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दुनिया मेरे आगे-कितनी गिरहें खोलीं हमने

मैं एक स्त्री हूं, इसलिए मुझे अकेले रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद कि मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र-आत्मनिर्भर हूं, पुरुष-प्रधान समाज में मुझे एक आत्मनिर्भर, स्वतंत्र महिला बनने से रोका जाता है।

Author November 6, 2017 04:53 am
प्रतीकात्मक चित्र।

गरिमा सिंह 

मैं एक स्त्री हूं, इसलिए मुझे अकेले रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद कि मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र-आत्मनिर्भर हूं, पुरुष-प्रधान समाज में मुझे एक आत्मनिर्भर, स्वतंत्र महिला बनने से रोका जाता है। आज की दुनिया में महिला के लिए पैसा कमाना मुश्किल काम नहीं है, लेकिन समाज में गहराई तक जड़ें जमाई हुई नारी-द्वेषी संस्कृति और परंपरा को तोड़ना आज भी बेहद मुश्किल है। पुरुष-सत्ता के अधीन महिलाएं सदियों से प्रताड़ित होती रही हैं- परंपरा, संस्कृति, रस्मो-रिवाज और धर्म के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता रहा है। औरत के हक यानी अधिकार क्षेत्र का सवाल आते ही स्त्री-प्रश्नों से संबंधित तमाम उलझे-अनसुलझे तथ्य मस्तिष्क में यों ही उभरने लगते हैं। आखिर ऐसा क्या है जो स्त्री अधिकार क्षेत्र की बात आते ही रसोई में चेहरे पर पर्दा डाले स्त्री का बिंब ही हमारे मानस में बन पाता है। जबकि लंबे अरसे से भारतीय समाज व साहित्य में स्त्री-मुक्तिके प्रश्न पर गहन विचार-विमर्श होता आ रहा है।
परिवार, पित्तृसत्ता, देह विमर्श, विवाह-संस्था, अस्तित्व, आजादी जैसे तमाम सवालों पर धड़ल्ले से लेखन होता रहा है, विचार-विमर्श चलता रहा है, पर कभी कोई हल नहीं निकल पाया।

आखिर मस्तिष्क की वह कौन-सी ग्रंथि है जहां सफल पुरुष की बात आते ही उसकी सफलता के विभिन्न बिंदुओं पर बात की जाती है, जबकि यह सैकड़ों बार अनुभव किया गया है कि यदि किसी सफल स्त्री की चर्चा होती है तो उसकी कद-काठी, सौंदर्य, चरित्र, व्यक्तिगत मसले ही ज्यादा चर्चा का विषय बन पाते हैं। इसके बरक्स उसकी योग्यता व क्षमता को कम तवज्जो दी जाती है। स्त्री चरित्र का मानक, जो तथाकथित सभ्य समाज द्वारा ही बनाया गया है, आखिर इसे निर्धारित करने का अधिकार किसे है? यहां यह तय कर लेना भी आवश्यक है कि मानक तय करने वालों के स्वयं के खांचे की कसौटी क्या है। स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ही यदि उसके शोषण से मुक्तिका मार्ग है, तो आज भी ऐसा क्यों है कि ज्यादातर महिलाएं कार्यस्थल पर पुरुष के बराबर श्रम करने के बावजूद परिवार में लौटने पर घर की उसी दमघोंटू चारदीवारी के उसी खांचे में अंट जाने के लिए स्वयं को आजीवन आहूत करने को बाध्य हैं।

कौन कहता है मौत बस एक बार आती है…मैंने कई दफा मौत को महसूस किया है, जीते जी अपने भीतर और अपनी ही जैसी हजारों लड़कियों की आंखों में भी…मौत पहली दफा तब आई थी जब सुना था कि मेरे जन्म पर घर में मातम जैसा माहौल था…अजीब। हां, यह जानना अजीब अनुभव था। ज्यादा समझ नहीं थी, पर पहली बार कानों पर अपना कोई जोर नहीं चला…कहने को तो यह एक बात भर थी जो बाद में मुझे समझाने के लिए मजाक करार दे दी गई। पर यह मजाक ही छलनी कर गया था मुझे भीतर तक। दूसरी बार मौत तब आई जब कपड़ों से लेकर पढ़ाई तक के, जिंदगी के सभी अहम फैसलों को दूसरों द्वारा थोपे जाने का सिलसिला आसपास, घर-परिवार, सब जगह देखने लगी, मानो जिसका जीवन है उसका कोई हक नहीं! तीसरी बार मौत तब आई, जब उस इंसान ने, जिसके होने से पहली बार बहन-बेटी से इतर स्व का अस्तित्व-बोध हुआ…उसने ही शक और सवालों के चक्रव्यूह में घेर कर कब अकेले चलने का फैसला ले लिया पता ही नहीं चला।

यह मौत किस्तों में आज भी बरकरार है… बार-बार लगातार… आसपास, दूरदराज, चाहे टीवी हो या अखबार…। खैर, एक वहम बाकी था उच्चशिक्षा संस्थानों को लेकर, अब वह भी टूटा जाता है उन सवालों को सुन कर, जो लड़कियों पर उठाए जा रहे हैं। जाहिर है, इनके घर की औरतें ही जो सदियों से चुप्पी ओढेÞ हैं…वे चुप्पी तोड़ दें तो सवाल और आशंका उठाने वाले लोगों के मुंह पर आजीवन ताला लग जाएगा…लेकिन यह पहल करेगा कौन? परिवार और समाज की तथाकथित मर्यादा और इज्जत के नाम पर कोई भी स्त्री मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करती। व्यवस्थाएं बड़ी-बड़ी बातें करती हैं। कानून बनते हैं, अभियान चला करते हैं, पर होता कुछ नहीं। हाल तो यह है कि संसद में स्त्रियों के आरक्षण के सवाल पर कुछ राजनेता जहर खाकर मर जाने की धमकियां देते हैं। उन्हें यह मंजूर नहीं कि संसद में स्त्रियों की बराबर की भागीदारी हो। यह बड़ा सवाल है, स्त्री को जीने और मुक्तहवा में अपनी रुचि से सांस लेना भी जाने कब मयस्सर होगा! कब वह यह अहसास कर पाएगी कि वह केवल किसी की इज्जत का तमगा नहीं, खुद एक जीती-जागती मनुष्य है, उसमें भी हृदय है जो धड़कता है। आंखें हैं जो दुनिया को देखती हैं, अपनी दुर्गति भी, और आंसुओं से तर हो जाती हैं। नाना तरह की बहसों और जुमलों में उलझी उसकी स्वतंत्रता एक सपना ही है जो सच हो, यह एक संभावना से ज्यादा कुछ नहीं है। पता नहीं स्त्री और पुरुष की कथित बराबरी का जाप करने वाला यह समाज कब उसे मुक्तिदेगा और कब वह मुक्तभाव से सांस भी ले पाएगी। जाने कब!

 

 

 

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