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आस्था की दीवार

प्रेमपाल शर्मा तिरुपति शहर को ‘भगवान तिरुमाला तिरुपति बालाजी’ के नाम से ज्यादा जाना जाता है। कुछ समय पहले सरकारी ड्यूटी की मजबूरी में मुझे भी वहां पहुंचना था। देश की सर्वोच्च संस्था के नुमाइंदों को बालाजी के दर्शन करने थे। इसमें अधिकतर उत्तर भारत के जनप्रतिनिधि थे जिन्हें उनके बाबाओं, ज्योतिषियों, पंडितों, धार्मिक आस्थाओं, […]

Author April 23, 2015 10:15 PM

प्रेमपाल शर्मा

तिरुपति शहर को ‘भगवान तिरुमाला तिरुपति बालाजी’ के नाम से ज्यादा जाना जाता है। कुछ समय पहले सरकारी ड्यूटी की मजबूरी में मुझे भी वहां पहुंचना था। देश की सर्वोच्च संस्था के नुमाइंदों को बालाजी के दर्शन करने थे। इसमें अधिकतर उत्तर भारत के जनप्रतिनिधि थे जिन्हें उनके बाबाओं, ज्योतिषियों, पंडितों, धार्मिक आस्थाओं, परंपराओं ने यह बताया था कि पहली बार बैकुंठ एकादशी और नववर्ष एक साथ पड़ रहे हैं और इस मुहूर्त में अगर बालाजी भगवान के दर्शन हो जाएं तो स्वर्ग की टिकट पक्की। आश्चर्य यह कि मेरे साथी अधिकारियों की भी वैसी ही भाषा थी। रात्रि के एक बजे दर्शन के लिए हम बालाजी मंदिर के प्रांगण में मौजूद थे। सभी अपने धवल धुले और कुछ राजसी कुर्ता-धोती, शॉल में लिपटे। मुझे छोड़ कर, जिसे पता ही नहीं था कि मंदिर में इसी वेशभूषा में आप जा सकते हैं। धुली पैंट-शर्ट में क्यों नहीं? उन्होंने जवाब दिया कि यहां की यही परंपरा और नियम है।

वीआइपी जमावड़ा भी कोई कम नहीं था। पता लगा कि लगभग छब्बीस सौ वीआइपी कार्ड जारी हुए हैं और इकतीस दिसंबर या पहली जनवरी को तिरुपति जाने वाली किसी भी फ्लाइट में कोई जगह नहीं है। एक सूचना यह भी मिली कि लगभग सौ और जनप्रतिनिधि अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ दर्शन की लाइन में लगे हुए हैं। लेकिन इनके बगल में ही लोहे के सींखचों के पीछे दो-तीन किलोमीटर तक साधारण जनसमुदाय की लाइन लगी हुई थी। ठसाठस भरे हुए, जैसे दड़बों में मुर्गे। पता लगा कि आज के दर्शन के लिए इन्हें बीस से चालीस घंटे तक का इंतजार करना पड़ता है। बालाजी के दर्शन की भूख में इन्हें हर कष्ट मंजूर। लाइन में लगे-लगे मंदिर की तरफ से जो भी व्यवस्था हो जाए खिचड़ी, पानी, टायलेट आदि। मन में विचार आता है कि वीआइपी दनादन आगे बढ़े चले जा रहे हैं तो क्या इन्हें क्रोध या गुस्सा नहीं आता कि यह कैसा देश है जिसमें इतनी ऊंच-नीच और गैर-बराबरी है! धर्म के प्रांगण में और उसके बाहर भी नहीं आता? काश, इन वीआइपी के बरक्स अपने साथ इतना भेदभाव और असमानता को देख कर ये साधारण लोग कभी यहां न आने का निर्णय ले पाते! लेकिन उन्हें इस धर्म ने बार-बार यही सिखाया है कि इस जन्म की नहीं, बैकुंठ की चिंता करो।

यही वह उत्तर है कि इस देश में इतने भूखे, नंगों के बावजूद क्रांति क्यों नहीं हुई। कुछ दिनों पहले ऐसा ही अनुभव उज्जैन के महाकाल मंदिर में हुआ। सुंदर-सी टोकरी में फूलों की डलिया लिए नंगे पांव भक्तों की सैकड़ों की लाइनें सर्दियों के बावजूद। हमारा वीआइपी काफिला वहां भी ऐसे ही मुंह चिढ़ाता हुआ गुजरा था। नौकरशाही के अनुभवों से मैं कह सकता हूं कि हममें से ज्यादातर ऐसे ही विशेष सुविधाओं के आदी हो चुके हैं। लेकिन संविधान में समानता की बातों के बावजूद व्यवस्था ने ऐसी जुगत बिठाई है कि इस देश में सब कुछ हो, बस समानता न हो। अस्पताल, संसद, स्कूल, कॉलेज यहां तक कि सड़कों पर भी, जहां पैदल चलने वाले या साइकिल वालों के लिए और अपाहिजों तक के लिए कोई गुंजाइश नहीं।

खैर, वीआइपी का काफिला बढ़ते-बढ़ते भगवान के सामने पहुंच गया । लेकिन आंख उठा कर देखा भर था कि एक धक्के में वापस। सभी के साथ ऐसा वहां के कारिंदे कर रहे थे, क्योंकि दर्शन में एक-दो सेकेंड से ज्यादा लगेंगे तो इतनी बड़ी भीड़ इस मुहूर्त में स्वर्ग कैसे जा पाएगी! भक्तों के एक से एक नजारे। कोई प्रांगण के खंभे को चूम रहा है तो कोई जमीन पर लोट कर दंडवत मुद्रा में, कोई घंटी बजाने को उछलता तो किसी की आंखों में दर्शन करने के आंंसू।

मंदिर में प्रवेश करने का क्षण भूले नहीं भूलता। एक के बाद एक नंगे बदन धरती पर लुढ़कते हुए वे दर्शन कर रहे थे। यह त्याग और कष्ट स्वर्ग जाने के लालच के चलते। जिन्होंने अपने हाथ से कभी गिलास उठा कर पानी न पिया हो, वे बैकुंठ की इच्छा में जो कर रहे हैं, वह शायद इसी धर्म में संभव है। दानपात्र का एक और नजारा। मेरे सामने चल रहे दंपति ने अपनी जेब से पैसे निकाले, अपनी गरदन से सोने की चैन उतारी और जब तक मैं समझ पाता, उन्होंने एक बड़े दानपात्र में डाल दी। बताते हैं कि दुनिया का सबसे अमीर मंदिर है यह इसलिए। रोजाना आने वाले भक्तों की संख्या यहां चालीस-पचास हजार है। कई मौकों पर तो संख्या एक लाख तक पहुंच जाती है। अगर यही रफ्तार रही, तब तो बैकुंठ में पांव धरने की जगह नहीं होगी! यह दूसरी बात है कि जीते जी शायद ही इन्हें कभी जीने का संतोष मिला हो!

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