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ठहरी हुई सड़कें

बस स्टैंड पर मैंने वहां की दूरी के बारे में पूछा तो बताया गया कि पचहत्तर किलोमीटर है।
Author November 9, 2016 06:01 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

हेमंत कुमार पारीक

उस दिन जरूरी काम से मुझे बीकानेर से लूनकरनसर जाना था। बस स्टैंड पर मैंने वहां की दूरी के बारे में पूछा तो बताया गया कि पचहत्तर किलोमीटर है। मैंने हिसाब लगाया और मित्र से कहा कि रामू भाई, दो घंटे लगेंगे। पास ही कंडक्टर खड़ा सवारियों को आवाज दे रहा था। उसने हमारी बातचीत को सुना और तुरंत बोला- ‘नहीं सर, पौन घंटे में पहुंचा दूंगा।’ मैंने अपने मित्र की तरफ देखा और कंडक्टर पर कटाक्ष किया- ‘अच्छी बात है। सवारियों को इसी तरह ललचाया जाता है।’ वह मेरी तरफ देख मुस्कराया और बोला कि अगर पौन घंटे से ज्यादा लगा तब आप जो मन में आए, शिकायत कीजिएगा।’ हम दोनों मित्रों ने एक दूसरे को देखा। बस का टिकट लिया और बैठ गए। बस चल पड़ी थी चिकनी-चौड़ी और सीधी सड़क पर। न कहीं कोई गड्ढा और न कहीं ऊबड़-खाबड़! हालांकि यह काफी पुराना वाकया है और तब भी वहां चारों तरफ रेत ही रेत थी, फिर भी हम ऐसे सफर की कल्पना नहीं कर सकते थे। मरुस्थल के बीच से बस ऐसे चल रही थी, मानो बह रही हो। वरना हमारे शहर की बस चले और पेट का पानी न हिले, यह असंभव है।

चाहे गांव हो या शहर, सड़कें जीवन का एक अहम हिस्सा हैं। पहले कभी गांव में सड़कें नहीं के बराबर थीं। ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां होती थीं। आम आदमी पैदल चलते थे और कुछ लोग बैलगाड़ी या साइकिल से यात्रा करते थे। कालांतर में शहरों का विकास हुआ और वे महानगर बन गए। देहात कस्बों में बदल गए और कस्बे छोटे शहर हो गए। विकास की दौड़ में बैलगाड़ी, रिक्शे वगैरह लुप्तप्राय हो गए हैं। बैंकों से ऋण लेना आसान हो गया। नतीजतन, बड़ी संख्या में स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार जैसे साधन सड़कों पर दिखने लगे। इनका सीधा असर सड़कों पर पड़ा। गांव में मेरा घर रेलवे क्रॉसिंग से बहुत करीब है। क्रॉसिंग पर लगा गेट दो हिस्सों में बंटे गांव को जोड़ता है। पहले दिन भर में दो-चार रेलगाड़ियां गुजरती थीं। रेलगाड़ी के आते-जाते गेट बंद हो जाता और कई बार आधे घंटे तक बंद रहता था। इस दौरान गेट के दोनों तरफ कुल जमा चार-छह बैलगाड़ियां या रिक्शे होते थे।

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सालों बाद कुछ दिन पहले मैं वहां गया था। सब कुछ बदला-बदला लगा। सुनसान इलाके भीड़ भरे नजर आए। जहां कभी इक्का-दुक्का लोग दिखते थे, वहां बाजार जैसा माहौल था। और जो बाजार थे, उनकी बात करना व्यर्थ है। भीड़भाड़ और वाहनों से पटे हुए। धूल से भरी सड़कें। बारिश के बाद कहीं उधड़ी तो कहीं दो-दो फुट गहरे गड्ढे! पूछा तो मालूम पड़ा कि पिछले साल इसका निर्माण हुआ है। एक साल के अंतराल में सड़कों की बदहाली पर आश्चर्य हुआ। अमूमन शहर की सड़कों के भी यही हाल हैं। बीच-बीच में दिखाने के लिए थोड़ा रखरखाव कर दिया जाता है। लेकिन गांव की तरफ कौन देखे और उन लोगों के बारे में कौन सोचे जो खराब सड़कों के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।खैर, उस रेलवे क्रॉसिंग वाले गेट का यही हाल था। पांच मिनट में सौ वाहन इस तरफ और सौ उस तरफ! यह जनसंख्या विस्फोट था। एक वाहन के साथ कम से कम एक आदमी की गिनती करें तो पांच मिनट में गेट से गुजरने वालों की संख्या हुई दो-सौ। इससे आबादी और वाहनों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर कस्बे में वाहनों की संख्या का यह हाल है तो फिर शहरों की बात करना बेमानी है।

जब से बैंकों से कर्ज मिलना आसान हुआ है, सड़कों पर वाहन दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़े हैं। जिस संस्था में मैं काम करता हूं, वहां 1990 तक लोगों के पास साइकिल ही थी। हाट-बाजार में लोग पैदल चलते दिखते थे या फिर साइकिल पर। लेकिन अब वहां साइकिलों के दर्शन दुर्लभ हैं। संस्था के लगभग आधे से ज्यादा कर्मचारी कारों से आते-जाते हैं। बाकी के पास दुपहिया वाहन हैं। अब यह अलग बात है कि इन वाहनों से निकला धुआं पर्यावरण को दूषित करता है और लोगों की सेहत को प्रभावित करता है। यही वजह है कि अस्पतालों में मरीजों की संख्या में इसी अनुपात में इजाफा हो रहा है। खैर, मुद्दा सड़क है, जो सीधे तौर पर वाहनों से जुड़ा है। यह देखने की जरूरत है कि सड़कों पर कितनी गाड़ियां हैं, उसमें कितने लोग सफर करते हैं और उन्होंने सड़क पर कितनी जगह घेरा हुआ है।

आजादी के करीब सत्तर साल गुजरने के बाद भी अफसोस इस बात पर है कि सड़कों का वही हाल है जो सत्तर बरस पहले था। खासतौर पर बारिश के बाद उन्हें देख कर गांव की पगडंडियां याद आने लगती हैं। वापस घर लौटने के बाद या तो कंधे के दर्द से कराहते हैं या पीठ दर्द से। मौजूदा दौर में विकास के दावों के बीच सड़कों की हालत देखी जा सकती है। जबकि सड़कें किसी भी शासन की सफलता का आईना होती हैं।

 

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