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दुनिया मेरे आगे: कीर्तिमान के करतब

कीर्तिमान भी किस्म-किस्म के होते हैं। वे सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही गतिविधियों के होते हैं।

Author February 20, 2017 03:23 am
प्रतीकात्मक चित्र।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

कीर्तिमान भी किस्म-किस्म के होते हैं। वे सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही गतिविधियों के होते हैं। मतलब अच्छे प्रतिशत नंबर लाना, लगातार कई घंटे गाना या बजाना, अनवरत दो लाख दोहे लिखना, कड़ाके की ठंड में कई घंटे ठंडे पानी में रहना, सबसे ज्यादा रसगुल्ले या मिर्च खाना, ऊंचाई से कूदना, लगातार पैदल चलना या दौड़ना या कोई अन्य क्रिया करना। इसके अलावा, लंबी अवधि तक सोना या न सोना और फिर इस आधार पर विश्व कीर्तिमान बनाने के लिए गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में नाम दर्ज कराना सकारात्मक पहल है। ऐसे ही लगातार कुछ खास वर्ष तक जीतने का कीर्तिमान भी सकारात्मक सफलता है। कुछ अन्य गतिविधियां भी हैं। इतने रन, इतने शतक, इतने चौके और छक्के और इतने विकेट या कैच भी सकारात्मक उपलब्धि है।

लेकिन सवाल किया जा सकता है कि ट्रैकिंग के लिए इक्कीस सौ या ढाई हजार लोगों का इकट्ठा होना भी क्या विश्व कीर्तिमान है? क्या शुरुआत में बड़ी भीड़ जुटाना भी कोई उपलब्धि है? क्या धार्मिक यात्राओं के लिए बड़ी संख्या में लोगों को विभिन्न तरह के लालच देकर लगातार वर्षों तक ले जाना भी कोई कीर्तिमान है? खबर है कि कोई सत्तर साल के बुजुर्ग पचहत्तर चुनाव लड़ चुके हैं और वह भी पंचायत से लेकर सांसद तक का, और सभी में हारे। क्या इसे कीर्तिमान की श्रेणी में रखा जाए? इसी तरह लगातार एक ही कक्षा में फेल होते रहना, सर्वाधिक बार शून्य बनाना, कुछ मैचों में खूब गेंदबाजी करने के बावजूद कोई विकेट न ले पाना और कुछ मैच खेलने के बाद भी कोई कैच लेने के बजाय ज्यादा से ज्यादा कैच छोड़ देना भी कोई उपलब्धि है? ऐसे कितने ही काम नकारात्मक गतिविधियों की श्रेणी में आते हैं और कई लोग इन्हें भी कीर्तिमान मान बैठते हैं!

यों हमारे देश में ऐसे हठयोगियों की भी कमी नहीं है जो आग का गोला मुंह में रख लेते हैं, आग पर चलते हैं, एक पैर पर घंटों खड़े रहते हैं, समाधि ग्रहण करते हैं और हफ्तों बाद बाहर आते हैं। जरा सोचिए कि क्या ये गतिविधियां भी विश्व कीर्तिमान की श्रेणी में आनी चाहिए? खबर आई कि गुजरात में साढ़े तीन लाख लोगों ने सामूहिक रूप से राष्ट्रगान गाया और इसे भी पिछले ढाई लाख की तुलना में विश्व कीर्तिमान बताया गया। सवाल किया जा सकता है कि इस प्रकार के आयोजन और उनका प्रचार क्या वाकई कोई कीर्तिमान है? मूंछ रखने के शौकीन अपनी मूंछ की लंबाई फुट में नाप कर इतराते हैं और इसे भी उपलब्धि मानते हैं। हम सर्कस में भी कलाकार द्वारा किए गए अनेक करतब देखते हैं। पर क्या छुरी से गर्दन काट कर दिखाने या आरी से शरीर के दो टुकड़े करने और मुर्गी को फूल में बदल कर दिखाने को भी कीर्तिमान के तौर पर पेश किया जा सकता है? या फिर वे और कुछ नहीं, सिर्फ मनोरंजन और हाथ की सफाई हैं?जब तक प्रतिस्पर्धा न हो, हार-जीत दांव पर न लगी हो और समान सुविधाएं व समान अवसर प्राप्त लोग प्रतिस्पर्धा न करें, तब तक कोई उपलब्धि उल्लेखनीय नहीं होती और न ही उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जिस तरह शहर के आसपास के कवियों या शायरों को बुला लेने से आयोजन ‘अखिल भारतीय’ नहीं हो जाता, उसी तरह किसी गतिविधि या आयोजन पर भीड़ जुटा लेने और कोई क्रिया लगातार अधिक अवधि तक कर लेने मात्र से वह कीर्तिमान योग्य नहीं हो जाती। अगर हम अकेले ही कुछ करते रहें, वह गाना हो या लिखना या फिर कोई और क्रिया, न कोई चुनौती हो, न तनाव, न डर और न ही कोई खतरा, तो ऐसी स्थिति में प्राप्त सफलता को कीर्तिमान की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है?

एक घटना याद आती है। एक बारात भिंड से इंदौर आई। करीब दस घंटे का सफर था और चालीस यात्रियों की क्षमता वाली बस में करीब साठ यात्री थे। जाहिर है, सभी तो सीट पर नहीं बैठ सकते थे। इसलिए करीब पच्चीस लोगों को खड़े-खड़े आना पड़ा। उनमें से एक महाशय ऐसे थे, जिन्हें गैरजरूरी और फिजूल का कष्ट झेलने और फिर उसका बखान कर शेखी बघारने की आदत थी। वे बोले कि मैंने तो जिस हाथ से बस की रॉड पकड़ी थी वह हाथ भी नहीं बदला। यानी उसी हाथ से वे दस घंटे तक रॉड पकड़े रहे। क्या वह भी कोई कीर्तिमान माना जा सकता है? ऐसे हठयोगी भी बहुत हैं और उनके दावे भी बड़े-बड़े होते हैं।जो भी हो, हम मानें या न मानें, लोग किस्म-किस्म के कीर्तिमानों के दावे तो करते ही हैं। फिर वह अधिक खाने का मामला हो या फिर लंबे समय तक भूखा रहने का। पहले फिल्मों के हफ्तों या महीनों तक लगातार चलने को कीर्तिमान बताया जाता था, अब अर्थ-प्रधान युग में पहले दिन या पहले हफ्ते में की गई कमाई को कीर्तिमान बताया जाता है।

 

 

 

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