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अच्छे दिनों की आस

संपत सरल सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ते हुए भाजपा ने जुमला उछाला- ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ और मतदाता ने भरोसा करके अपना अमूल्य मत उसे सौंप दिया। अब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने एक वर्ष हो गए। अच्छे दिनों की आस में मतदाता की दशा उस यात्री जैसी है जो टिकट खरीद कर उमस […]

Author Updated: May 25, 2015 2:07 PM

संपत सरल

सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ते हुए भाजपा ने जुमला उछाला- ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ और मतदाता ने भरोसा करके अपना अमूल्य मत उसे सौंप दिया। अब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने एक वर्ष हो गए। अच्छे दिनों की आस में मतदाता की दशा उस यात्री जैसी है जो टिकट खरीद कर उमस भरे वातावरण में, गंदे प्लेटफार्म पर उन अखबारों को बिछा कर बैठा है, जिन पर अच्छे दिन आने के मोहक विज्ञापन छपे हैं और जिसके कान विलंबित होती जा रही गाड़ी के आगमन की सूचना सुनने को उद्घोषणा वाले भोंपू की ओर लगे हैं। गाड़ी नहीं आ रही है। वह पूछताछ खिड़की पर जाता है, तो ऊंघता-सा बाबू उसे आश्वस्त करता है कि आएगी, एक न एक दिन ट्रेन जरूर आएगी। सरकार के यहां देर भले हो, अंधेर नहीं है। यात्री किंकर्तव्यविमूढ़ कुछ तय नहीं कर पाता।

बड़ी ऊहापोह है। जिस भारतीय ने कभी अच्छे दिन देखे नहीं, वह जानता भी नहीं कि अच्छे दिन होते कैसे हैं! ठोस, द्रव, गैस किस आकार-निराकार के होते हैं अच्छे दिन! अच्छे दिन बोतलबंद मिलेंगे, पैकेट में मिलेंगे या अच्छे दिनों का कोई ताबीज होता है! सवा अरब लोगों का देश है भारत। आखिर सवा अरब अच्छे दिन तैयार करना कोई हंसी-खेल तो है नहीं। सभी नागरिक के लिए अच्छे दिनों की दस-पांच ग्राम की पुड़िया बांधी जाए, तो पांच बरस पक्के लगें! फिर सरकार यह भी तो चाहती है कि अच्छे दिन भले ही सस्ते और टिकाऊ न हों, पर सुंदर अवश्य हों। भूमंडलीकरण के शुभागमन से अनपढ़ और गरीब भारतीय भी कड़ाही और फ्राइपैन का आकर्षणभेद ताड़ता है। भारतीयों को स्वदेशी के हीनताबोध से उबारने के लिए आयातित अच्छे दिन अपरिहार्य हैं। इसी मिशन को लेकर ही तो हमारे प्रधानमंत्रीजी को देश से अधिक विदेश की दौड़-धूप करनी पड़ रही है।

अच्छे दिन आने में देर होते देख कर मतदाता पछतावा भी कर रहा है। दरअसल, उतावले मतदाता ने जुमले की पड़ताल नहीं की। सोचा, अब दिल्ली कितनी दूर है! इधर शक्तिमान की सरकार बनी और उधर मेरे अच्छे दिन शुरू! अच्छे दिन होंगे भी इतने अच्छे कि मैं मेहनत के नाम पर योगासन किया करूंगा और वक्त काटने के लिए शॉपिंग! पानी तक को तरस रही नदियों में दूध-दही-घी की बाढ़ आ जाएगी! रोटी गूगल से डाउनलोड की जा सकेगी।

अच्छे दिन शुरू होते ही राजनेता संन्यास ले लेंगे और संन्यासी राजनीति में आना बंद कर देंगे। पाकिस्तान सुधर जाएगा, चीन सिर्फ हमसे ही माल खरीदेगा और अमेरिका अपने हाथ बांधे रात-दिन भारत के दरवाजे पर खड़ा रहेगा। दुनिया के तमाम आतंकवादी नैतिक शिक्षा लेने के लिए भारत के आगे गिड़गिड़ाएंगे। नतीजतन, भारतीय नैतिक शिक्षण संस्थानों में दाखिले की मारामारी मच जाएगी। अच्छे दिनों का ‘श्रीगणेश’ होते ही भारत भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाएगा। देशभर में घोर ईमानदारी छा जाएगी। अपराध शून्य हो जाएगा। पुलिस थानों में कला की प्रदर्शनी लगेगी और अदालतों में फाइन आर्ट की। भारत में फिर से ह्वेनसांग काल लौट आएगा। ‘ताला’ सिर्फ शब्दकोशों में रह जाएगा और वे सारे शब्दकोश ताले में बंद कर दिए जाएंगे, जो अलीगढ़ में बना अंतिम ताला होगा। मतदाता ने सपना संजो लिया था कि अच्छे दिन आने पर मुझे त्रितापों से स्थायी मुक्ति मिल जाएगी। मैं घर में भी बराती बन कर रहूंगा। मैं बिस्तर पर उसी अदा से विश्रामरत रहूंगा जैसे शेष-शय्या पर विष्णु-लक्ष्मी रहते हैं।

मैं समाचार चैनल अदल-बदल कर खोज रहा था कि शायद कहीं से अच्छे दिन आने की अफवाह ही मिले। संभव है कि अच्छे दिन देश की आर्थिक राजधानी में आ गए हों, क्योंकि कोई भी नया उत्पाद सबसे पहले मुंबई में उतारा जाता है। बरसों पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी भारतीयों के लिए अच्छे दिनों की शुरुआत मुंबई से ही की थी। इस बीच पड़ोसी वर्माजी झल्लाते हुए आए। बोले- ‘घंटे भर को सपरिवार बाजार को क्या गए, चोरों ने घर साफ कर दिया। क्या ये ही हैं वे अच्छे दिन?’ मैंने उन्हें सांत्वना दी- ‘वर्माजी, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ ऐसा कहने वालों ने यह थोड़े ही कहा था कि अच्छे दिन सिर्फ साहूकारों के आने वाले हैं। सरकार का एक लक्ष्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ भी तो है।’ हताश वर्माजी घर जाकर चोरी गए सामान की सूची बनाने में लग गए और मैं विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की खूबियों में खो गया कि मुद्दों पर लड़े जाने वाले चुनाव नारों पर लड़े जाने लगे और अब जुमलों पर उतर आए। क्या अभी और अच्छे दिन आने शेष हैं?

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