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चुनौती एक अवसर

अजय के. झा जहां पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु संकट के प्रभावों से निपटने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिसंबर में होने वाली बड़ी बैठक की तैयारी में व्यस्त है, राज्य-स्तर जलवायु परिवर्तन कार्य-योजना और उसकी वित्तीय आवश्यकता भी उसकी चिंता का सबब है। इसी सिलसिले में राज्य-स्तर पर भी जलवायु […]

Author February 18, 2015 1:15 PM

अजय के. झा

जहां पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु संकट के प्रभावों से निपटने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिसंबर में होने वाली बड़ी बैठक की तैयारी में व्यस्त है, राज्य-स्तर जलवायु परिवर्तन कार्य-योजना और उसकी वित्तीय आवश्यकता भी उसकी चिंता का सबब है। इसी सिलसिले में राज्य-स्तर पर भी जलवायु संकटे के मद्देनजर कार्य-योजनाएं तैयार करनी हैं। मंत्रालय ने 2010 में सभी राज्यों से ऐसी कार्य-योजनाएं बनाने के लिए कहा था। मंत्रालय के अनुसार, अब तक तीस राज्यों ने अपनी कार्य-योजनाएं उसे दे दी हैं।

यह जानकारी मंत्रालय के एक प्रकाशन ‘इंडियाज प्रोग्रेस इन कम्बैटिंग कलाइमेट चेंज: ब्रीफिंग पेपर फॉर यूएनएफसीसीसी कॉप 20’ में दी गई है, जो वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। यह प्रकाशन लीमा में हुए कॉप से पहले दिसंबर 2014 में लाया गया था। हालांकि वेबसाइट पर अभी सिर्फ बाईस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ही कार्य-योजनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। इस प्रकाशन के अनुसार इन सभी राज्यों की कार्य-योजनाओं के लिए 11,31,945 करोड़ रुपए की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। इतनी राशि जमा करना आसान नहीं होगा, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरित कोष (ग्रीन क्लाइमेट फंड) के लिए सिर्फ सौ अरब डॉलर जुटाना टेढ़ी खीर लग रहा है।

पैसे के अलावा कई दूसरी समस्याएं भी हैं। कार्य-योजना के लिए अपेक्षित राशि राज्यों द्वारा दिए गए अनुमान से अलग हैं। कई राज्यों की वेबसाइट पर उनकी कार्य-योजना उपलब्ध है, जिनकी वित्तीय आवश्यकता वहां बताई गई आवश्यकता से भिन्न है। ऐसा मालूम होता है जैसे वित्तीय आवश्यकता का सारांश बनाते समय मंत्रालय करोड़ और मिलियन (दस लाख) में घालमेल कर दिया। इसका एक उदाहरण जम्मू-कश्मीर की कार्य-योजना है। जम्मू-कश्मीर ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी कार्य योजना के लिए 673941 मिलियन रुपए वित्तीय आवश्यकता बताई है जबकि मंत्रालय ने 67,394 करोड़ रुपए कर दी है। दूसरा उदाहरण अंडमान का है जिसमें राज्य ने कार्य-योजना के लिए 1,074,255 करोड़ का अनुमान प्रस्तुत किया है जिसे मंत्रालय ने 440 करोड़ कर दिया है। इसके अलावा कई आंकड़े हैं जिनके स्रोत और कारण समझना मुश्किल है। त्रिपुरा में भी कार्य-योजना के लिए दी गई 12,659.57 करोड़ की वित्तीय आवश्यकता को मंत्रालय ने लगभग दोगुना के करीब 23,428 करोड़ कर दिया है।

कई राज्यों की कार्य-योजना में वित्तीय आवश्यकता का उल्लेख नहीं है। हालांकि मंत्रालय के प्रकाशन में ऐसे राज्यों की कार्य-योजना की वित्तीय आवश्यकता भी दी गई है। संभव है कि इन राज्यों ने कार्य-योजना देने के बाद यह आकलन करके मंत्रालय को दिया होगा। अच्छा होता कि मंत्रालय इन आंकड़ों और वित्तीय जानकारी को भी अपनी वेबसाइट पर देता। वित्तीय जानकारी के अभाव में ऐसा लगता है कि मंत्रालय ने कुछ राज्यों के संदर्भ में फिर घालमेल किया है। मसलन, आंध्र प्रदेश ने 3,19,471 करोड़ की वित्तीय आवश्यकता बताई है जो उसके पड़ोसी राज्य कर्नाटक (7120 करोड़ रुपए) से चौवालीस गुना अधिक है और केरल (2938 करोड़ रुपए) से 108 गुना ज्यादा है। अकेले आंध्र प्रदेश को ही कुल सत्ताईस राज्यों की वित्तीय आवश्यकता के एक चौथाई की जरूरत है!

आंध्र प्रदेश को मात देने वाला राज्य केवल तमिलनाडु है जिसने 4,02,928 करोड़ की वित्तीय आवश्यकता जाहिर की है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को कुल वित्तीय आवश्यकता के तिरसठ प्रतिशत की जरूरत है। वहीं कुछ राज्यों ने बहुत कम अनुमान पेश किए हैं, जैसे राजस्थान ने 262 करोड़, हिमाचल प्रदेश ने 1560 करोड़, मध्यप्रदेश ने 4708 करोड़ रुपए। हालांकि कई छोटे राज्य ऐसे भी हैं जिन्होंने ज्यादा ही अनुमान दिए हैं, जैसे सिक्किम (76,095 करोड़ रुपए)। योजना आयोग (जिसका नाम अब नीति आयोग है) ने जलवायु संकट पर राष्ट्रीय कार्य-योजना के लिए 2,30,000 करोड़ रुपए की वित्तीय आवश्यकता का अनुमान लगाया है, और राज्यों की वित्तीय आवश्यकताएं राष्ट्रीय आवश्यकताओं से पांच गुना ज्यादा हैं।

मंत्रालय राज्यों की कार्य-योजना की समीक्षा कर रहा है। धन मुहैया कराने के अलावा एक चुनौती यह भी है कि राज्यों और प्रभावित जनसमुदायों के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए। कई राज्य तीन-चार साल से कार्य-योजना बना कर बैठे हैं। वित्तीय तंगी के चलते और स्पष्ट दृष्टि तथा लक्ष्य के अभाव में ये कार्य-योजनाएं अब भी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झूल रही हैं। जबकि जलवायु संकट की चुनौती को एक अवसर मान कर पर्यावरण संरक्षण की गंभीर शुरुआत करने की जरूरत है। भारत को अपने उत्सर्जन कम करने के प्रयासों में भी देरी नहीं करनी चाहिए।
(लेखक ‘कोपेनहेगन से आगे’ पर्यावरण समूह से संबद्ध हैं)

 

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