कि हथौड़े टूट जाते हैं और निहाई सुरक्षित बनी रहती है। ऐसी निहाई बने रहने की क्षमता समाज में कितने लोगों में बची है? आज स्कूलों से नैतिक शिक्षा के पाठ गायब हो चुके हैं। कई जगह तो शिक्षक खुद चीखते-चिल्लाते और आपसी खींचतान में फंसे दिखाई पड़ते हैं। क्रिकेट का खेल, जो कभी ‘जेंटलमैन’ गेम माना जाता था वहां खिलाड़ियों के चीखने-चिल्लाने के दृश्य आम हैं। खेल के नए रणनीतिकार इसे आक्रामकता कह कर सराहते नहीं अघाते।

ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक कप्तान ने बुशर्ट उतार कर खुशी का इजहार किया था और एक विश्वकप फुटबॉल मैच के दौरान एक खिलाड़ी ने विपक्षी खिलाड़ी का कान ही चबा लिया था। टेनिस में रैकेट फेंक देने की एक खिलाड़ी की शैली आज भी सामान्य मानी जाती है। कबीर लिख गए- ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय…’। लेकिन धीरे चलना कौन चाहता है। सबको आगे निकलने की जल्दी है। यातायात नियमों का उल्लंघन करने से आधे से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। कई बार बेवजह तेजी से आगे निकलना ही इसका कारण सिद्ध हुआ है, लेकिन रुके कौन, ठहरे कौन? शेख सादी ने कहा है कि ‘धीरज रखो, आसान होने से पहले सभी चीजें मुश्किल होती हैं।’ लेकिन हम मुश्किलों का सामना करने का अभ्यास खो चुके हैं।

माता-पिता बच्चों की सफलता के लिए व्यग्र हैं। उन्हें रोजमर्रा की छोटी मोटी विफलताओं के लिए कोसते हैं। नतीजतन, एक प्रकार की बेचैनी-सी व्याप्त हो रही है उनके आचरण में। इस कारण मनोविकार बढ़ रहे हैं। परीक्षा में एक प्रतिशत भी अंक कम आ जाएं या परीक्षाएं एक माह आगे खिसक जाएं तो बच्चों का मिजाज एक सप्ताह तक ठीक नहीं होता। ऐसी नई पीढ़ी का निर्माण हम कर रहे हैं। यही नहीं, राजनेताओं के बड़बोले बयानों को देखिए। सत्ता को लोभ उनसे क्या नहीं कहलवा देता। चरित्रहनन से लेकर महापुरुषों तक पर बेजा टिप्पणी करने से वे बाज नहीं आते। सदन में बेलगाम बोल और हाथापाई के दृश्य तो हम कई बार देख चुके हैं।

जब समाज के नेतृत्वकर्ता ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो आम जनता को दोष देना बेकार है। लगता है आम जन का भी तंत्र पर विश्वास खत्म होता जा रहा है। जिस तरह से समाज में अनैतिक और भ्रष्टाचारी लोग आगे बढ़ रहे हैं, जनता में एक किस्म की कुंठा और झुंझलाहट व्याप्त होती जा रही है जो उसे धैर्यहीनता की ओर धकेल रही है। इसके लिए न केवल हमें अपनी जीवनशैली, बल्कि सार्वजनिक कार्य पद्धति को सुधारना होगा। तभी एक शांतिपूर्ण और विवेकशील समाज का गठन करना होगा। सोशल मीडिया भी समाज के इस हालात के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। बिना धीरज रखे किसी मसले पर अपनी कथित विद्वता परोस देना और उस पर आपत्ति जताने या सवाल उठाने वालों को सहन नहीं करना। यह किस तरह का विवेक विकसित हुआ है? तुरंत प्रतिक्रिया देना और उस पर टिप्पणी की आकांक्षा ने भी मनुष्य के अंदर की यश, लालसा और केंद्र में रहने की प्रवृत्ति को और पुष्ट किया है।

एक तरह की जल्दबाजी न केवल हमारे व्यवहार में दिखती है, बल्कि शब्द चयन और भाषा में भी। दुनिया के विकसित देश इस बीमारी से ग्रस्त हैं। लेकिन हमारा देश कहीं ज्यादा प्रभावित है। हो सकता है इसके पीछे रोजगार का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं का खस्ता हाल और महंगाई जैसी अनिश्चितताएं भी मूल में हों और यही असुरक्षाबोध हमारे नागरिकों में धैर्यशीलता और सहन शक्ति को क्षीण कर रहा हो।

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