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दुनिया मेरे आगे- संवेदना के खंडहर

आशा साहनी का बेटा विदेश में अपना जीवन जीता रहा और इधर वे अपने घर में अकेले जिंदगी को घसीटती हुई मर गर्इं और कंकाल हो गर्इं तब बेटा वापस आया।
Author August 10, 2017 05:33 am
प्रतीकात्मक चित्र।

विपिन चौधरी    

आशा साहनी का बेटा विदेश में अपना जीवन जीता रहा और इधर वे अपने घर में अकेले जिंदगी को घसीटती हुई मर गर्इं और कंकाल हो गर्इं तब बेटा वापस आया। उनका कंकाल दरअसल हमारे समाज का असली चेहरा है जो संवेदनाहीन विकास और अदम्य महत्त्वाकांक्षाओं का हासिल है। इस पर अब दुनिया भर की बातें होंगी, उस हकीकत से पर्दा उठेगा, तमाम विश्लेषण होंगे। लेकिन जब ये हालात सामने बन रहे होते हैं, तब किसी को कोई फिक्र नहीं होती! उस दिन रात के लगभग आठ बजे थे। सड़क के किनारे मूंज की छोटी-सी खाट पर एक बुजुर्ग स्त्री लेटी हुई थी। पास में ही दस-बारह पानी की भरी बोतलें रखी हुई थीं। सड़क के दोनों तरफ दो-तीन मंजिला बढ़िया घर बने हुए थे। इन उच्च-मध्यम वर्गीय घरों के बीच में खंडहरनुमा घर के सामने सोई उस स्त्री की उपस्थिति किसी कलात्मक फिल्म के दृश्य का आभास देती है। लेकिन हकीकत कहीं अधिक मारक है। आज समाज का जो ढांचा बन गया है, उसमें सबसे अधिक दुर्दशा हमारे बुजुर्गों की हो रही है। वे लगभग लावारिस हालात में जीने को मजबूर हैं। अपने आसपास ही बुजुर्गों की स्थिति से जुड़े कई प्रसंग दिमाग में घूम रहे हैं। समाज के पतन का ग्राफ साफ दिखाई देता है।

बहुत साल पहले मेरे स्कूल जाने का दो-तीन रास्तों में से यह एक रास्ता था, जिस पर बना एक घर बाकी तमाम घरों से काफी नीचा और बेहद सामान्य दिखता था। पिछले दिनों कई बरस बाद वहां से गुजरते हुए घाघरा पहने वही स्त्री देखी, जिसे बचपन में रोजमर्रा के काम निपटाते हुए देखा करती थी। वह पुराना-सा दिखने वाला घर अब खंडहर में तब्दील हो चुका था। दो-तीन घर छोड़ कर दोमंजिला मकान में बुजुर्ग स्त्री के बेटे-बहुओं और पोते-पोतियों का विशाल परिवार रहता है। लेकिन एक को भी अपनी मां, सास या दादी की फिक्र नहीं। भोजन देने या सेवा करने की तो बात दूर, बातचीत तक नहीं। बल्कि दिन-रात वे शायद यही सोचते हैं कि बुढ़िया मरे तो इस जमीन को बेच दें। पास ही इस बुजुर्ग महिला की बेटी रहती है, जहां वह दो वक्त की रोटी के लिए चली जाती है। लेकिन उनकी बातों से लगा कि बेटी पर भी ससुराल वालों ने पहरे लगा रखे हैं।हालांकि वृद्धा ने अपनी ठसक को अब भी अपने करीब रखा है। मुस्कुराते हुए रोबीली आवाज में वे शान से इस ढह चुके घर में रहती हैं। दोनों कमरे के दरवाजे खुले रहते हैं। उन्होंने कहा- ‘मेरे पास कुछ नहीं है जो कोई चुरा ले। पीछे का एक कमरा किसी को किराए पर दिया हुआ है।’ मैंने उनके बेटों से वृद्ध मां की स्थिति को लेकर बात की तो उन्होंने कहा- ‘इसी की जिद है। न हमारे घर आती है, न घर बेचने देती है।’ पुराने दिन याद करते हुए बुजुर्ग महिला ने कहा- ‘मेरा ‘धनी’ (पति) था, तब सब कुछ ठीक था।’ उन्होंने यह भी बताया कि कल पड़ोस के घर में शादी थी तो मैंने कहा कि लोग-बाग आएंगे। मेरे घर के आगे टेंट लगा दो, ताकि इस खंडहर का भद्दापन मेहमानों को न दिखे।

इससे इतर कुछ रोज पहले जेएनयू के पास बस स्टैंड पर मैंने जो देखा उसने मुझे कई दिनों तक परेशान किए रखा। मैं बस के इंतजार में बैठी थी। वहीं दो स्त्रियां एक बुजुर्ग व्यक्ति से बार-बार घर चलने का आग्रह कर रही थीं। चेहरे पर गंभीर झुर्रियां लिए बुजुर्ग के साथ क्या हुआ होगा कि उनके सामने घर से बाहर निकलने की नौबत आई होगी। इसी तरह एक निजी और महंगे अस्पताल में एक अधेड़ आदमी अपनी मां और पिता के साथ हृदय रोग के डॉक्टर के पास आया हुआ था। वह तफसील से जूनियर डॉक्टर को मरीज की पुरानी रिपोर्ट दिखा रहा था। उसे देख कर मुझे अच्छा लगा कि कैसे तल्लीन होकर वह अपनी मां के बारे में बता रहा है। थोड़ी देर में अपनी मां और मौसी का टेस्ट हो जाने के बाद जब मैं बाहर बरामदे में बैठी थी तो वही आदमी अपनी मां और पिता को आंखें निकाल कर ऊंची आवाज में लगातार डांटते हुए कह रहा था- ‘जाओ तुम लोग गटर में जाओ… मेरा पीछा छोड़ो!’
एक और वाकया याद है। दिल्ली में एक अस्पताल में भर्ती अपनी एक परिचित महिला के साथ मुझे चार-पांच दिन रहना पड़ा। तब बगल वाले बिस्तर की एक बुजुर्ग मरीज के पास बारी-बारी से आने वाले बेटे-बहू को अपनी मां और सास से एक दिन भी बात करते नहीं सुना। बहू आते ही अपना लैपटॉप खोल कर बैठ जाती थी और तीन-चार घंटे बाद चली जाती।
ऐसे ही किस्सों में घिरे बुजुर्ग घुट-घुट कर दम तोड़ रहे हैं। किसी सामान्य बुजुर्ग के अंतिम वर्षों की बात छोड़ दीजिए, हमारे कई बड़े कलाकारों-लेखकों को भी अपने जीवन की सांझ में सुकून नहीं मिल पाया। अपनी फटी-फटी आंखों के साथ ही वे अपने जीवन की मीमांसा करते हुए काल का ग्रास बन गए!

 

 

 

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